गोदान (भाग 2)

: 36 :

दो दिन तक गांव में खूब धूम-धाम रही. बाजे बजे, गाना-बजाना हुआ और रूपा रो-धोकर
विदा हो गयी, मगर होरी को किसी ने घर से निकलते न देखा. ऐसा छिपा बैठा था, जैसे
मुंह में कालिख लगी हो. मालती के आ जाने से चहल-पहल और बढ़ गयी. दूसरे गांव की
स्त्रियां भी आ गयीं.
गोबर ने अपने शील-स्नेह से सारे गांव को मुग्ध कर लिया है. ऐसा कोई घर न था, जहां
वह अपने मीठे व्यवहार की याद न छोड़ आया हो. भोला तो उसके पैरों पर गिर पड़े. उनकी
स्त्री ने उसको पान खिलाये ओर एक रुपया विदाई दी और उसका लखनऊ का पता भी पूछा. कभी
लखनऊ आयेगी तो उससे जरूर मिलेगी. अपने रुपये की उससे चर्चा न की.
तीसरे दिन जब गोबर चलने लगा, तो होरी ने धनिया के सामने आंखों में आंसू भरकर वह
अपराध स्वीकार किया, जो कई दिन से उसकी आत्मा को मथ रहा था और रोकर बोला-बेटा,
मैंने इस जमीन के मोह से पाप की गठरी सिर लादी. न जाने भगवान् मुझे इसका क्या दण्ड
देंगे!
गोबर जरा भी गरम न हुआ, किसी प्रकार का रोष उसके मुंह पर न था. श्रद्धाभाव से बोला-
इसमें अपराध की कोई बात नहीं दादा! हां, रामसेवक के रुपये अदा कर देना चाहिए. आखिर
तुम क्या करते? मैं किसी लायक नहीं, तुम्हारी खेती में उपज नहीं, करज कहीं मिल नहीं
सकता, एक महीने के लिए भी घर में भोजन नहीं.ऐसी दशा में तुम और कर ही क्या सकते थे?
जैजात न बचाते, तो रहते कहां? जब आदमी का कोई बस नहीं चलता, तो अपने को तकदीर पर ही
छोड़ देता है. न जाने यह धांधली कब तक चलती रहेगी? जिसे पेट की रोटी मयस्सर नहीं,
उसके लिए मरजाद और इज्जत सब ढोंग है. औरों की तरह तुमने भी दूसरों का गला दबाया
होता, उनकी जमा मारी होती, तो तुम भी भले आदमी होते. तुमने कभी नीति को नहीं छोड़ा,
यह उसी का दण्ड है. तुम्हारी जगह मैं होता, तो या जेहल में होता या फांसी पर गया
होता. मुझसे यह कभी बरदाश्त न होता कि मैं कमा-कमाकर सबका घर भरूं और आप अपने बाल-
बच्चों के साथ मुंह में जाली लगाये बैठा रहूं.
धनिया बहू को उसके साथ भेजने पर राजी न हुई. झुनिया का मन भी अभी कुछ दिन यहां रहने
का था. तय हुआ कि गोबर अकेला ही जाये.
दूसरे दिन प्रातःकाल गोबर सबसे विदा होकर लखनऊ चला. होरी उसे गांव के बाहर तक
पहुंचाने आया. गोबर के प्रति इतना प्रेम उसे कभी न हुआ था. जब गोबर उसके चरणों पर
जब गोबर उसके चरणों पर झुका,तो होरी रो पड़ा, मानो फिर उसे पुत्र के दर्शन न होंगे.
उसकी आत्मा में उल्लास था, गर्व था, संकल्प था. पुत्र से यह श्रद्धा और स्नेह पाकर
वह तेजवान हो गया है, विशाल हो गया है. कई दिन पहले उस पर जो अवसाद-सा छा गया था,
एक अन्धकार-सा, जहां वह अपना मार्ग भूल जाता था, वहां अब उत्साह है और प्रकाश है.
रूपा अपनी ससुराल में खुश थी. जिस दशा में उसका बालपन बीता था, उसमें पैसा सबसे
कीमती चीज थी. मन में कितनी साधें थी. जो मन ही में घुटकर रह गयी थीं. वह अब उन्हें
पूरा कर रही थी और रामसेवक अधेड़ होकर भी जवान हो गया था. रूपा के लिए वह पति था
उसके जवान, अधेड़ या बूढ़े होने से उसकी नारी-भावना में कोई अन्तर न आ सकता था.
उसकी यह भावना पति के रंग-रूप या उम्र पर आश्रित न थी, उसकी बुनियाद इससे बहुत गहरी
श्वेत परम्पराओं की तह में, जो केवल किसी भूकम्प से ही हिल सकती थी. उसका यौवन अपने
ही में मस्त था, वह अपने ही लिए अपना बनाव -सिंगार करती थी और आप ही खुश होती थी.
