मानसरोवर भाग 1

3 – धर्म – संकट

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

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`पुरुषों और स्त्रियों में बड़ा अंतर है । तुम लोगों का हृदय शीशे की तरह कठोर होता है और हमारा हृदय नरम । वह विरह की आँच नहीं सह सकता ।’ शीशा ठेस लगते ही टूट जाता है । नरम वस्तुओं में लचक होती है ।’ `चलो बातें न बनाओ । दिन भर तुम्हारी राह देखूँ, रात भर घड़ी की सुइयाँ । तब कहीं आपके दर्शन होते हैं ।’ `मैं तो सदैव तुम्हें अपने हृदय-मंदिर में छिपाये रखता हूँ।’ ठीक-बतलाओ, कब आओगे ?’ `ग्यारह बजे, परंतु पिछला दरवाजा खुला रखना ।’ `उसे मेरे नयन समझो ।’ `अच्छा तो अब विदा ।’

(2)

पंडित कैलाशनाथ लखनऊ के प्रतिष्ठित बैरिस्टरों में थे । कई सभाओं के मंत्री, कई समितियों के सभापति, पत्रों में अच्छे लेख लिखते, प्लेटफार्म पर सारगर्भित आख्यान देते । पहले-पहल जब वह यूरप से लौटे थे तो यह उत्साह अपनी पूरी उमंग पर था, परंतु ज्यों-ज्यों बैरिस्टरी चमकने लगी, इस उत्साह में कमी आने लगी । और वह ठीक भी था; क्योंकि अब बेकार न थे जो बेगार करते । हाँ,क्रिकेट का शौक अब तक ज्यों का त्यों बना था । वह कैसर क्लब के संस्थापक और क्रिकेट के प्रसिद्ध खिलाड़ी थे । यदि मि0 कैलाश को क्रिकेट की धुन थी तो उनकी बहन कामिनी को टेनिस का शौक था । इन्हें नित नवीन आमोद-प्रमोद की चाह रहती थी । शहर में कहीं नाटक हो, थियेटर आवे, कोई सरकस, कोई बायसकोप हो कामिनी उसमें न सम्मिलित हो, यह असम्भव बात थी । मनोविनोद की कोई भी सामग्री उसके लिए उतनी ही आवश्यक थी जितनी वायु और प्रकाश । मि0 कैलाश पश्चिमीय सभ्यता के प्रवाह में बहने वाले अपने अन्य सहयोगियों की भाँति हिंदू जाति, हिंदू सभ्यता, हिंदी भाषा और हिंदुस्तानी के कट्टर विरोधी थे । हिंदू सभ्यता उन्हें दोषपूर्ण दिखायी देती थी । अपने इन विचारों को वे अपने ही तक परिमित न रखते बल्कि ही ओजस्विनी भाषा में इन विचारों पर लिखते और बोलते थे । हिंदू सभ्यता विवेकी भगत उनके इन विवेक शून्य विचारों पर हँसते थे; परंतु उपहास और विरोध तो सुधारक के पुरस्कार हैं । मि0 कैलाश उनकी कुछ परवा न करते थे । वे कोरे वाक्यवीर ही न थे, कर्मवीर भी पूरे थे । कामिनी की स्वतंत्रता उनके विचारों का प्रत्यक्ष स्वरूप थी । सौभाग्यवश कामिनी के पति गोपालनारायण भी इन्हीं विचारों में रँगे हुए थे । वे साल भर से अमेरिका में विद्याध्ययन करते थे । कामिनी, भाई और पति के उपदेशों से पूरा-पूरा लाभ उठाने में कमी न न करती थी ।

(3)

