100. राग बिहागरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिहागरौ

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खेलन दूरि जात कत कान्हा ?

आजु सुन्यौं मैं हाऊ आयौ, तुम नहिं जानत नान्हा ॥

इक लरिका अबहीं भजि आयौ, रोवत देख्यौ ताहि ।

कान तोरि वह लेत सबनि के, लरिका जानत जाहि ॥

चलौ न, बेगि सवारैं जैयै, भाजि आपनैं धाम ।

सूर स्याम यह बात सुनतहीं बोलि लिए बलराम ॥

भावार्थ / अर्थ :– (कोई सखा कहता है–) ‘कन्हाई ! दूर खेलने क्यों जा रहे हो? आज मैंने सुना कि हाऊ (हौआ) आया है; तुम नन्हें हो, इससे उसे नहीं जानते । एक लड़का अभी भागा आया है, मैंने उसे रोते देखा है, वह हाऊ जिन्हें लड़का समझता है; उन सबों के कान उखाड़ लेता है । मेरे साथ चलो न, सबेरे (जल्दी) ही अपने घर भागकर चले चलें ।’सूरदासजी कहते हैं कि यह बात सुनते ही श्यामसुन्दर ने बलरामजी को बुला लिया ।