रामसेवक के लिए उसका दूसरा रूप था. तब वह गृहिणी बन जाती थी, घर के काम-काज में लगी
हुई. अपनी जवानी दिखाकर उसे लज्जा या चिन्ता में न डालना चाहती थी. किसी तरह की
अपूर्णता का भाव उसके मन में न आता था. अनाज से भरे हुए बखार और गांव से सिवान तक
फैले हुए खेत और द्वार पर ढोरों की कतारें और किसी प्रकार की अपूर्णता को उसके
अन्दर आने ही न देती थी.
और उसकी सबसे बड़ी अभिलाषा थी अपने घरवालों की खुशी देखना. उनकी गरीबी कैसे दूर कर
दे? उस गाय की याद अभी तक उसके दिल में हरी थी, जो मेहमान की तरह आयी थी और सबको
रोता छोड़कर चली गयी थी.वह स्मृति इतने दिनों के बाद अब और भी मृदु हो गयी थी. अभी
उसका निजत्व इस नये घर में न जम पाया था. वही पुराना घर उसका अपना घर था. इस द्वार
पर ढोरों का एक रेवड़ देखकर उसे वह हर्ष न हो सकता था, जो अपने द्वार पर एक गाय देख
कर होता. उसके दादा की यह लालसा कभी पूरी न हुइ. जिस दिन वह गाय आयी थी, उन्हें
कितना उछाह हुआ था, जैसे आकाश से कोई देवी आ गयी हो. तब से फिर उन्हें इतनी समाई
ही न हुई कि दूसरी गाय लाते, पर वह जानती थी, आज भी वह लालसा होरी के मन में उतनी
ही सजग है. अबकी यह जायेगी, तो साथ वह धोरी गाय जरूर लेती जायेगी. नहीं, अपने आदमी
से क्यों न भेजवा दे. राम सेवक से पूछने की देर थी. मंजूरी हो गयी और दूसरे दिन एक
अहीर के मार्फत रूपा ने गाय भेज दी. अहीर से कहा-दादा से कह देना, मंगल के दूध पीने
के लिए भेजी है. होरी भी गाय लेने की फिक्र में था. यों अभी उसे गाय की कोई जल्दी न
थी,मगर मंगल यहीं है और बिना दूध के कैसे रह सकता है? रुपये मिलते ही वह सबसे पहले
गाय लेगा. मंगल अब केवल उसका नहीं, केवल गोबर का बेटा नहीं है, मालती देवी का
खिलौना भी है. उसका लालन-पालन उसी तरह का होना चाहिए.
मगर रुपये कहां से आये? संयोग से उसी दिन एक ठीकेदार ने सड़क के लिए गांव के ऊसर के
कंकड़ की खुदाई शुरू की. होरी ने सुना, तो चटपट वहां जा पहुंचा और आठ आने रोज पर
खुदाई करने लगा. अगर यह काम दो महीने भी टिक गया, तो गाय भर के को रुपये मिल
जायेंगे. दिन-भर लू और धूप में काम करने के बाद, वह घर आता, तो बिलकुल मरा हुआ,
अवसाद का नाम नहीं. उसी उत्साह से दूसरे दिन काम करने जाता. रात को भी खाना खाकर
डिब्बी के सामने बैठ जाता ओर सुतली कातता. कहीं बारह-एक बजे सोने जाता. धनिया भी
पगला गयी थी, उसे इतनी मेहनत करने से रोकने के बदले खुद उसके साथ बैठी-बैठी सुतली
कातती. गाय तो लेनी ही है, राम सेवक के रुपये भी तो अदा करने हैं. गोबर कह गया है.
उसे बड़ी चिन्ता है.
रात के बारह बज गये थे. दोनों बैठे सुतली कात रहे थे. धनिया ने कहा-तुम्हें नींद
आती हो,तो जाके सो रहो. भोरे फिर तो काम करना है. होरी ने आसमान की ओर देखा-चला
जाऊंगा. अभी तो दस बजे होंगे. तू जा, सो रह.
`मैं तो दोपहर को छन-भर पौढ़ रहती हूं.’
`मैं भी चबैना करके पेड़ के नीचे सो लेता हूं.’
`बड़ी लू लगती होगी.’
`लू क्या लगेगी? अच्छी छांह है.’
`मैं डरती हूं, कहीं तुम बीमार न पड़ जाओ.’