लखनऊ में अलफ्रेड थियेटर कम्पनी आयी हुई थी, शहर में जहाँ देखिए उसी के तमाशे की चर्चा थी । कामिनी की रातें बड़े आनंद से कटती थीं । रात भर थियेटर देखती । दिन को कुछ सोती और कुछ देर वहीं थियेटर के गीत अलापती । सौंदर्य और प्रीति के नव रमणीय संसार में रमण करती थी, जहाँ का दुःख और क्लेश भी इस संसार के मुख और आनन्द से बढ़कर मोददायी है । यहाँतक कि तीन महीने बीत गये । प्रणय की नित्य नयी मनोहर शिक्षा और प्रेम के आनन्दमय आलाप-विलाप का हृदय पर कुछ न कुछ असर होना चाहिए था। सो भी इस चढ़ती जवानी में । वह असर हुआ । इसका श्रीगणेश उसी तरह हुआ जैसा कि बहुधा हुआ करता है । थियेटर हाल में एक सुघर सजीले युवक की आँखें कामिनी की ओर उठने लगीं । वह रूपवती और चंचला थी, अतएव पहिले उसे इस चितवन में किसी रहस्य का ज्ञान न हुआ । नेत्रों का सुंदरता से बड़ा घना सम्बंध है । घूरना पुरुषों का और लजाना स्त्रियों का स्वभाव है । कुछ दिनों के बाद कामिनी को इस चितवन में कुछ गुप्त भाव झलकने लगे । मंत्र अपना काम करने लगा । फिर नयनों में परस्पर बातें होने लगीं । नयन मिल गये । प्रीति गाढ़ी हो गयी । कामिनी एक दिन के लिए भी यदि किसी दूसरे उत्सव में चली जाती तो वहाँ उसका मन न लगता । जी उचटने लगता । आँखें किसी को ढूँढ़ा करतीं । अंत में लज्जा का बाँध टूट गया । हृदय के विचार स्वरूपवान् हुए । मौन का ताला टूटा प्रेमालाप होने लगा । पद्य के बाद गद्य की बारी आयी । और फिर दोनों मिलन-मंदिर के द्वार पर आ पहुँचे । इसके पश्चात् जो कुछ हुआ उसकी झलक हम पहिले ही देख चुके हैं ।

(4)

