मानसरोवर भाग 1

12 – ब्रह्म का स्वाँग

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

——————

स्त्री मैं वास्तव में अभागिन हूँ, नहीं तो क्या मुझे नित्य ऐसे-ऐसे घृणित दृश्य देखने पड़ते ! शोक की बात यह है कि वे मुझे केवल देखने ही नहीं पड़ते वरन् दुर्भाग्य ने उन्हें मेरे जीवन का मुख्य भाग बना दिया है । मैं उस सुपात्र ब्राह्मण की कन्या हूँ जिसकी व्यवस्था बड़े-बड़े गहन धार्मिक विषयों पर सर्वमान्य समझी जाती है । मुझे याद नहीं, घर पर कभी बिना स्नान और देवोपासना किये पानी की एक बूँद भी मुँह में डाली हो मुझे एक बार कठिन ज्वर में स्नानादि के बिना दवा पीनी पड़ी थी; उसका मुझे महीनों खेद रहा । हमारे घर में धोबी कदम नहीं रखने पाता ! चमारिन दालान में भी नहीं बैठ सकती थी । किंतु यहाँ आकर मैं मानो भ्रष्टलोक में पहुँच गयी हूँ । मेरे स्वामी बड़े दयालु, बड़े चरित्र-वान और बड़े सुयोग्य पुरुष हैं ! उनके यह सद्गुण देख कर मेरे पिता जी उन पर मुग्ध हो गये थे । लेकिन ! वे क्या जानते थे कि यहाँ लोग अघोर-पंथ के अनुयायी हैं । संध्या और उपासना तो दूर रही, कोई नियमित रूप से स्नान भी नहीं करता । बैठक में नित्य मुसलमान, क्रिस्तान सब आया-जाया करते हैं और स्वामी जी वहीं बैठ-बैठे पानी , दूध चाय पी लेते हैं । इतना ही नहीं, वह वहीं बैठे -बैठे मिठाइयाँ भी खा लेते हैं । अभी कल की बात है, मैंने उन्हें लेमोनेड पीते देखा था । साईस जो चमार है, बेरोक टोक घर में चला आता है । सुनती हूँ वे अपने मुसलमान मित्रों के घर दावतें खाने भी जाते हैं । यह भ्रष्टाचार मुझसे नहीं देखा जाता । मेरा चित्त घृणा से व्यस्त हो जाता है । जब वे मुस्कराते हुए मेरे समीप आ जाते हैं और हाथ पकड़ कर अपने समीप बैठा लेते हैं तो मेरा जी चाहता है कि धरती फट जाय और मैं उसमें समा जाऊँ । हा हिंदू जाति ! तूने हम स्त्रियों को पुरुषों की दासी बनाना ही क्या हमारे जीवन का परम कर्तव्य बना दिया ! हमारे विचारों का, हमारे सिद्धांतों का, यहाँ तक कि हमारे धर्म का भी कुछ मूल्य नहीं रहा । * * * अब मुझे धैर्य नहीं । आज मैं इस अवस्था का अंत कर देना चाहती हूँ । मैं इस आसुरिक भ्रष्टजाल से निकल जाऊँगी । मैंने अपने पिता की शरण में जाने का निश्चय कर लिया है आज यहाँ सहभोजन हो रहा है, मेरे पति उसमें सम्मिलित ही नहीं, वरन् उसके मुख्य प्रेषकों में हैं । इन्हीं के उद्योग तथा प्रेरणा से यह विधर्माय अत्याचार हो रहा है । समस्त जातियों के लोग एक साथ बैठ कर भोजन कर रहे हैं । सुनती हूँ, मुसलमान भी एक पंक्ति में बैठे हुए है । प्रकाश क्यों नहीं गिर पड़ता ! क्या भगवान धर्म की रक्षा करने के लिए अवतार न लेंगे ? ब्राह्मण जाति अपने निजी बंधुओं के सिवाय अन्य ब्राह्मणों का भी पकाया भोजन नहीं करती, वही महान् जाति इस अधोगति को पहुँच गयी कि कायस्थों, बनियों, मुसलमानों के साथ बैठ कर खाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करती, बल्कि इसे जातीय गौरव, जातीय एकता का हेतु समझती है । पुरुष — वह कौन शुभ घड़ी होगी कि इस देश की स्त्रियों में ज्ञान का उदय होगा और वे राष्ट्रीय संगठन में पुरुषों की सहायता करेंगी ? हम कब तक ब्राह्मणों के गोरख धंधे में फँसे रहेंगे ? हमारे विवाह-प्रवेश कब तक जानेंगे कि स्त्री और पुरुष के विचारों की अनूकूलता और समानता गोत्र और वर्ण से कहीं अधिक महत्व रखती है । यदि ऐसा ज्ञात होता