133. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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गोपालहि माखन खान दै ।

सुनि री सखी, मौन ह्वै रहिऐ, बदन दही लपटान दै ॥

गहि बहियाँ हौं लैकै जैहौं, नैननि तपति बुझान दै ।

याकौ जाइ चौगुनौ लैहौं, मोहि जसुमति लौं जान दै ॥

तू जानति हरि कछू न जानत सुनत मनोहर कान दै ।

सूर स्याम ग्वालिनि बस कीन्हौ राखनि तन-मन-प्रान दै ॥

भावार्थ / अर्थ :– (एक गोपी कहती है )- ‘गोपाल को मक्खन खाने दो । सखियो! सुनो, सब चुप हो रहो, इन्हें मुखमें दही लिपटाने दो (जिससे प्रमाणित हो जाय कि इन्होंने चोरी की है )। तनिक नेत्रोंकी जलन (इन्हें देखकर) शान्त कर लेने दो, फिर इनका हाथ पकड़कर मैं इन्हें ले जाऊँगी । मुझे यशोदाजी तक जाने तो दो, इसका चौगुना (मक्खन जाकर लूँगी ।’ (सखियाँ कहती हैं-) ‘तू समझती है कि मोहन कुछ जानता ही नहीं, वह सुन्दर तो कान लगाकर सुन रहा है ।’ सूरदासजी कहते हैं कि श्यामसुन्दरने गोपी को वशमें कर लिया है । (मक्खन तो दूर) वह तो तन, मन और प्राण देकर भी उन्हें (अपने यहाँ) रख रही (रखना चाहती) है ।

[187]

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जसुदा कहँ लौं कीजै कानि ।

दिन-प्रति कैसैं सही परति है, दूध-दही की हानि ॥

अपने या बालक की करनी,जौ तुम देखौ आनि ।

गोरस खाइ खवावै लरिकन, भाजत भाजन भानि ॥

मैं अपने मंदिर के कोनैं, राख्यौ माखन छानि ।

सोई जाइ तिहारैं ढोटा, लीन्हौ है पहिचानि ॥

बूझि ग्वालि निज गृह मैं आयौ नैकु न संका मानि ।

सूर स्याम यह उतर बनायौ, चींटी काढ़त पानि ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपी कहती है) -‘यशोदाजी! कहाँतक संकोच किया जाय । प्रतिदिन दूध और दहीकी हानि कैसे सही जा सकती है ? तुम यदि आकर अपने इस बालकका करतब देखो – यह स्वयं गोरस (दही-मक्खन )खाता है, लड़कोंको खिलाता है और बर्तनोंको फोड़कर भाग जाता है । मैंने अपने भवनके एक कोने में (ताजा) मक्खन (मट्ठेमेंसे) छानकर (छिपाकर) रखा था, तुम्हारे इस पुत्रने पहचानकर (कि यह ताजा मक्खन है) उसी को ले लिया ।’ सूरदासजी कहते हैं–जब गोपीने पूछा तो श्यामसुन्दरने यह उत्तर गढ़कर दे दिया था कि ‘मैं तो इसे अपना घर समझकर तनिक भी शंका न करके भीतर चला आया और अपने हाथ से (दहीमें पड़ी) चींटियाँ निकाल रहा था ।’

[188]

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माई ! हौं तकि लागि रही ।

जब घर तैं माखन लै निकस्यौ, तब मैं बाहँ गही ॥

तब हँसि कै मेरौ मुख चितयौ, मीठी बात कही ।

रही ठगी, चेटक-सौ लाग्यौ, परि गइ प्रीति सही ॥

बैठो कान्ह, जाउँ बलिहारी, ल्याऊँ और दही ।

सूर स्याम पै ग्वालि सयानी सरबस दै निबही ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपी कहती है-) ‘सखी! मैं ताक में लगी थी । ज्यों ही घरमेंसे मक्खन लेकर मोहन निकला त्यों ही मैंने हाथ पकड़ लिया । तब उसने हँसकर मेरे मुखकी ओर देखकर मधुरवाणी से कुछ कह दिया । इससे मैं ठगी रह गयी, जैसे जादू हो गया हो ऐसी दशा हो गयी, उससे मेरा सच्चा प्रेम हो गया ।’ (मैंने कहा-) ‘कन्हाई ! बैठो, मैं तुमपर बलिहारी जाती हूँ और भी दही ले आती है (भली प्रकार खालो)’ सूरदासजी कहते हैं कि इस चतुर गोपीने श्यामसुन्दर पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया और (सहज ही संसार-सागरसे) तर गयी ।

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