मानसरोवर भाग 1

7 – बोध

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

——————

पंडित चंद्रधर ने एक अपर प्रायमरी में मुदर्रिसी तो कर ली थी, किंतु सदा पछताया करते कि कहाँ से इस जंजाल में आ फँसे । यदि किसी अन्य विभाग में नौकर होते तो अब तक हाथ में चार पैसे होते, आराम से जीवन व्यतीत होता । यहाँ तो महीने भर प्रतीक्षा करने के पीछे कहीं पंद्रह रुपये देखने को मिलते हैं । वह भी इधर आये, उधर गायब । न खाने का सुख, न पहनने का आराम हमसे तो मजूर ही भले । पंडित जी के पड़ोस में दो महाशय और रहते थे । एक ठाकुर अतिबलसिंह वह थाने में हेडकान्सटेबुल थे दूसरे मुंशी बैजनाथ, वह तहसील में सियाहेनवीस थे । इन दोनों आदमियों का वेतन पंडित से कुछ अधिक न था, तब भी उनकी चैन से गुजरती थी । संध्या को वह कचहरी से आते, बच्चों को पैसे और मिठाइयाँ देते । दोनों आदमियों के पास टहलते थे । घर में कुरसियाँ, मेंजें, फर्श आदि सामग्रियाँ मौजूद थीं । ठाकुर साहब को शाम को आराम कुरसी पर लेट जाते और खुशबुदार खमीरा पीते । मुंशी जी को शराब-कबाब का व्यसन था । अपने सुसज्जित कमरे में बैठे हुए बोतल की बोतल साफ कर देते । जब कुछ नशा होता तो हारमोनियम बजाते । सारे मुहल्ले में उनका रोबदाब था । उन दोनों महाशयों को आते- जाते देखकर बनिये उठकर सलाम करते । उनके लिए बाजार में अलग भाव था । चार पैसे की चीज टके में लाते । लकड़ी-ईंधन मुफ्त में मिलता । पंडित जो उनके ठाट-बाट को देखकर कुढ़ते और अपने भाग्य को कोसते । वह लोग इतना भी न जानते थे कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है अथवा सूर्य पृथ्वी का । साधारण पहाड़ों का भी ज्ञान न था, जिस पर भी ईश्वर ने उन्हें इतनी प्रभुता दे रखी थी । यह लोग पंडित जी पर बड़ी कृपा रखते थे । कभी सेर आध सेर दूध भेज देते और कभी थोड़ी-सी तरकारियाँ । किंतु इनके बदले में पंडित जी को ठाकुर साहब के दो और मुंशीजी के तीन लड़कों की निगरानी करनी पड़ती । ठाकुर साहब कहते, पंडित जी! यह लड़के हर घड़ी खेला करते हैं, जरा इनकी खबर लेते रहिए । मुंशी जी कहते, यह लड़के आवारा हुए जाते हैं, जरा इनका ध्यान रखिए । यह बातें बड़ी अनुग्रहपूर्ण रीति से कही जाती थीं मानो पंडितजी उनके गुलाम हैं । पंडित जी को यह व्यवहार असह्य था, किंतु उन लोगों को नाराज करने का साहस न कर सकते थे, उनकी बदौलत कभी-कभी दूध-दही के दर्शन हो जाते, कभी अचार-चटनी चख लेते । केवल इतना ही नहीं, बाजार से चीजें भी सस्ती लाते । इसलिए बेचारे इस अनीति को विष की घूँट के समान पीते । इस दुरवस्था से निकलने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े यत्न किये थे । प्रार्थना पत्र लिखे अफसरों की खुशामदें कीं, पर आशा पूरी न हुई । अंत में हार कर बैठ रहे । हाँ, इतना था कि अपने काम में त्रुटि न होने देते । ठीक समय पर जाते, देर करके आते. मन लगा कर पढ़ाते इससे उनके अफसर लोग खुश थे । साल में कुछ इनाम देते और वेतन वृद्धि का जब कभी अवसर आता, उनका विशेष ध्यान रखते । परंतु इस विभाग की वेतन-वृद्धि ऊसर की खेती है । बड़े भाग से हाथ लगती है । बस्ती के लोग उनसे संतुष्ट थे । लड़कों की संख्या बढ़ गयी थी और पाठशाला के लड़के भी उन पर जान देते थे । कोई उनके घर आकर पानी भर देता, कोई उनकी बकरी के लिए पत्तियाँ तोड़ लाता । पंडित जी इसी को बहुत समझते थे ।