इस नवयुवक का नाम रूपचंद था । पंजाब का रहने वाला, संस्कृत का शास्त्री हिन्दी- साहित्य का पूर्ण पंडित, अंगरेजी का एम0 ए0, लखनऊ के एक बड़े लोहे के कारखाने का मैनेजर था । घर में रूपवती स्त्री, दो प्यारे बच्चे थे । अपने साथियों में सदाचरण के लिए प्रसिद्ध था । न जवानी की उमंग, न स्वभाव का छीछोरापन । घर गृहस्थी में जकड़ा हुआ था । मालूम नहीं वह कौन-सा आकर्षण था, जिसने उसे इस तिलिस्म में फँसा लिया, जहाँ की भूमि अग्नि, और आकाश ज्वाला है, जहाँ घृणा और पाप है । और अभागी कामिनी को क्या कहा जाय जिसकी प्रीति की बाढ़ ने वीरता और विवेक का बाँध तोड़ कर अपनी तरल तरंग में नीति और मर्यादा को टूटी-फूटी झोपड़ी को डुबो-दिया । यह पूर्व जन्म के संस्कार थे । रात को दस बज गये थे । कामिनी लेम्प के सामने बैठी हुई चिट्ठियाँ लिख रही थी । पहला पत्र रूपचंद के नाम था । कैलाश भवन लखनऊ प्राणाधार ! तुम्हारे पत्र को पढ़ कर प्राण निकल गये । उफ अभी एक महीना लगेगा । इतने दिनों में कदाचित् तुम्हें यहाँ मेरी राख भी न मिलेगी । तुमसे अपने दुःख क्या रोऊँ । बनावट के दोषारोपण से डरती हूँ । जो कुछ बीत रही है, वह मैं ही जानती हूँ । लेकिन बिना विरह-कथा सुनाये दिल की जलन कैसे जायगी ? यह आग कैसे ठंडी होगी ? अब मुझे मालूम हुआ कि यदि प्रेम दहकती हुई आग तो वियोग उसके लिए घृत है । थियेटर अब भी जाती हूँ, पर विनोद के लिए नहीं, रोने और विसूरने के लिए । रोने में ही चित्त को कुछ शान्ति मिलती है । आँसू उमड़े चले आते हैं । मेरा जीवन शुष्क और नीरस हो गया है । न किसी से मिलने को जी चाहता है, न आमोद-प्रमोद में मन लगता है । परसों डाक्टर केलकर का व्याख्यान था, भाई साहब ने बहुत आग्रह किया, पर मैं न जा सकी । प्यारे, मौत से पहले मत मारो । आनन्द के इन गिने-गिनाये क्षणों में वियोग का दुख मत दो । आओ, यथासाध्य शीघ्र आओ, और गले से लग कर मेरे हृदय की ताप बुझाओ । अन्यथा आश्चर्य नहीं कि विरह का यह अथाह सागर मुझे निगल जाय । तुम्हारी- कामिनी इसके बाद कामिनी ने दूसरा पत्र पति को लिखा । कैलाश भवन लखनऊ माय डियर गोपाल ! अब तक तुम्हारे दो पत्र आये, परंतु खेद है कि मैं उनका उत्तर न दे सकी। दो सप्ताह से सिर की पीड़ा से असह्य वेदना सह रही हूँ । किसी भाँति चित्त को शांति नहीं मिलती; पर अब कुछ स्वस्थ हूँ । कुछ चिंता मत करना । तुमने जो नाटक भेजे, उनके लिए में हार्दिक धन्यवाद देती हूँ । स्वस्थ हो जाने पर पढ़ना आरम्भ करूँगी । तुम वहाँ के मनोहर दृश्यों का वर्णन मत किया करो । मुझे तुम पर ईर्ष्या होती है । यदि में आग्रह करूँ तो भाई साहब वहाँ तक पहुँचा तो देंगे परंतु उनके खर्च इतने अधिक हैं कि इनसे नियमित रूप से साहाय्य मिलना कठिन है और इस समय तुम पर भार देना भी ठीक नहीं है । ईश्वर चाहेगा तो वह दिन शीघ्र देखने में आवेगा, जब मैं तुम्हारे साथ आनन्दपूर्वक वहाँ की सैर करूँगी । मैं इस समय तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं देना चाहती; पर