91. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

[130]

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तुम जागौ मेरे लाड़िले, गोकुल -सुखदाई ।

कहति जननि आनन्द सौं, उठौ कुँवर कन्हाई ॥

तुम कौं माखन-दूध-दधि, मिस्री हौं ल्याई ।

उठि कै भोजन कीजिऐ, पकवान-मिठाई ॥

सखा द्वार परभात सौं, सब टेर लगाई ।

वन कौं चलिए साँवरे, दयौ तरनि दिखाई ॥

सुनत बचन अति मोद सौं जागे जदुराई ।

भोजन करि बन कौं चले, सूरज बलि जाई ॥

माता आनन्दपूर्वक कह रही है–मेरे लाड़िले, गोकुलको सुखदेने वाले लाल तुम जागो! कुँवर कन्हाई ! उठो, तुम्हारे लिये मैं मक्खन, दूध दही और मिश्री ले आयी हूँ । उठकर पकवान और मिटाइयोंका भोजन करो । सबेरेसे ही सब सखा द्वारपर खड़े पुकार रहे हैं कि ‘श्यामसुन्दर! देखो , सूर्य दिखायी देने लगा अब वनको चलो ।’ (माताकी) यह बात सुनकर श्रीयदुनाथ अत्यन्त आनन्दसे जागे और भोजन करके वनको चल पड़े । सूरदास इनपर बलिहारी जाता है ।

[131]

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भोर भयौ जागौ नँद-नंद ।

तात निसि बिगत भई, चकई आनंदमई, तरनि की किरन तैं चंद भयौ नंद ॥

तमचूर खग रोर, अलि करैं बहु सोर, बेगि मोचन करहु, सुरभि-गल-फंद ।

उठहु भोजन करहु, खोरी उतारि धरहु, जननि प्रति देहु सिसु रूप निज कंद ॥

तीय दधि-मथन करैं, मधुर धुनि श्रवन परैं, कृष्न जस बिमल गुनि करति आनंद ।

सूरप्रभु हरि-नाम उधारत जग-जननि, गुननि कौं देखि कै छकित भयौ छंद ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती हैं -) ‘सबेरा हो गया, नन्दनन्दन ! जागो । लाल ! रात बीत गयी । (सबेरा होनेसे) चक्रवाकी (पक्षी) को आनन्द हो रहा है, सूर्य की किरणों से चन्द्रमा तेजोहीन हो गया । मुर्गे तथा अन्य पक्षी कोलाहल कर रहे हैं, भौंरे खूब गुंजार करने लगे हैं; अब तुम झटपट गायोंके गलेकी रस्सियाँ खोल दो । उठो, भोजन करो, (मुख धोकर कल की लगी) चंदन की खौर उतार दो, मैयाको अपने आनन्द कन्द शिशु -मुखको दिखलाऔ । गोपियाँ दधि-मन्थन करने लगी हैं, उसकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ रही है, कृष्णचन्द्र ! वे तुम्हारे निर्मल यशका स्मरण करके (उसे गाती हुई ) आनन्द मना रही है । सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामीका नाम ही संसारके लोगों का उद्धार कर देता है, उनके गुणोंको देखकर तो वेद भी चकरा जाते हैं (वे भी उनके गुणों का वर्णन नहीं कर पाते )।

[133]

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जागिये गुपाल लाल! ग्वाल द्वार ठाढ़े ।

रैनि-अंधकार गयौ, चंद्रमा मलीन भयौ, तारागन देखियत नहिं तरनि-किरनि बाढ़े ॥

मुकुलित भये कमल-जाल, गुंज करत भृंग-माल, प्रफुलित बन पुहुप डाल, कुमुदिनि कुँभिलानी ।

गंध्रबगन गान करत, स्नान दान नेम धरत, हरत सकल पाप, बदत बिप्र बेद-बानी ॥

बोलत,नँद बार-बार देखैं मुख तुव कुमार, गाइनि भइ बड़ी बार बृंदाबन जैबैं ।

जननि कहति उठौ स्याम, जानत जिय रजनि ताम, सूरदास प्रभु कृपाल , तुम कौं कछु खैबैं ॥

भावार्थ / अर्थ :– जागो; द्वारपर सब गोप (तुम्हारी प्रतीक्षामें ) खड़े हैं । रात्रिका अन्धकार दूर हो गया, चंद्रमा मलिन पड़ गया, अब तारे नहीं दीख पड़ते, सूर्यकी किरणें फैल रही हैं, कमलोंके समूह खिल गये, भ्रमरोंका झुंड गुंजार कर रहा है, वनमें पुष्प (वृक्षोंकी) डालियों पर खिल उठे, कुमुदिनी संकुचित हो गयी, गन्धर्वगण गान कर रहे हैं । इस समय स्नान-दान तथा नियमोंका पालन करके अपने सारे पाप दूर करते हुए विप्रगण वेदपाठ कर रहे हैं । श्रीनन्दजी बार-बार पुकारते हैं-‘कुमार! उठो, तुम्हारा मुख तो देखें; गायोंको वृन्दावन (चरने) जानेमें बहुत देर हो गयी । माता कहती हैं – ‘श्यामसुन्दर उठो । अभी तुम मनमें रात्रिका अन्धकार ही समझ रहे हो? सूरदासजी कहते हैं–मेरे कृपालु स्वामी आपको कुछ भोजन भी तो करना है (अतः अब उठ जाइये)।

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