96. राग नट – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग नट

[138]

…………$

मोहन, मानि मनायौ मेरौ ।

हौं बलिहारी नंद-नँदन की, नैकु इतै हँसि हेरौ ॥

कारौ कहि-कहि तोहि खिझावत, बरज त खरौ अनेरौ ।

इंद्रनील मनि तैं तन सुंदर, कहा कहै बल चेरौ ॥

न्यारौ जूथ हाँकि लै अपनौ, न्यारी गाइ निबेरौ ।

मेरौ सुत सरदार सबनि कौ, बहुते कान्ह बड़ेरौ ॥

बन में जाइ करो कौतूहल, यह अपनौ है खेरौ ।

सूरदास द्वारैं गावत है, बिमल-बिमल जस तेरौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती हैं) ‘मोहन! मेरा मान मनाया (बहुत दुलारा) लाल है । मैं इस नन्द-नन्दनकी बलिहारी जाती हूँ, लाल! तनिक हँसकर इधर तो देखो । काला कह- कहकर दाऊ तुम्हें चिढ़ाता है ? तुम्हें खेलनेसे रोकता? वह तो सचमुच बड़ा ऊधमी है, तुम्हारा शरीर तो इन्द्र-नीलमणिसे भी सुन्दरहै; भला, तुम्हारा सेवक दाऊ तुम्हें क्या कहेगा । अपनी गायोंको छाँटकर अलग कर लो,वह अपनी गायों के झुण्ड अलग हाँक ले? मेरा पुत्र तो सबका सरदार है, मेराकन्हाई बहुत बड़ा है; तुम वनमें जाकर क्रीड़ा करो, यह तो अपना गाँव है (यहाँ तुम्हें कोई कुछ नहीं कह सकता) । सूरदासजी कहते हैं- प्रभो! मैं भी द्वारपर खड़ा आपका अत्यन्त निर्मल यश गा रहा हूँ ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Select Dropdown

Page Not Found
404

Page Not Found

The page you requested is not here. It may have moved, or the link is out of date. Check the address, or go back to Data Portal Home