(2)

एक बार सावन के महीने में मुंशी बैजनाथ और ठाकुर अतिबलसिंह ने श्री अयोध्या जी की यात्रा की सलाह की । दूर की यात्रा थी । हफ्तों पहले से तैयारियाँ होने लगीं । बरसात के दिन, सपरिवार जाने में अड़चन थी ; किंतु स्त्रियाँ किसी भाँति भी न मानती थीं । अंत में विवश हो कर दोनों महाशयों ने एक-एक सप्ताह की छुट्टी ली और अयोध्या जी चले । पंडित जी को भी साथ चलने के लिए बाध्य किया । मेले-ठेले में एक फालतू आदमी से बड़े काम निकलते हैं । पंडित जी असमंजस में पड़े, परंतु जब उन लोगों ने उनका व्यय देना स्वीकार किया तो इन्कार न कर सके और अयोध्या जी की यात्रा का ऐसा सुअवसर पा कर न रुक सके । बिल्हौर से एक बजे रात को गाड़ी छूटती थी । यह लोग खा-पीकर स्टेशन पर आ बैठे । जिस समय गाड़ी आयी, चारों ओर भगदड़-सी पड़ गयी – हजारों यात्री जा रहे थे । उस उतावली में मुंशीजी पहले निकल गये । पंडित जी और ठाकुर साहब साथ थे । एक कमरे में बैठे । इस आफत में कौन किसका रास्ता देखता है। गाड़ियों में जगह की बड़ी कमी थी, परन्तु जिस कमरे में ठाकुर साहब थे उसमें केवल चार मनुष्य थे । वह सब लेटे हुए थे । ठाकुर साहब चाहते थे कि वह उठ जायें तो जगह निकल आये । उन्होंने एक मनुष्य से डाँट कर कहा-उठ बैठो जी, देखते नहीं हम लोग खड़े हैं । मुसाफिर लेटे-लेटे बोला – क्यों उठ बैठे जी ? कुछ तुम्हारे बैठने का ठेका लिया है ? ठाकुर -क्या हमने किराया नहीं दिया है ? मुसाफिर – जिसे किराया दिया हो, उससे जा कर जगह माँगो । ठाकुर – जरा होश की बात करो । इस डब्बे में दस यात्रियों के बैठने की आज्ञा है । मुसाफिर – यह थाना नहीं है, जरा जबान सँभाल कर बातें कीजिए । ठाकुर – तुम कौन हो जी । मुसाफिर – हम वही हैं, जिस पर आपने खुफिया फरोसी का अपराध लगाया था और जिसके द्वार से आप नकद 25 रु0 ले कर टले थे । ठाकुर- अहा ! अब पहचाना । परंतु मैंने तो तुम्हारे साथ रियायत की थी । चालान कर देता तो तुम सजा पा जाते । मुसाफिर – और मैंने भी तो तुम्हारे साथ रियायत की कि गाड़ी में खड़ा रहने दिया । ढकेल देता तो तुम नीचे जाते और तुम्हारी हड्डी-पसली का पता न लगता । इतने में दूसरा लेटा हुआ यात्री जोर से ठट्ठा मार कर हँसा और बोला-क्यों दारोगा साहब, मुझे क्यों नहीं उठाते ? ठाकुर साहब क्रोध से लाल हो रहे थे । सोचते थे अगर थाने में होता तो इसकी जबान खींच लेता, पर इस समय बुरे फँसे थे । यह बलवान मनुष्य पर थे पर यह दोनों मनुष्य भी हट्टे -कट्टे देख पड़ते थे । ठाकुर – संदूक नीचे रख दो, बस जगह हो जाय । दूसरा मुसाफिर बोला – और आप ही क्यों न नीचे बैठ जायँ । इसमें कौन-हेठी हुई जाती है । यह थाना थोड़े ही है कि आपके रोब में फर्क पड़ जायगा । ठाकुर साहब ने उनकी ओर भी ध्यान से देख कर पूछा-क्या तुम्हें भी मुझसे कोई बैर है ? `जी हाँ, मैं तो आपके खून का प्यासा हूँ ।’ `मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, तुम्हारी तो सूरत भी नहीं देखी ।’ दूसरा मुसाफिर-आपने मेरी सूरत न देखी होगी पर आपके डंडे ने देखी है । इसी कल के मेले में आपने मुझे कई डंडे लगाये । मैं चुपचाप तमाशा देखता था और आपने आकर मेरा कचूमर निकाल लिया । मैं चुप रह गया, पर घाव दिल पर लगा हुआ है। आज उसकी दवा मिलेगी । यह कह कर उसने और भी पाँव फैला दिया और क्रोध-पूर्ण नेत्रों से देखने लगा । पंडित जी अब तक चुपचाप खड़े थे । डरते थे कि कहीं-मार-पीट न हो जाय । अवसर पाकर ठाकुर साहब को समझाया । ज्योंही तीसरा स्टेशन आया, ठाकुर साहब ने बाल-बच्चों को वहाँ से निकाल कर दूसरे कमरे में बैठाया । इन दोनों दुष्टों ने उनका असबाब उठा-उठा कर जमीन पर फेंक दिया । जब ठाकुर साहब गाड़ी से उतरने लगे तो उन्होंने उनको ऐसा धक्का दिया कि बेचारे प्लेटफार्म पर गिर पड़े । गार्ड से कहने दौड़े थे कि इंजिन ने सीटी दी, जाकर गाड़ी में बैठ गये । उधर मुंशी बैजनाथ की और भी बुरी दशा थी । सारी रात जागते गुजारी । जरा पैर फैलाने की जगह न थी । आज उन्होंने जेब में बोतल भर कर रख ली थी । प्रत्येक स्टेशन पर कोयला पानी ले लेते थे । फल यह हुआ कि पाचन क्रिया में विघ्न पड़ गया एक बार उलटी हुई और पेट में मरोड़ होने लगी । बेचारे बड़ी मुश्किल में पड़े । चाहते थे कि किसी भाँति लेट जायँ, पर वहाँ पैर हिलाने की भी जगह न थी । लखनऊ तक तो उन्होंने जब्त किया । आगे चल कर विवश हो गये । एक स्टेशन पर उतर पड़े । प्लेटफार्म पर लेट गये । पत्नी भी घबरायी । बच्चों को लेकर उतर पड़ी । असबाब उतारा परंतु जल्दी में ट्रंक उतारना भूल गयी । गाड़ी चल दी । दरोगा जी ने अपने मित्र को इस दशा में देखा तो वह भी उतर पड़े । समझ गये कि हजरत आज ज्यादा चढ़ा गये । देखा तो मुंशीजी की दशा बिगड़ गयी थी । ज्वर, पेट में दर्द, नसों में तनाव, कै और दस्त । बड़ा खटका हुआ स्टेशन मास्टर ने यह हाल देखा तो समझे हैजा हो गया है । हुक्म दिया, रोगी को अभी बाहर ले जाओ । विवश होकर लोग मुंशी जी को एक पेड़ के नीचे उठा लाये । उनकी पत्नी रोने लगी । हकीम -डाक्टर की तलाश हुई । पता लगा कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की तरफ से वहाँ एक छोटा सा अस्पताल है । लोगों की जान में जान आयी । किसी से यह भी मालूम हुआ कि डाक्टर साहब बिल्हौर के रहनेवाले हैं । ढाढ़स बँधा । दरोगाजी अस्पताल दौड़े । डाक्टर साहब से समाचार कह सुनाया और कहा-आप चलकर जरा उन्हें देख तो लीजिए । डाक्टर का नाम था चोखेलाल । कम्पौंडर थे, लोग आदर से डाक्टर कहा करते थे । सब वृत्तान्त सुन कर रुखाई से बोले – सबेरे के समय मुझे बाहर जाने की आज्ञा नहीं है । दारोगा -तो क्या मुँशी जी को यहीं लावें ? चोखेलाल -हाँ, आपका जी चाहे लाइए । दारोगा जी ने दौड़-धूप कर एक डोली का प्रबन्ध किया । मुंशीजी को लाद कर