22. राग जैतश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग जैतश्री

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कन्हैया हालरौ हलरोइ ।
हौं वारी तव इंदु-बदन पर, अति छबि अलग भरोइ ॥
कमल-नयन कौं कपट किए माई, इहिं ब्रज आवै जोइ ।
पालागौं बिधि ताहि बकी ज्यौं, तू तिहिं तुरत बिगोइ ॥

सुनि देवता बड़े, जग-पावन, तू पति या कुल कोइ ।
पद पूजिहौं, बेगि यह बालक करि दै मोहिं बड़ोइ ॥
दुतियाके ससि लौं बाढ़े सिसु, देखै जननि जसोइ ॥
यह सुख सूरदास कैं नैननि, दिन-दिन दूनौ हो ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता गा रही हैं) ‘कन्हैया! पलनेमें झूल! मैं तेरे इस चन्द्रमुखकी बलि
हारी जाऊँ जो अपार शोभा से अलग ही (अद्भुतरूपसे) परिपूर्ण है । ‘माई री!’ (पूतना
का स्मरण करके यह उद्गार करके तब प्रार्थना करती हैं-) दैव! मैं तेरे पैरौं पड़ती
हूँ, इस कमललोचनसे छल करने इस व्रजमें जो कोई आवे,उसे तू उस पूतनाके समान ही
तुरन्त नष्ट कर देना । सुना है तू महान् देवता है, संसारको पवित्र करनेवाला है, इस
कुलका स्वामी है, सो मैं तेरे चरणों की पूजा करूँगी, मेरे इस बालकको झटपट बड़ा कर
दे । मेरा शिशु द्वितीयाके चन्द्रमाकी भाँति बढ़े और यह माता यशोदा उसे देखे ।’
सूरदासजी कहते हैं -मेरे नेत्रों के लिये भी यह सुख दिनों-दिन दुगुना बढ़ता रहे ।

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