80. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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(मेरी माई) ऐसौ हठी बाल गोविन्दा ।

अपने कर गहि गगन बतावत, खेलन कौं माँगै चंदा ॥

बासन मैं जल धर््यौ जसोदा, हरि कौं आनि दिखावै ।

रुदन करत, ढूँढ़त नहिं पावत, चंद धरनि क्यों आवै !

मधु-मेवा-पकवान-मिठाई, माँगि लेहु मेरे छौना ।

चकई-डोरि पाट के लटकन, लेहु मेरे लाल खिलौना ॥

संत-उबारन, असुर-सँहारन, दूरि करन दुख-दंदा ।

सूरदास बलि गई जसोदा, उपज्यौ कंस-निकंदा ॥

भावार्थ / अर्थ :– (यशोदाजी कहती हैं) ‘सखी ! मेरा यह बालगोविन्द ऐसा हठी है (कि कुछ न पूछो) । अपने हाथसे मेरा हाथ पकड़कर आकाशकी ओर दिखाता है और खेलनेके लिये चन्द्रमा माँगता है ।’यशोदाजीने बर्तनमें जल भरकर रख दिया है और हरिको लाकर उसमें (चन्द्रमा) दिखलाती हैं । लेकिन श्याम ढूँढ़ते हैं तो चन्द्रमा मिलता नहीं, इससे रो रहे हैं । भला, चन्द्रमा पृथ्वीपर कैसे आसकता है । (माता कहती हैं) ‘मेरे लाल ! तुम मधु, पकवान, मिठाई आदि (जो जीमें आये) माँग लो; मेरे दुलारे लाल! चकडोर, रेशमके झुमके तथा अन्य खिलौने ले लो ।’ सूरदासजी कहते हैं कि संतों का उद्धार करनेवाले, सबके समस्त दुःख-द्वन्द्वको दूर करनेवाले (मचलते) श्यामपर, जो कंसका विनाश करने अवतरित हुए हैं, (मनाती हुई) मैया यशोदा बार-बार न्योछावर हो रही हैं ।

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