83. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

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लै लै मोहन ,चंदा लै ।

कमल-नैन! बलि जाउँ सुचित ह्वै, नीचैं नैकु चितै ॥

जा कारन तैं सुनि सुत सुंदर, कीन्ही इती अरै ।

सोइ सुधाकर देखि कन्हैया, भाजन माहिं परै ॥

नभ तैं निकट आनि राख्यौ है, जल-पुट जतन जुगै ।

लै अपने कर काढ़ि चंद कौं, जो भावै सो कै ॥

गगन-मँडल तैं गहि आन्यौ है, पंछी एक पठै ।

सूरदास प्रभु इती बात कौं कत मेरौ लाल हठै ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती हैं -) ‘लो! मोहन, चंद्रमाको लो ! कमललोचन! मैं तुमपर बलिहारी जाती हूँ, तनिक नीचे देखो तो । मेरे सुन्दर लाल! सुनो–जिसके लिये तुमने इतनी हठ की, वही चन्द्रमा बर्तनमें पड़ा है; कन्हाई ! इसे देखो । इसे उपाय करके आकाशसे ; लाकर तुम्हारे पास पानीके बर्तन में सँभालकर रख दिया है; अब तुम अपने हाथ से चन्द्रमा को निकाल लो और जो इच्छा हो, इसका करो । एक पक्षीको भेजकर इसे आकाश से मँगाया है ।’ सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी से मैया कह रही हैं- ‘मेरे लाल! इतनी-सी बातके लिये क्यों हठ कर रहे हो ?’