अपनी आवश्यकताएँ किससे कहूँ । मेरे पास अब कोई अच्छा गाऊन नहीं रहा । किसी उत्सव में जाते लजाती हूँ । यदि तुमसे हो सके तो मेरे लिए एक अपने पसंद का गाउन बनवा कर भेज दो । आवश्यकता तो और भी कई चीजों की है, परंतु इस समय तुम्हें अधिक कष्ट देना नहीं चाहती । आशा है, तुम सकुशल होंगे । तुम्हारी- 27 कामिनी लखनऊ के सेशन जज के इजलास में बड़ी भीड़ थी । अदालत के कमरे ठसाठस भर गये थे । तिल रखने की जगह न थी सबकी दृष्टि बड़ी उत्सुकता के साथ जज के सम्मुख खड़ी एक सुंदर लावण्यमयी मूर्ति पर लगी हुई थी । यह कामिनी थी । उसका मुँह धुमिल हो रहा था । ललाट पर स्वेद-बिन्दु झलक रहे थे ! कमरे में घोर निस्तब्धता थी । केवल वकीलों की काना फूसी और सैन कभी-कभी इस निःस्तब्धता को भंग कर देती थी । अदालत का हाता आदमियों से इस तरह भर गया था कि जान पड़ता था मानों सारा शहर सिमट कर यहीं आ गया है । था भी ऐसा ही । शहर की प्रायः दूकाने बंद थीं और जो एक-आध खुली भी थीं उन पर लड़के बैठे ताश खेल रहे थे । क्योंकि कोई गाहक न था । शहर से कचहरी तक आदमियों का ताँता लगा हुआ था । कामिनी को निमिष मात्र देखने के लिए, उसके मुँह से एक बात सुनने के लिए, इस समय प्रत्येक आदमी अपना सर्वस्व निछावर करने पर तैयार था । वे लोग जो कभी पं0 दातादयाल शर्मा जैसे प्रभावशाली वक्ता की वक्तृता सुनने के लिए घर से बाहर नहीं निकले, वे जिन्होंने नवजवान मनचले बेटों को अलफ्रेड थियेटर में जाने की आज्ञा नहीं दी, वे एकांत-प्रिय जिन्हें वाइसराय के शुभागमन तक की खबर न हुई थी, वे शांति के उपासक जो मुहर्रम की चहल-पहल देखने को अपनी कुटिया से बाहर न निकलते थे, वे सभी आज गिरते-पड़ते; उठते कचहरी की ओर दौड़े चले जा रहे थे । बेचारी स्त्रियाँ अपने भाग्य को कोसती हुई अपनी-अपनी अटारियों पर चढ़ कर विवशतापूर्ण उत्सुक दृष्टि से उस तरफ ताक रही थीं जिधर उनके विचार में कचहरी थी । पर उनकी गरीब आँखें निर्दय अट्टालिकओं की दीवारों में टकरा कर लौट आती थीं । यह सब कुछ इसलिए हो रहा था कि आज अदालत में एक बड़ा मनोहर, अद्भुत अभिनय होनेवाला था, जिस पर अलफ्रेड थियेटर के हजारों अभिनय बलिदान थे । आज एक गुप्त रहस्य खुलनेवाला था, जो अँधेरे में राई है पर प्रकाश में पर्वताकार हो जाता है । इस घटना के सम्बन्ध में लोग टीका-टिप्पणी कर रहे थे । कोई कहता था, यह असंभव है कि रूपचंद जैसा शिक्षित व्यक्ति ऐसा दूषित कर्म करे । पुलिस का यह बयान है तो हुआ करे । गवाह पुलिस के बयान का समर्थन करते हैं तो किया करें । यह पुलिस का अत्याचार है, अन्याय है; कोई कहता था, भाई सत्य तो यह है कि यह रूप -लावण्य, यह “खंजन गंजन नयन’ और यह हृदय-हारिणी सुंदर सलोनी छवि जो कुछ न करे वह थोड़ा है । श्रोता इन बातों को बड़े चाव से इस तरह आश्चर्यान्वित हो मुँह बा कर सुनते थे मानों देववाणी हो रही है । सबकी जीभ पर यही चर्चा थी । खूब नमक-मिर्च लपेटा जाता था । परंतु इसमें सहानुभूति या समवेदना के लिए जरा भी स्थान न था ।