`चल, बीमार वह पड़ते हैं, जिन्हें बीमार पड़ने की फुर्सत होती है. यहां तो यह धुन
है कि अबकी गोबर आये, तो रामसेवक के आधे रुपये जा रहें. कुछ वह भी लायेगा. बस, इस
साल इस रिन से गला छूट जाये, तो दूसरी जिन्दगी हो.’
`गोबर की अबकी बड़ी याद आती है. कितना सुशील हो गया है?’
`चलती बेर पैरों पर गिर पड़ा.’
`मंगल वहां से आया तो, तो कितना तैयार था. यहां आकर दुबला हो गया है.’
`वहां दूध, मक्खन, क्या नहीं पाता था? यहां रोटी मिल जाये, वही बहुत है. ठीकेदार से
रुपये मिले और गाय लाया.’
`गाय तो कभी आ गयी होती, लेकिन तुम जब कहना मानो. अपनी खेती तो संभाले न संभलती
थी, पुनिया का भार भी अपने सिर ले लिया.’
`क्या करता, अपना धरम भी तो कुछ है. हीरा ने नालायकी की, तो उसके बाल-बच्चों को
संभालनेवाला तो कोई चाहिए ही था. कौन था मेरे सिवा, बता? मैं न मदद करता, तो आज
उनकी क्या गति होती, सोच. इतना सब करने पर भी तो मंगरू ने उस पर नालिश कर ही दी.’
`रुपये गाड़कर रखेगी, तो क्या नालिश न होगी?’
`क्या बकती है? खेती से पेट चल जाये यही बहुत है. गाड़कर कोई क्या रखेगा?’
`हीरा तो जैसे संसार से ही चला गया.’
`मेरा मन तो कहता है कि वह आवेगा, कभी-न कभी जरूर.’
दोनों सोये. होरी अंधेरे मुंह उठा, तो देखता है हीरा सामने खड़ा है, बाल बढ़े हुए,
कपड़े तार-तार, मुंह सूखा हुआ, देह में रक्त और मांस का नाम नहीं, जैसे कद भी छोटा
हो गया है. दौड़कर होरी के कदमों पर गिर पड़ा.
होरी ने छाती से लगाकर कहा-तुम तो बिलकुल घुल गये हीरा! कब आये? आज तुम्हारी बार
-बार याद आ रही थी. बीमार हो क्या?
आज उसकी आंखों में वह हीरा न था, जिसने उसकी जिन्दगी तल्ख कर दी थी, बल्कि वह हीरा

था, जो बे-मां-बाप का छोटा सा बालक था. बीच के पचीस-तीस साल जैसे मिट गये, उनका
कोई चिन्ह भी नहीं था.
हीरा ने कुछ जवाब न दिया.खड़ा रो रहा था.
होरी ने उसका हाथ पकड़कर गद्गद कण्ठ से कहा-क्यों रोते हो भैया, आदमी से भूल-चूक
होती ही है. कहां रहा इतने दिन?
हीरा कातर स्वर में बोला-कहां बताऊं दादा!बस, यही समझ लो कि तुम्हारे दर्शन बदे थे,
बच गया. हत्या सिर पर सवार थी. ऐसा लगता था कि वह गऊ मेरे सामने खड़ी है. हरदम,
सोते-जागते, कभी आंखों से ओझल न होती. मैं पागल हो गया और पांच साल पागल खाने में
रहा. आज वहां से निकले छह महीने हुए. मांगता-खाता फिरता रहा. यहां आने की हिम्मत न
पड़ती थी. संसार को कौन मुंह दिखाऊंगा? आखिर जी न माना. कलेजा मजबूत करके चला आया.
तुमने बाल-बच्चों को…
होरी ने बात काटी-तुम नाहक भागे. अरे दरोगा को दस-पांच देकर मामला रफे-दफे करा दिया
जाता और होता क्या?
`तुमसे जीते-जी उरिन न हूंगा दादा!’
`मैं कोई गैर थोड़े हूं भैया.’
होरी प्रसन्न था.जीवन के सारे संकट, सारी निराशाएं मानो उसके चरणों पर लौट रही थीं.
कौन कहता है, जीवन-संग्राम में वह हारा है. यह उल्लास, यह गर्व, यह पुलक क्या हार
के लक्षण हैं? इन्ही हारों में उसकी विजय है. उसके टूटे-फुटे अस्त्र उसकी विजय-
पताकाएं हैं. उसकी छाती फूल उठी है, मुख पर तेज आ गया है. हीरा की कृतज्ञता में
उसके जीवन की सारी सफलता मूर्तिमान हो गयी है. उसके बखार में सौ-दो सौ मन अनाज भरा
होता, उसकी हांड़ी में हजार-पांच सौ गड़े होते, पर उससे यह स्वर्ग का सुख क्या मिल
सकता था.
