रस का अंग – कबीर के दोहे

 रस का अंग

– संत कबीर

`कबीर’ भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आइ ।
सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई ॥1॥

भावार्थ / अर्थ – कबीर कहते हैं -कलाल की भट्ठी पर बहुत सारे आकर बैठ गये हैं, पर इस मदिरा को एक वही पी सकेगा, जो अपना सिर कलाल को खुशी-खुशी सौंप देगा, नहीं तो पीना हो नहीं सकेगा । [कलाल है सद्गुरु, मदिरा है प्रभु का प्रेम-रस और सिर है अहंकार ।]

`कबीर’ हरि-रस यौं पिया, बाकी रही न थाकि ।
पाका कलस कुंभार का, बहुरि न चढ़ई चाकि ॥2॥

भावार्थ / अर्थ – कबीर कहते हैं — हरि का प्रेम-रस ऐसा छककर पी लिया कि कोई और रस पीना बाकी नहीं रहा । कुम्हार का बनाया जो घड़ा पक गया, वह दोबारा उसके चाक पर नहीं चढ़ता । [ मतलब यह कि सिद्ध हो जाने पर साधक पार कर जाता है जन्म और मरण के चक्र को।]

हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार ।
मैंमंता घूमत रहै, नाहीं तन की सार ॥3॥

भावार्थ / अर्थ – हरि का प्रेम-रस पी लिया, इसकी यही पहचान है कि वह नशा अब उतरने का नहीं, चढ़ा सो चढ़ा । अपनापन खोकर मस्ती में ऐसे घूमना कि शरीर का भी मान न रहे ।

सबै रसाइण मैं किया, हरि सा और न कोइ ।
तिल इक घट मैं संचरै, तौ सब तन कंचन होई ॥4॥

भावार्थ / अर्थ – सभी रसायनों का सेवन कर लिया मैंने, मगर हरि-रस-जैसी कोई और रसायन नहीं पायी । एक तिल भी घट में, शरीर में, यह पहुँच जाय, तो वह सारा ही कंचन में बदल जाता है । [मैल जल जाता है वासनाओं का, और जीवन अत्यंत निर्मल हो जाता है ।]

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