69. राग आसावरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग आसावरी

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तनक दै री माइ, माखन तनक दै री माइ ।

तनक कर पर तनक रोटी, मागत चरन चलाइ ॥

कनक-भू पर रतन रेखा, नेति पकर््यौ धाइ ।

कँप्यौ गिरि अरु सेष संक्यौ, उदधि चल्यौ अकुलाइ ।

तनक मुख की तनक बतियाँ, बोलत हैं तुतराइ ।

जसोमति के प्रान-जीवन, उर लियौ लपटाइ ॥

मेरे मन कौ तनक मोहन, लागु मोहि बलाइ ।

स्याम सुंदर नँद-कुँवर पर, सूर बलि-बलि जाइ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्यामसुंदर) अपने चरणोंको चलाते – नाचते हुए छोटे-से हाथपर छोटी सी रोटी माँगते हैं – (और कहते हैं) मैया ! थोड़ा-सा -थोड़ा-सा माखन दे!’ स्वर्ण भूमिपर रत्न (नीलम) की रेखा जैसे खिंच गयी हो, इस प्रकार वे दौड़े और मथानीकी रस्सी पकड़ ली । इससे (कहीं फिर समुद्र-मन्थन न करें, यह सोचकर) मन्दराचल काँपने लगा, शेषनाग शंकित हो उठे और समुद्र व्याकुल हो गया । छोटे-से मुखसे थोड़े-थोड़े शब्द तुतलाते हुए बोलते हैं । माता यशोदाके ये प्राण हैं, जीवन हैं, मैयाने इन्हें हृदयसे लिपटा लिया । (माताने बलैया लेते हुए कहा-) ‘मेरे चित्तको मोहित करनेवाले मेरे नन्हें लाल! तुम्हारी सब आपत्ति-विपत्ति मुझे लग जाय ।’ सूरदास तो इस नन्दनन्दन श्यामसुन्दरपर बार-बार न्योछावर है ।

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