अस्ताल लाये । ज्योंही बरामदे में पैर रखा चोखेलाल ने डाँट कर कहा हैजे (विसुचिका) के रोगी को ऊपर लाने की आज्ञा नहीं है । बैजनाथ अचेत तो थे नहीं, आवाज सुनी, पहचाना, धीरे से बोले- अरे यह तो बिल्लोर ही के हैं – भला-सा नाम है । तहसील में आया-जाया करते हैं । क्यों महाशय ! मुझे पहचानते है ? चोखेलाल जी हाँ, खूब पहचानता हूँ । बैजनाथ – पहचान कर भी इतनी निठुरता । मेरी जान निकल रही है जरा देखिए, मुझे क्या हो गया ? चोखे – हाँ, यह सब कर दूँगा और मेरा काम ही क्या ? फीस ? दारोगा जी – अस्पताल में कैसी फीस जनाबेमन ? चोखे – वैसे ही जैसी इन मुंशीजी ने मुझसे वसूल की थी जनाबेमन । दारोगा जी – आप क्या कहते हैं, मेरी समझ में नहीं आता । चोखे – मेरा घर बिल्हौर में है । वहाँ मेरी थोड़ी-सी जमीन है । साल में दो बार उसकी देख-भाल को जाना पड़ता है । जब तहसील में लगान करने जाता हूँ मुंशी जी डाँटकर अपना हक वसूल कर लेते हैं । न दूँ तो शाम तक खड़ा रहना पड़े । स्याहा न हो । फिर जनाब कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर । मेरी फीस दस रुपये निकालिए । देखूँ, दवा दूँ तो अपनी राह लीजिए । दारोगा – दस रुपये !! चोखे-जी हाँ, और यहाँ ठहरना चाहें तो दस रुपये रोज । दारोगा जी विवश हो गये । बैजनाथ की स्त्री से रुपये माँगे । तब उसे अपने बक्स की याद आयी । छाती पीट ली । दारोगा जी के पास भी अधिक रुपये नहीं थे, किसी तरह दस रुपये निकालकर चोखेलाल को दिये – उन्होंने दवा दी दिन भर कुछ फायदा न हुआ । रात को दशा सँभली । दूसरे दिन फिर दवा की आवश्यकता हुई । मुंशियाइन का एक गहना जो 20 रु0 से कम का न था बाजार में बेचा गया ।तब काम चला ।शाम तक मुंशी जी चंगे हुए । रात को गाड़ी पर बैठ कर खूब गालियाँ दीं । श्री अयोध्याजी में पहुँच कर स्थान की खोज हुई । पंडों के घर जगह न थी । घर-घर में आदमी भरे हुए थे । सारी बस्ती छान मारी पर कहीं ठिकाना न मिला । अंत में यह निश्चय हुआ कि किसी पेड़ के नीचे डेरा जमाना चाहिए । किन्तु जिस पेड़ के नीचे जाते थे वहीं यात्री पड़े मिलते । खुले मैदान में, रेत पर पड़े रहने के सिवा और कोई उपाय न था । एक स्वच्छ स्थान देख कर बिस्तरे बिछाये और लेटे । इतने में बादल घिर आये । बूँदें गिरने लगीं । बिजली चमकने लगी । गरज से कान के परदे फटे जाते थे । लड़के रोते थे । स्त्रियों के कलेजे काँप रहे थे । अब यहाँ ठहरना दुस्सह था, पर जायें कहाँ । अकस्मात एक मनुष्य नदी की तरफ से लालटेन लिये आता हुआ दिखायी दिया – वह निकट पहुँच गया तो पंडित जी ने उसे देखा । आकृति कुछ पहिचानी हुई मालूम हुई किंतु यह विचार न आया कि कहाँ देखा है । पास जाकर बोले – क्यों भाई साहब, यहाँ यात्रियों के ठहरने के लिए जगह न मिलेगी ? वह मनुष्य रुक गया । पंडित जी की ओर ध्यान से देख कर बोला- आप पंडित चंद्रधर तो नहीं है ? पंडित जी प्रसन्न हो कर बोले – जी हाँ । आप मुझे कैसे जानते हैं ? उस मनुष्य ने सादर पंडित जी के चरण छुए और बोला – मैं आपका पुराना शिष्य हूँ । मेरा नाम कृपाशंकर है । मेरे पिता कुछ दिनों बिल्हौर डाक-मुंशी रहे थे । उन्हीं दिनों मैं आपकी सेवा में पढ़ता था । पंडित जी की स्मृति जागी , बोले -ओहो !