3. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल


हरि मुख देखि हो बसुदेव ।

कोटि-काल-स्वरूप सुंदर, कोउ न जानत भेव ॥

चारि भुज जिहिं चारि आयुध, निरखि कै न पत्याउ ।

अजहुँ मन परतीति नाहीं नंद-घर लै जाउ ॥

स्वान सूते, पहरुवा सब, नींद उपजी गेह ।

निसि अँधेरी, बीजु चमकै, सघन बरषै मेह ॥

बंदि बेरी सबै छूटी, खुले बज्र -कपाट ।

सीस धरि श्रीकृष्ण लीने, चले गोकुल-बाट ॥

सिंह आगैं, सेष पाछैं, नदी भई भरिपूरि ।

नासिका लौं नीर बाढ़यौ, पार पैलो दूरि ॥

सीस तैं हुंकार कीनी, जमुन जान्यौ भेव ।

चरन परसत थाह दीन्हीं, पार गए बसुदेव ॥

महरि-ढिग उन जाइ राखे, अमर अति आनंद ।

सूरदास बिलास ब्रज-हित, प्रगटे आनँद-कंद ॥

श्रीवसुदेवजी ! श्रीहरि का मुख तो देखो !

ये परम सुन्दर होने पर भी करोड़ों कालके समान हैं, इनका रहस्य कोई नहीं जानता । इनकी ये चारों भुजाएँ जिनमें (शंख, चक्र, गदा, पद्म) चार आयुध हैं, देखकर भी आप विश्वास नहीं करते ? अबतक भी आपके मनमें( इनके द्वारा कंस के मारे जाने का) विश्वास नहीं है, अतः इन्हें नन्दजी के घर ले जाइये । कुत्ते सो गये हैं और बादल बड़े जोरकी वर्षा कर रहे हैं । बंदी वसुदेवजी की सब बेड़ियाँ (स्वतः) खुल गयीं, लोहे के भारी किवाड़ भी खुल गये, मस्तक पर श्रीकृष्णचन्द्र को उठाकर वे गोकुल के मार्ग पर चल पड़े । आगे सिंह दहाड़ रहा था, पीछे-पीछे शेषनाग चल रहे थे,यमुनामें पूरी बाढ़ आयी थी, अभी दूसरा किनारा बहुत दूर था कि जल नासिकातक आ गया । लेकिन श्याम ने सिरपर से हुंकार की, यमुना ने संकेत के मर्म को समझ लिया, प्रभु के चरणों का स्पर्श करके उन्होंने थाह दे दिया (पार जाने-जितना जल कर दिया) इससे श्रीवसुदेवजी पार चले गये । उन्होंने श्री नन्दरानी के पास ले जाकर श्रीकृष्ण को रख दिया, इससे देवताओं को बड़ा आनन्द हुआ । सूरदासजी कहते हैं कि ये आनन्दकन्द तो व्रजक्रीड़ा करने के लिये ही प्रकट हुए हैं ।

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