209. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

[285]

………..$

बन में आवत धेनु चराए ।

संध्या समय साँवरे मुख पर, गो-पद-रजि लपटाए ॥

बरह-मुकुट कैं निकट लसति लट, मधुप मनौ रुचि पाए ।

बिलसत सुधा जलज-आनन पर उड़त न जात उड़ाए ।

बिधि-बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए ॥

एक बरन बपु नहिं बड़-छोटे, ग्वाल बने इक धाए ।

सूरदास बलि लीला प्रभु की, जीवत जन जस गाए ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्याम) वनसे गायें चराकर आ रहे हैं । संध्याके समय उनके साँवले मुखपर गायोंके खुरसे उड़ती धूलि लगी है । मयूरपिच्छके पास अलकें ऐसी शोभा देती हैं मानो भौंरे अमृतपूर्ण खिले कमलके समान मुखके चारों ओर रुचिपूर्वक बैठे हैं और उड़ानेसे भी उड़ते नहीं । हृदयपर मोतियोंकी माला पहन रखी है, जो (बड़ी) शोभा दे रही है । सभी गोपबालक एक समान रंग-रूप तथा अवस्था के हैं, कोई बड़ा-छोटा नहीं है, सब साथ दौड़ते हुए शोभित हो रहे हैं । सूरदास अपने स्वामीकी इस लीलापर बलिहारी है, यह सेवक तो उनका यशोगान करके ही जीता है ।

[286]

……………

जसुमति दौरि लिए हरि कनियाँ ।

आजु गयौ मेरौ गाइ चरावन, हौं बलि जाउँ निछनियाँ ॥

मो कारन कछु आन्यौ है बलि, बन-फल तोरि नन्हैया ।

तुमहि मिलैं मै अति सुख पायौ, मेरे कुँवर कन्हैया ॥

कछुक खाहु जो भावै मोहन, दैरी माखन-रोटी ।

सूरदास प्रभु जीवहु जुग-जुग हरिहलधर की जोटी ॥

भावार्थ / अर्थ :– यशोदाजीने दौड़कर श्यामको गोदमें उठा लिया । (बोलीं-)’मेरा लाल! आज गाय चराने गया था । मैं सर्वथा इसपर बलिहारी जाती हूँ मैं तेरी बलैया लूँ, मेरे नन्हे लाल ! मेरे लिये भी वनसे कुछ फल तोड़कर लाया है? मेरे कुँवर कन्हाई ! तुमसे मिलने पर मुझे बहुत सुख मिला । मोहन ! जो भी अच्छा लगे, कुछ खा लो ।’ (श्याम बोले-) ‘मैया मक्खन-रोटी दे।’ सूरदासके स्वामी श्याम-बलरामकी यह जोड़ी युग-युग जीवे ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Select Dropdown

Page Not Found
404

Page Not Found

The page you requested is not here. It may have moved, or the link is out of date. Check the address, or go back to Data Portal Home