कृपाशंकर ! तब तो तुम दुबले-पतले लड़के थे । कोई आठ नौ साल हुए होंगे । कृपा – जी हाँ, नवाँ साल था । मैंने वहाँ से आकर इन्ट्रेंस पास किया अब यहाँ म्युनिसिपिल्टी में नौकर हूँ । कहिए आप तो अच्छी तरह रहे । सौभाग्य था कि आपके दर्शन हो गये । पंडित – मुझे भी तुमसे मिलकर बड़ा आनन्द हुआ । तुम्हारे पिता अब कहाँ हैं ? कृपा0 – उनका तो देहान्त हो गया । माता साथ हैं । आप यहाँ कब आये ? पंडित – आज ही आया हूँ । पंडों के घर जगह न मिली। विवश हो कर यहीं रात काटने की ठहरी । कृपा0 – बाल-बच्चे भी साथ हैं । पंडित – नहीं, मैं तो अकेले ही आया हूँ । पर मेरे साथ दरोगा जी और सियाहेनवीस साहब हैं – उनके बाल बच्चे भी साथ हैं । कृपा – कुल कितने मनुष्य होंगे ? पंडित जी हैं तो दस किन्तु थोड़ी-सी जगह में निर्वाह कर लेंगे । कृपा0 – नहीं साहब , बहुत सी जगह लीजिए । मेरा बड़ा मकान खाली पड़ा है । चलिए आराम से एक, दो, तीन दिन रहिए । मेरा परम सौभाग्य है कि आपकी कुछ सेवा करने का अवसर मिला । कृपाशंकर ने कई कुली बुलाये । असबाब उठवाया और सबको अपने मकान पर ले गया । साफ सुथरा घर था । नौकर ने चटपट चारपाइयाँ बिछा दी घर में पूरियाँ पकने लगीं । कृपाशंकर हाथ बाँधे सेवक की तरह दौड़ता था ।हृदयोल्लास से उसका मुख-कमल चमक रहा था । उसकी विनय और नम्रता ने सबको मुग्ध कर लिया । और सब लोग तो खा-पीकर सोये । किंतु पंडित चंद्रधर को नींद नहीं आयी । उनकी विचार शक्ति इस यात्रा की घटनाओं का उल्लेख कर रही थी । रेलगाड़ी की रगड़-झगड़ और चिकित्सालय की नोच-खसोट के सम्मुख कृपाशंकर की सहृदयता और शालीनता प्रकाशमय दिखायी देती थी । पंडित जी ने आज शिक्षक का गौरव समझा । उन्हें आज इस पद की महानता ज्ञात हुई । यह लोग तीन दिन अयोध्या रहे । किसी बात का कष्ट न हुआ । कृपाशंकर ने उनके साथ जाकर प्रत्येक धाम का दर्शन कराया । तीसरे दिन जब लोग चलने लगे तो वह स्टेशन तक पहुँचाने आया । जब गाड़ी ने सीटी दी तो उसने सजल नेत्रों से पंडित जी के चरण छुए और बोला, कभी-कभी इस सेवक को याद करते रहिएगा । पंडित जी घर पहुँचे तो उनके स्वभाव में बड़ा परिवर्तन हो गया था । उन्होंने फिर किसी दूसरे विभाग में जाने की चेष्टा नहीं की ।

………………………………………………………………….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Select Dropdown

Page Not Found
404

Page Not Found

The page you requested is not here. It may have moved, or the link is out of date. Check the address, or go back to Data Portal Home