75. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

[107]

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आजु सखी, हौं प्रात समय दधि मथन उठी अकुलाइ ।

भरि भाजन मनि-खंभ निकट धरि, नेति लई कर जाइ ॥

सुनत सब्द तिहिं छिन समीप मम हरि हँसि आए धाइ ।

मोह्यौ बाल-बिनोद-मोद अति, नैननि नृत्य दिखाइ ॥

चितवनि चलनि हर््यौ चित चंचल, चितै रही चित लाइ ।

पुलकत मन प्रतिबिंब देखि कै, सबही अंग सुहाइ ॥

माखन-पिंड बिभागि दुहूँ कर, मेलत मुख मुसुकाइ ।

सूरदास-प्रभु-सिसुता को सुख, सकै न हृदय समाइ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्रीयशोदाजी किसी गोपी से कहती हैं -) ‘सखी ! आज सबेरे मैं दही मथनेके लिये आतुरतापूर्वक उठी और दही से मटके को भरकर मणिमय खम्भेके पास रखकर हाथमें मैंने मथानी की रस्सी पकड़ी । दही मथनेका शब्द सुनकर उसी समय श्याम हँसता हुआ मेरे पास दौड़ आया । अपने नेत्रोंका चञ्चल नृत्य दिखलाकर (चपल नेत्रों से देखकर) तथा बाल-विनोदके अत्यन्त आनन्दसे उसने मुझे मोहित कर लिया । उस चञ्चल ने अपने देखने तथा चलने (ललित गति) से मेरे चित्तको हरण कर लिया, चित्त लगाकर (एकाग्र होकर) मैं उसे देखती रही। (मणि-स्तम्भमें) अपना प्रतिबिम्ब देखकर वह मन- ही-मन पुलकित हो रहा था, उसके सभी अंग बड़े सुहावने लगते थे । मक्खनके गोलेको दो भाग करके दोनों हाथोंपर रखकर एक साथ दोनों हाथोंपर रखकर एक साथ दोनों हाथों से मुँहमें डालते हुए मुसकराता जाता था, सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामीकी-शिशु लीलाका सुख हृदयमें भी समाता नहीं (इसीसे मैया उसका वर्णन सखीसे कर रही हैं)।

[108]

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बलि-बलि जाउँ मधुर सुर गावहु ।

अब की बार मेरे कुँवर कन्हैया, नंदहि नाच दिखावहु ॥

तारी देहु आपने कर की, परम प्रीति उपजावहु ।

आन जंतु धुनि सुनि कत डरपत, मो भुज कंठ लगावहु ॥

जनि संका जिय करौ लाल मेरे, काहे कौं भरमावहु ।

बाँह उचाइ काल्हि की नाईं धौरी धेनु बुलावहु ॥

नाचहु नैकु, जाऊँ बलि तेरी, मेरी साध पुरावहु ।

रतन-जटित किंकिनि पग-नूपुर, अपने रंग बजावहु ॥

कनक-खंभ प्रतिबिंबित सिसु इक, लवनी ताहि खवावहु ।

सूर स्याम मेरे उर तैं कहुँ टारे नैंकु न भावहु ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती हैं-) ‘मेरे कुँवर कन्हाई! मैं बार-बार बलिहारी जाती हूँ मीठे स्वरसे कुछ गाओ तो। अबकी बार नाचकर अपने बाबाको (अपना नृत्य) दिखादो । अपने हाथसे ही ताली बजाओ, इस प्रकार मेरे हृदयमें परम प्रेम उत्पन्न करो । तुम किसी दूसरे जीवका शब्द सुनकर डर क्यों रहे हो, अपनी भुजाएँ मेरे गलेमें डाल दो । (मेरी गोदमें आ जाओ ।) मेरे लाल! अपने मनमें कोई शंका मत करो! क्यों संदेहमें पड़ते हो (भयका कोई कारण नहीं है) । कलकी भाँति भुजाओंको उठाकर अपनी ‘धौरी’ गैयाको बुलाओ । मैं तुम्हारी बलिहारी जाऊँ, तनिक नाचो और अपनी मैयाकी इच्छा पूरी करदो । रत्नजटित करधनी और चरणोंके नूपुरको अपनी मौजसे (नाचते हुए) बजाओ । (देखो) स्वर्णके खम्भेमें एक शिशुका प्रतिबिंब है, उसे मक्खन खिला दो ।’ सूरदासजी कहते हैं, श्यामसुन्दर ! मेरे हृदयसे आप तनिक भी कहीं टल जायँ, यह मुझे जरा भी अच्छा न लगे । राग-धनाश्री

[109]

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पाहुनी, करि दै तनक मह्यौ ।

हौं लागी गृह-काज-रसोई , जसुमति बिनय कह्यौ ॥

आरि करत मनमोहन मेरो, अंचल आनि गह्यौ ।

ब्याकुल मथति मथनियाँ रीती, दधि भुव ढरकि रह्यौ ॥

माखन जात जानि नँदरानी, सखी सम्हारि कह्यौ ।

सूर स्याम-मुख निरखि मगन भइ, दुहुनि सँकोच सह्यौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीयशोदाजीने विनम्र होकर -‘पाहुनी! तनिक दधि-मन्थन मन्थन कर दो! मैं घर के काम-काज तथा रसोई बनानेमें लगी हूँ और यह मोहन मुझसे मचल रहा है, इसने आक मेरा अञ्चल पकड़ लिया है ।’ (किंतु श्यामकी शोभापर मुग्ध वह पाहुनी) आकुलतापूर्वक खाली मटके में ही मन्थन कर रही है, दही तो (मटका लुढ़कनेसे) पृथ्वीपर बहा जाता है । श्रीनन्दरानीने मक्खन पृथ्वी पर जाता समझकर (देखकर) सखी से उसे सँभालनेके लिए कहा । सूरदासजी कहते हैं कि श्यामसुन्दरका मुख देखकर वह (पाहुनी) मग्न हो गयी, उसने चुपचाप दोनों (यशोदाजीका और दही गिरनेका) संकोच सहन कर लिया ।

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