136. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

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जौ तुम सुनहु जसोदा गोरी ।

नंदँ-नंदन मेरे मंदिर मैं आजु करन गए चोरी ॥

हौं भइ जाइ अचानक ठाढ़ी, कह्यौ भवन मैं को री ।

रहे छपाइ, सकुचि, रंचक ह्वै, भइ सहज मति भोरी ॥

मोहिं भयौ माखन-पछितावौ, रीती देखि कमोरी ।

जब गहिं बाँह कुलाहल कीनी, तब गहि चरन निहोरी ॥

लागे लैन नैन जल भरि-भरि, तब मैं कानि न तोरी

सूरदास-प्रभु देत दिनहिं-दिन ऐसियै लरिक-सलोरी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (वह गोपी नंद-भवन में आकर कहती है- )’सखी यशोदाजी ! यदि तुम सुनो तो एक बात बताऊँ । आज मेरे मकानमें चोरी करने नन्दनन्दन गये थे । इतने में मैं (बाहरसे लौटकर) वहाँ अचानक जाकर खड़ी हो गयी और पूछा -‘घरमें कौन है?’ तब तो इनकी बुद्धि स्वभावतः भोली हो गयी (कोई उपाय इन्हें सूझा नहीं), सिकुड़कर तनिक-से बनकर छिपे रह गये (अपने अंग सिकोड़कर दुबक गये ) । अपनी मटकी खाली देखकर मुझे मक्खन जाने का पश्चाताप (दुःख) हुआ; (इससे ) जब इनकी बाँह पकड़कर मैंने कोलाहल किया, तब मेरे पैर पकड़कर अनुनय-विनय करने लगे । बार-बार नेत्रोंमें आँसू भर लेने लगे (रोने लगे) । तब मैंने संकोच तोड़ा नहीं (चुपचाप चले जाने दिया) सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी दिनों-दिन लड़कपनको ऐसी ही प्रिय लगनेवाली क्रीड़ाका आनन्द दे रहे हैं ।

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