(6)

पंडित कैलाशनाथ का बयान खत्म हो गया । और कामिनी इजलास पर पधारी । इसका बयान बहुत संक्षिप्त था, मैं अपने कमरे में रात को सो रही थी । कोई एक बजे के करीब चोर-चोर का हल्ला सुनकर मैं चौंक पड़ी अपनी चारपाई के पास चार आदमियों को हाथापाई करते देखा । मेरे भाई साहब अपने दो चौकीदारों के साथ अभियुक्त को पकड़ते थे और वह जान छुड़ा कर भागना चाहता था । मैं शीघ्रता से उठकर बरामदे में निकल आयी । इसके बाद मैंने चौकी- दारों को अपराधी के साथ पुलिस स्टेशन की ओर जाते देखा । रूपचंद ने कामिनी का बयान सुना और एक ठंडी साँस ली । नेत्रों के आगे से परदा हट गया । कामिनी, तू ऐसी कृतघ्न, ऐसी अन्यायी, ऐसी पिशाचिनी, ऐसी दुरात्मा है, क्या तेरी प्रीति, वह विरह-वेदना, वह प्रेमोद्गार, सब धोखे की टट्टी थी ? तूने कितनी बार कहा है कि दृढ़ता प्रेम मंदिर की पहिली सीढ़ी है । तूने कितनी बार नयनों में आँसू भर कर इस गोद में मुँह छिपा कर मुझसे कहा है कि मैं तुम्हारी हो गयी । मेरी लाज अब तुम्हारे हाथ है । परंतु हाय! आज प्रेम-परीक्षा के समय तेरी वह सब बातें खोटी उतरीं । आह! तूने दगा दिया और मेरा जीवन मिट्टी में मिला दिया । रूपचंद तो विचार-तरंगों में निमग्न था । उसके वकील ने कामिनी से जिरह करना प्रारम्भ किया । वकील – क्या तुम सत्यनिष्ठा के साथ कह सकती हो कि रूपचंद तुम्हारे मकान पर अक्सर नहीं जाया करता था ? कामिनी – मैंने कभी उसे अपने घर पर नहीं देखा । वकील -क्या तुम शपथ-पूर्वक कह सकती हो कि तुम उसके साथ कभी थियेटर देखने नहीं गयीं ? कामिनी – मैंने उसे कभी नहीं देखा । वकील-क्या तुम शपथ लेकर कह सकती हो कि तुमने उसे प्रेम-पत्र नहीं लिखे ? शिकारी के चंगुल में फँसे हुए पक्षी की तरह पत्र का नाम सुनते ही कामिनी के होश- हवास उड़ गये, हाथ-पैर फूल गये । मुँह न खुल सका । जज ने, वकील ने और दो सहस्त्र आँखों ने उसकी तरफ उत्सुकता से देखा । रूपचंद का मुँह खिल गया । उसके हृदय में आशा का उदय हुआ । जहाँ फूल था वहाँ काँटा पैदा हुआ । मन में कहने लगा, कुलटा कामिनी! अपने सुख और अपने कपट मान-प्रतिष्ठा पर मेरे और मेरे परिवार की हत्या करने वाली कामिनी!! तू अब भी मेरे हाथ में है । मैं अब भी तुझे इस कृतघ्नता और कपट का दंड दे सकता हूँ । तेरे पत्र जिन्हें तूने हृदय से लिखा है या नहीं, मालूम नहीं परंतु जो मेरे हृदय के ताप को शीतल करने के लिए मोहिनी मंत्र थे, वह सब मेरे पास हैं । और वह इसी समय तेरा सब भेद खोलेंगे । इस क्रोध से उन्मत्त हो कर रूपचंद ने अपने कोट के पाकेट में हाथ डाला ! जज ने, वकीलों ने, और दो सहस्त्र नेत्रों ने उसकी तरफ चातक की भाँति देखा । तब कामिनी की विकल आँखे चारों ओर से हताश होकर रूपचंद की ओर पहुँची । उनमें इस समय लज्जा थी, दया-भिक्षा की प्रार्थना थी और व्याकुल थी, मन ही मन कहती थी, मैं स्त्री हूँ, अबला हूँ, ओछी हूँ । तुम पुरुष हो बलवान हो, साहसी हो; यह तुम्हारे स्वभाव के विपरीत है । मैं कभी तुम्हारी थी और यद्यपि समझ मुझे तुमसे अलग किये देती देती है किंतु मेरी लाज तुम्हारे हाथ में है । तुम मेरी रक्षा करो । आँखें मिलते ही रूपचंद उसके मन की बात ताड़ गये । उनके नेत्रों ने उत्तर दिया- यदि तुम्हारी लाज मेंरे हाथों में है तो इस पर कोई आँच नहीं आने पावेगी । तुम्हारी लाज पर आज मेरा सर्वस्व निछावर है । अभियुक्त के वकील ने कामिनी से पुनः वही प्रश्न किया-क्या तुम शपथ पूर्वक कह सकती हो कि तुमने रूपचंद को प्रेम-पत्र नहीं लिखे ? कामिनी ने कातर स्वर में उत्तर दिया- मैं शपथपूर्वक कहती हूँ कि मैंने उसे कभी कोई पत्र नहीं लिखा और अदालत से अपील करती हूँ कि वह मुझे इन घृणास्पद अश्लील आक्रमणों से बचावे । अभियोग की कार्यवाही समाप्त हो गयी । अब अपराधी के बयान की बारी आयी । इसकी तरफ के कोई गवाह न थे । परंतु वकीलों को जज को, और अधीर जनता को पूरा पूरा विश्वास था कि अभियुक्त का बयान पुलिस के मायावी महल को क्षणमात्र में छिन्न-भिन्न कर देगा । रूपचंद इजलास के सम्मुख आया । इसके मुखारविंद पर आत्म-बल का तेज झलक रहा था और नेत्रों में साहस और शान्ति । दर्शक-मंडली उतावली हो कर अदालत के कमरे ,में घुस पड़ी रूपचंद इस समय का चाँद था या देवलोक का दूत; सहस्त्रों नयन उसकी ओर लगे थे । किंतु हृदय को कितना कौतूहल हुआ जब रूपचंद ने अत्यंत शान्त चित्त से अपना अपराध स्वीकार कर लिया ! लोग एक दूसरे का मुँह ताकने लगे । अभियुक्त का बयान समाप्त होते ही कोलाहल मच गया । सभी इसकी आलोचना-प्रत्यालोचना करने लगे । सबके मुँह पर आश्चर्य था,संदेह था, और निराशा थी । कामिनी की कृतघ्नता और निष्ठुरता पर धिक्कार हो रही थी । प्रत्येक मनुष्य शपथ खाने पर तैयार था कि रूपचंद सर्वथा निर्दोष है । प्रेम ने उसके मुँह पर ताला लगा दिया है । पर कुछ ऐसे भी दूसरे के दुःख में प्रसन्न होनेवाले स्वभाव के लोग थे जो उसके इस साहस पर हँसते और मजाक उड़ाते थे । दो घंटे बीत गये । अदालत में पुनः एक बार शान्ति का राज्य हुआ । जज साहब फैसला सुनाने के लिए खड़े हुए । फैसला बहुत संक्षिप्त था । अभियुक्त जवान है । शिक्षित है और सभ्य है । अतएव आँखों वाला अंधा है । इसे शिक्षाप्रद दण्ड देना आवश्यक है । अपराध स्वीकार करने से उसका दण्ड कम नहीं होता है । अतः मैं उसे पाँच वर्ष के सपरिश्रम कारावास की सजा देता हूँ । दो हजार मनुष्यों ने हृदय थाम कर फैसला सुना । मालूम होता था कि कलेजे में भाले चुभ गये हैं ! सभी का मुँह निराशा-जनक क्रोध से रक्त-वर्ण हो गया था । यह अन्याय है, कठोरता और बेरहमी है । परन्तु रूपचंद के मुँह पर शान्ति विराज रही थी ।

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