10. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

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 आजु बधायौ नंदराइ कैं, गावहु मंगलचार ।

आईं मंगल-कलस साजि कै, दधि फल नूतन-डार ॥

उर मेले नंदराइ कैं, गोप-सखनि मिलि हार ।

मागध-बंदी-सूत अति करत कुतूहल बार ॥

आए पूरन आस कै, सब मिलि देत असीस ।

नंदराइ कौ लाड़िलौ, जीवै कोटि बरीस ॥

तब ब्रज-लोगनि नंद जू, दीने बसन बनाइ ।

ऐसी सोभा देख कै, सूरदास बलि जाइ ॥

भावार्थ / अर्थ :– आज श्रीनन्दरायजी के यहाँ मंगल-बधाई बज रही है, सब मंगलगान करो । (गोपियाँ) मंगल-कलश सजाकर दही, फल तथा (आमकी) नवीन डालियाँ (टहनियाँ) लिये आयीं । गोप-सखाओं ने एकत्र होकर श्रीनन्दरायजीके गले में पुष्पों की माला पहनायी । सूत, मागध, बंदीजन बार-बार अनेक प्रकार के विनोद कर रहे हैं । जो भी आये, व्रजराज ने उनकी आशाएँ पूर्ण कीं । सभी मिलकर आशीर्वाद दे रहे हैं कि ‘श्रीनन्दरायजीके। लाड़िले लाल करोड़ों वर्ष जीवें ।’ श्रीनन्दजी ने सभी व्रज के लोगों को सजाकर वस्त्र दिये । ऐसी शोभाको देखकर सूरदास अपनेको ही न्यौछावर करता है ।

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