114. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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खेलन जाहु बाल सब टेरत।

यह सुनि कान्ह भए अति आतुर, द्वारैं तन फिरि हेरत ॥

बार बार हरि मातहिं बूझत, कहि चौगान कहाँ है ।

दधि-मथनी के पाछै देखौ, लै मैं धर््यौ तहाँ है ॥

लै चौगान-बटा अपनैं कर, प्रभु आए घर बाहर ।

सूर स्याम पूछत सब ग्वालनि, खेलौगे किहिं ठाहर ॥

भावार्थ ;— (माता ने कहा-) ‘लाल ! खेलने जाओ, सब बालक तुम्हें पुकार रहे हैं ।’ यह सुनकर कन्हाई अत्यन्त आतुर हो उठे । बार-बार द्वारकी ओर देखने लगे । बार-बार मोहन मैयासे पूछने लगे- यह सुनकर कन्हाई अत्यन्त आतुर हो उठे । बार-बार द्वारकी ओर देखने लगे । बार बार मोहन मैयासे पूछने लगे -‘मेरा गेंद, खेलनेका बल्ला कहाँ है ?’ (माता ने कहा–) दहीके माटके पीछे देखो, मैंने लेकर वहाँ रख दिया है ।’ अपने हाथमें बल्ला और गेंद लेकर मोहन घरसे बाहर आये । सूरदासजी कहते हैं – श्यामसुन्दर सब ग्वाल-बालकों से पूछ रहे हैं- ‘किस स्थानपर खेलोगे?’

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खेलत बनैं घोष निकास ।

सुनहु स्याम चतुर-सिरोमनि, इहाँ है घर पास ॥

कान्ह-हलधर बीर दोऊ, भुजा-बल अति जोर ।

सुबल, श्रीदामा, सुदामा, वै भए, इक ओर ॥

और सखा बँटाइ लीन्हे, गोप-बालक-बृंद ।

चले ब्रज की खोरि खेलत, अति उमँगि नँद-नंद ॥

बटा धरनी डारि दीनौ, लै चले ढरकाइ ।

आपु अपनी घात निरखत खेल जम्यौ बनाइ ॥

सखा जीतत स्याम जाने, तब करी कछु पेल ।

सूरदास कहत सुदामा, कौन ऐसौ खेल ॥

भावार्थ / अर्थ :– (सखाओंनेकहा-) ‘चतुर शिरोमणि श्यामसुन्दर ! सुनो । यहाँ तो घर पास है, ग्रामके बाहर मैदान मैं खेलते बनेगा (खेलनेकी स्वच्छंतता रहेगी)।’ कन्हाई और श्रीबल राम- ये दोनों भाई जिनकी भुजाएँ बलवान् थी और जो स्वयं भी अत्यन्त शक्तिमान थे, एक दलके प्रमुख हो गये । सुबल, श्रीदामा और सुदामा दूसरी ओर हो गये । गोपबालकोंके समूहके दूसरे सखाओंका भी बँटवारा करा लिया । श्रीनन्दनन्दन बड़ी उमंग में भरकर व्रजकी गलियों में खेलते हुए (ग्रामके बाहर) चल पड़े । (बाहर जाकर ) गेंद पृथ्वीपर डाल दिया और उसे लुढ़काते हुए ले चले । सब अपना-अपना अवसर देखते थे, खेल भली प्रकार जम गया । श्यामसुन्दरने देखा कि सखा जीत रहे हैं, तब कुछ मनमानी करने लगे । सूरदासजी कहते हैं कि (उनकी मनमानी देखकर) सुदामाने कहा–‘ऐसा बेईमानीका) खेल कौन खेले ।’

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खेलत मैं को काको गुसैयाँ ।

हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबसहीं कत करत रिसैयाँ ॥

जात-पाँति हम ते बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ ।

अति धिकार जनावत यातैं, जातैं अधिक तुम्हारैं गैयाँ !

रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ-तहँ सब ग्वैयाँ ॥

सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाउँ दियौ करि नंद-दहैयाँ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (सखाओं ने कहा-) ‘श्याम! खेलनेमें कौन किसका स्वामी है (तुम व्रजराजके लाड़िले हो तो क्या हो गया ) । तुम हार गये हो और श्रीदामा जीत गये हैं, फिर झूठमूठ झगड़ा करते हो ? जाति-पाँति तुम्हारी हमसे बड़ी नहीं है (तुम भी गोप ही हो) ओर हम तुम्हारी छायाके नीचे (तुम्हारे अधिकार एवं संरक्षणमें) बसते भी नहीं हैं । तुम अत्यन्त अधिकार इसीलिये तो दिखलाते हो कि तुम्हारे घर (हम सबसे) अधिक गाएँ हैं ! जो रूठने-रुठानेका काम करे, उसके साथ कौन खेले ।’ (यह कहकर) सब साथी जहाँ-तहाँ खेल छोड़कर) बैठ गये । सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी तो खेलना ही चाहते थे, इसलिये नन्दबाबाकी शपथ खाकर (कि बाबाकी शपथ मैं फिर ऐसा झगड़ा नहीं करूँगा ) दाव दे दिया ।

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