16. राग जैजैवंती – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग जैजैवंती

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(माई) आजु तौ बधाइ बाजै मंदिर महर के ।

फूले फिरैं गोपी-ग्वाल ठहर ठहर के ॥

फूली फिरैं धेनु धाम, फूली गोपी अँग अँग ।

फूले फरे तरबर आनँद लहर के ॥

फूले बंदीजन द्वारे, फूले फूले बंदवारे ।

फूले जहाँ जोइ सोइ गोकुल सहर के ॥

फूलैं फिरैं जादौकुल आनँद समूल मूल ।

अंकुरित पुन्य फूले पाछिले पहर के ॥

उमँगे जमुन-जल, प्रफुलित कुंज-पुंज ।

गरजत कारे भारे जूथ जलधर के ॥

नृत्यत मदन फूले, फूली, रति अँग अँग ।

मन के मनोज फूले हलधर वर के ॥

फूले द्विज-संत-बेद, मिटि गयौ कंस-खेद ।

गावत बधाइ सूर भीतर बहर के ॥

फूली है जसोदा रानी, सुत जायौ सार्ङ्गपानी ।

भूपति उदार फूले भाग फरे घर के ॥

भावार्थ / अर्थ :– (सखी) आज तो व्रजराज के भवन में बधाई बज रही है । गोपियाँ और गोप उत्फुल्ल हुए रुक-रुककर (आनन्दक्रीड़ा करते) घूम रहे हैं। गायें गोष्ठों में आनन्दमग्न घूम रही हैं, गोपियों के अंग-अंग पुलकित हैं । आनन्दोल्लास से सभी वृक्ष फूल उठे और फलित हो गये हैं । द्वारपर वन्दीजन प्रफुल्लित फूलों के बन्दनवार बाँधे गये हैं, आज गोकुलनगर में जो जहाँ है, वहीं प्रफुल्लित हो रहा है । यदुकुलके लोग आनन्द से उल्लसित घूम रहे हैं, उनके पिछले जन्मोंके पुण्य आज अपने मूल के साथ अंकुरित होकर फूल उठे हैं (उनके जन्म-जन्मान्तरके पुण्यों का फल उदय हो गया है )। यमुनाका जल उमंग में उमड़ रहा है, कुण्जों के समूह प्रफुल्लित हो गये हैं, मेघोंके बड़े-बड़े काले-काले समूह गर्जना कर रहे हैं, कामदेव उल्लसित होकर नाच रहा है, रति के अंग-अंग उल्लसित हैं (कि अब मेरे पति अनंगको शरीर प्राप्त होगा।) वे श्रीकृष्णचन्द्रके पुत्र बन सकेंगे) बड़े भाई श्रीबलरामजीके चित्तकी सभी अभिलाषाएँ उत्फुल्ल हो गयी (पूर्ण हो गयी) हैं । ब्राह्मण, सत्पुरुष और वेद उल्लसित हैं, उनका कंससे होनेवाला भय दूर हो गया है । सूरदासजी कहते हैं कि सभी (घरोंसे) बाहर निकल कर बधाई गा रहे हैं । श्रीयशोदारानी प्रफुल्लित हो रहीं हैं, साक्षात् शार्ङ्गपाणि श्रीहरि उनके पुत्र होकर प्रकट हुए हैं । उदार व्रजराज प्रफुल्लित हैं, आज उनके भवन का सौभाग्य फलशाली हो गया (भवनमें पुत्र आ गया) है ।