22. राग जैतश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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हरि कौ मुख माइ, मोहि अनुदिन अति भावै ।
चितवत चित नैननि की मति-गति बिसरावै ॥

ललना लै-लै उछंग अधिक लोभ लागैं।
निरखति निंदति निमेष करत ओट आगैं ॥
सोभित सुकपोल-अधर, अलप-अलप दसना ।
किलकि-किलकि बैन कहत, मोहन, मृदु रसना ॥
नासा, लोचन बिसाल, संतत सुखकारी ।
सूरदास धन्य भाग, देखति ब्रजनारी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपिका कहती है) ‘सखी ! मुझे तो श्यामका मुख दिन-प्रतिदिन अधिकाधिक
आकर्षक लगता है । इसे देखते ही (यह) चित्त अपनी और नेत्रोंकी विचारशक्ति और गतिको
विस्मृत कर देता है । (चित्त एकाग्र और नेत्र स्थिर हो जाते हैं ।) इस लालको बार-
बार गोदमें लेनेपर भी (गोदमें लिये ही रहनेका) लोभ और बढ़ता जाता है ।’ इस प्रकार
(श्यामके श्रीमुखको) देखते हुए वे अपनी पलकोंकी निन्दा करती हैं कि ये आगे आकर (बार
-बार गिरकर) आड़ कर देती है । मोहनके सुन्दर कपोल, लाल अधर तथा छोटे-छोटे दाँत
अत्यन्त शोभा दे रहे हैं, बार-बार किलक-किलककर अपनी कोमल जिह्वासे वह कुछ
(अस्फुट) बोल रहा है । सुन्दर नासिका, उसके बड़े-बड़े नेत्र (दर्शन करनेवालेके
लिये) सदा ही आनन्ददायक हैं । सूरदासजी कहते हैं कि ये व्रजकी गोपियोंका सौभाग्य
धन्य है जो मोहनको देखती हैं ।

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