84. राग बिहागरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिहागरौ

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तुव मुख देखि डरत ससि भारी ।

कर करि कै हरि हेर््यौ चाहत, भाजि पताल गयौ अपहारी ॥

वह ससि तौ कैसेहुँ नहिं आवत, यह ऐसी कछु बुद्धि बिचारी ।

बदन देखि बिधु-बुधि सकात मन, नैन कंज कुंडल इजियारी ॥

सुनौ स्याम, तुम कौं ससि डरपत, यहै कहत मैं सरन तुम्हारी ।

सूर स्याम बिरुझाने सोए, लिए लगाइ छतिया महतारी ॥

भावार्थ / अर्थ :– लाल! तुम्हारा मुख देखकर चन्द्रमा अत्यन्त डर रहा है । श्याम ! तुम (पानीमें) हाथ डालकर उसे ढुँढ़ना चाहते हो, इससे वह चोरकी भाँति भागकर पाताल चला गया । वह (आकाशका) चन्द्रमा तो किसी भी प्रकार आता नहीं और यह जो जलमें था, उसने बुद्धि से कुछ ऐसी बात सोच ली कि तुम्हारे मुखको देखकर इस चन्द्रमाकी बुद्धि शंकित हो गयी । उसने अपने मनमें तुम्हारे नेत्रों को कमल तथा कुण्डलोंको (सूर्यका) प्रकाश समझा; इसलिये श्यामसुन्दर, सुनो ! चन्द्रमा तुमसे डर रहा है और यही कहता है कि मैं तुम्हारी शरणमें हूँ । (मुझे छोड़ दो) सूरदासजी कहते हैं कि (इतना समझानेसे भी प्रभु माने नहीं) श्यामसुन्दर मचलते हुए ही सो गये । माताने उन्हें हृदयसे लगा लिया ।

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