151. राग मलार – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग मलार

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महरि तैं बड़ी कृपन है माई ।

दूध-दही बहु बिधि कौ दीनौ, सुत सौं धरति छपाई ॥

बालक बहुत नहीं री तेरैं, एकै कुँवर कन्हाई ।

सोऊ तौ घरहीं घर डोलतु, माखन खात चोराई ॥

बृद्ध बयस पूरे पुन्यनि तैं, तैं बहुतै निधि पाई ।

ताहू के खैबे-पीबे कौं, कहा करति चतुराई ॥

सुनहु न बचन चतुर नागरि के, जसुमति नंद सुनाई ।

सूर स्याम कौं चोरी कैं, मिस, देखन है यह आई ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपी ने कहा-) ‘सखी व्रजरानी ! तुम तो बड़ी कंजूस हो । देवने बहुत अधिक दूध-दही तुम्हें दिया है, उसे भी पुत्रसे छिपाकर रखती हो । सखी! तुम्हारे बहुत लड़के तो नहीं, अकेला कुँअर कन्हैया ही तो है । वह भी तो घर-घर घूमता रहता है और चोरी करके मक्खन खाता है । बुढ़ापेकी अवस्थामें समस्त पुण्योंका फल पूरा (प्रकट) होने पर तो यह (कृष्णरूपी बहुमूल्य निधि तुमने पायी है,अब उसके भी खाने-पीनेमें चतुरता (कतर-ब्योंत) क्यों करती हो ?सूरदासजी कहते हैं हैं कि श्रीयशोदाजी ने (यह बात सुनकर) श्रीनन्दजीको सुनाकर यह बात कही-‘इस चतुर नारीकी बातें तो सुनो, श्यामसुन्दरकी चोरीका बहाना लेकर यह उसे देखने आयी है ।’