141. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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कहै जनि ग्वारिन! झूठी बात ।

कबहूँ नहिं मनमोहन मेरौ, धेनु चरावन जात ॥

बोलत है बतियाँ तुतरौहीं, चलि चरननि न सकात ।

केसैं करै माखन की चोरी, कत चोरी दधि खात ॥

देहीं लाइ तिलक केसरि कौ, जोबन-मद इतराति ।

सूरज दोष देति गोबिंद कौं, गुरु-लोगनि न लजाति ॥

भावार्थ / अर्थ :– सूरदासजी कहते हैं- (श्रीयशोदाजी बोलीं) ‘गोपी ! झूठी बात मत कह । मेरा मनमोहन (तो) कभी गायें चराने भी नहीं जाता । अभी तो तोतली वाणी बोलता है और पैरौंसे भली प्रकार चल भी नहीं पाता । यह मक्खनकी चोरी कैसे करेगा ? चोरीसे यह दही क्यों खायगा ? तू अपने शरीरपर केसरका तिलक लगाकर जवानीके मदसे इठला रही है, मेरे गोविन्दको दोष लगाती हुई अपने गुरुजनों (अपनेसे बड़ों अर्थात् मुझसे) भी संकोच नहीं करती ?’

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