143. राग कान्हरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कान्हरौ

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इन अँखियन आगैं तैं मोहन, एकौ पल जनि होहु नियारे ।

हौं बलि गई, दरस देखैं बिनु, तलफत हैं नैननि के तारे ॥

औरौ सखा बुलाइ आपने, इहिं आगन खेलौ मेरे बारे ।

निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं, सुंदर बाल-बिनोद तिहारे ॥

मधु, मेवा, पकवान, मिठाई, व्यंजन खाटे, मीठे, खारे ।

सूर स्याम जोइ-जोइ तुम चाहौ, सोइ-सोइ माँगि लेहु मेरे बारे ॥

सूरदासजी कहते हैं- (माता कह रही हैं ) ‘मोहन! मेरी इन आँखोंके सामने से एक क्षण के लिये भी अलग (ओझल) मत हुआ करो । मैं तुमपर बलिहारी जाती हूँ, तुम्हारा दर्शन किये बिना मेरे नेत्रों की पुतलियाँ तड़पती ही रहती हैं मेरे लाल ! दूसरे सखाओं को भी बुलाकर अपने इसी आँगनमें खेलो । सर्प जैसे (अपनी) मणिको देखता रहता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारी सुन्दर बालक्रीड़ा को देखती रहूँ । मधु, मेवा, पकवान, मिठाई तथा खट्टे, मीठे, चरपरे -जो-जो भी व्यञ्जन श्यामसुन्दर ! तुम्हें चाहिये, मेरे लाल ! वही वही तुम माँग लिया करो ।’