तो मैं वृन्दा का पति न होता और न वृन्दा मेरी पत्नि । हम दिनों के विचार में जमीन और आसमान का अन्तर है । यद्यपि वह प्रत्यक्ष नहीं कहती , किंतु मुझे विश्वास है कि वह मेरे विचारों को घृणा की दृष्टि से देखती है । मुझे ऐसा ज्ञात होता है कि वह मुझे स्पर्श भी नहीं करना चाहती । यह उसका दोष नहीं, यह हमारे माता-पिता का दोष है, जिन्होंने हम दोनों पर ऐसा घोर अत्याचार किया । * * * कल वृन्दा खुल पड़ी । मेरे कई मित्रों ने सहभोज का प्रस्ताव किया था मैंने उसका सहर्ष समर्थन किया । कई दिन के वाद-विवाद के पश्चात अंत को कल कुछ गिने-गिनाये सज्जनों ने सहभोज का सामान कर ही डाला । मेरे अतिरिक्त केवल चार और सज्जन ब्राह्मण थे, शेष अन्य जातियों के लोग थे । यह उदारता वृन्दा के लिए असह्य हो गयी । जब मैं भोजन करके लौटा तो वह ऐसी विकल थी मानों उसके मर्मस्थल पर आघात हुआ हो । मेरी ओर विषाद-पूर्ण नेत्रों से देख कर बोली – अब तो स्वर्ग का द्वार अवश्य खुल गया होगा ! यह कठोर शब्द मेरे हृदय पर तीर के समान लगे ! ऐंठ कर बोला – स्वर्ग और नर्क की चिंता में वे रहते हैं – जो अपाहिज हैं, कर्तव्य-हीन हैं निर्जीव हैं । हमारा स्वर्ग और नर्क सब इसी पृथ्वी पर है । हम इस कर्मक्षेत्र में कुछ कर जाना चाहते हैं वृन्दा – धन्य है आपके पुरुषार्थ को, आपके सामर्थ्य को । आज संसार में सुख और शांति का साम्राज्य हो जायगा । आपने संसार का उद्धार कर दिया । इससे बढ़ कर उसका कल्याण क्या हो सकता है ! मैंने झुँझला कर कहा – जब तुम्हें इन विषयों के समझने की ईश्वर ने बुद्धि ही नहीं दी, तो क्या समझाऊँ । इस पारस्परिक भेद भाव से हमारे राष्ट्र को जो हानि हो रही है उसे मोटी से मोटी बुद्धि का मनुष्य भी समझ सकता है । इस भेद को मिटाने से देश का कितना कल्याण होता है, इसमें किसी को संदेह नहीं । हाँ, जो जानकार भी अनजान बने उसकी बात दूसरी है । वृन्दा – बिना एक साथ भोजन किये परस्पर प्रेम उत्पन्न नहीं हो सकता है । मैंने इस विवाद में पड़ना अनुपयुक्त समझा । किसी ऐसी नीति की शरण लेनी आवश्यक जान पड़ी, जिसमें विवाद का स्थान ही न हो । वृन्दा की धर्म पर बड़ी श्रद्धा है, मैंने उसी के शास्त्र से उसे पराजित करना निश्चय किया । बड़े गम्भीर भाव से बोला- यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है । किंतु सोचो तो यह कितना घोर अन्याय है कि हम सब एक पिता की संतान होते हुए भी एक दूसरे से घृणा करें, ऊँच नीच की व्यवस्था में मग्न रहें । यह सारा जगत उसी परमपिता का विराट रूप है । प्रत्येक जीव में उसी परमात्मा की ज्योति आलोकित हो रही है । केवल इसी भौतिक परदे ने हमें एक दूसरे से पृथक कर दिया है । यथार्थ में हम सब एक हैं । जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अलग-अलग घरों में जाकर भिन्न नहीं हो जाता, उसी प्रकार ईश्वर की महान् आत्मा पृथक -पृथक जीवों में प्रविष्ट हो कर विभिन्न नहीं होती … मेरी इस ज्ञान-वर्षा ने वृन्दा के शुष्क हृदय को तृप्त कर दिया । वह तन्मय हो कर मेरी बात सुनती रही । जब में चुप हुआ तो उसने मुझे भक्ति-भाव से देखा और रोने लगी ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Select Dropdown

Page Not Found
404

Page Not Found

The page you requested is not here. It may have moved, or the link is out of date. Check the address, or go back to Data Portal Home