हीरा ने उसे सिर से पांव तक देखकर कहा-तुम भी तो बहुत दुबले हो गये हो दादा!
होरी ने हंसकर कहा-तो क्या यह मेरे मोटे होने के दिन हैं? मोटे वह होते हैं,
जिन्हें न रिन का सोच होता है न इज्जत का. इस जमाने में मोटा होना बेहयाई है. सौ को
दुबला करके तब एक मोटा होता है. ऐसे मोटेपन में क्या सुख? सुख तो जब है कि सभी मोटे
हों. सोभा से भेंट हुई?
`उससे तो रात ही भेंट हो गयी थी. तुमने तो अपनों को भी पाला, जो तुमसे बैर करते थे,
उनको भी पाला और अपना मरजाद बनाये बैठे हो. उसने तो खेती-बारी सब बेच-बाच डाली और
और अब भगवान् ही जाने, उसका निबाह कैसे होगा?’
आज होरी खुदाई करने चला, तो देह भारी थी. रात की थकान दूर न हो पायी थी, पर उसके
कदम तेज थे और चाल में निर्द्वन्द्वता की अकड़ थी.
आज दस बजे से ही लू चलने लगी और दोपहर होते-होते आग बरस रही थी. होरी कंकड़
के झौवे उठा-उठाकर खदान से सड़क पर लाता था और गाड़ी पर लादता था. जब दोपहर की
छुट्टी हुई, तो वह बेदम हो गया था. ऐसी थकान उसे कभी न हुई थी. उसके पांव तक न उठते
थे. देह भीतर से झुलसी जा रही थी. उसने न स्नान किया, न चबेना. उसी थकान में अपना
अंगोछा बिछाकर एक पेड़ के नीचे सो रहा, मगर प्यास के मारे कण्ठ सूखा जाता है. खाली
पेट पानी पीना ठीक नहीं. उसने प्यास को रोकने की चेष्टा की, लेकिन प्रतिक्षण भीतर
की दाह बढ़ती जाती थी. न रहा गया.एक मजदूर ने बालटी भर रखी थी और चबेना कर रहा था.
होरी ने उठाकर एक लोटा पानी खींचकर पिया और आकर लेट रहा. मगर आधे घण्टे में उसे कै
हो गयी और चेहरे पर मुर्दनी-सी छा गयी.
उस मजदूर ने कहा-कैसा जी है होरी भैया?
होरी के सिर में चक्कर आ रहा था. बोला-कुछ नहीं, अच्छा हूं.
यह कहते-कहते उसे फिर कै हुई और हाथ-पांव ठण्डे होने लगे. यह चक्कर क्यों आ रहा है?
आंखों के सामने जैसे अंधेरा छाया जाता है. उसकी आंखें बन्द हो गयीं और जीवन की सारी
स्मृतियां सजीव हो-होकर हृदय-पट पर आने लगीं, लेकिन बे-क्रम, आगे की पीछे, पीछे की
आगे, स्वप्न-चित्रों की भांति बेमेल, विकृत और असम्बद्ध. वह सुखद बालपन आया, जब वह
गुल्लियां खेलता था और मां की गोद में सोता था.फिर देखा, जैसे गोबर आया है और उसके
पैरों पर गिर रहा है. फिर दृश्य बदला, धनिया दुलहिन बनी हुई, लाल चुन्दरी पहने उसको
भोजन करा रही थी. फिर एक गाय का चित्र सामने आया, बिलकुल कामधेनु-सी. उसने उसका
दूध दुहा और मंगल को पिला रहा था कि गाय एक देवी बन गयी और….
उसी मजदूर ने फिर पुकारा- दोपहरी ढल गयी होरी, चलो झौवा उठाओ.
होरी कुछ न बोला. उसके प्राण तो न जाने किस-किस लोक में उड़ रहे थे. उसकी देह जल
रही थी, हाथ-पांव ठण्डे हो रहे थे. लू लग गई थी.
उसके घर आदमी दौड़ाया गया. एक घण्टा में धनिया दौड़ी हुई आ पहुंची. शोभा और हीरा
पीछे-पीछे खटोले की डोली बनाकर ला रहे थे.
धनिया ने होरी की देह छुई, तो उसका कलेजा सन्न से हो गया. मुख कान्तिहीन हो गया था.
कांपती हुई आवाज से बोली-कैसा जी है तुम्हारा?
होरी ने अस्थिर आंखों से देखा और बोला-तुम आ गये गोबर? मैंने मंगल के लिए गाय लेली
है. वह खड़ी है, देखो.
धनिया ने मौत की सूरत देखी थी. उसे पहचानती थी. उसे दबे पांव आते भी देखा था, आंधी
की तरह भी देखा था. उसके सामने सास मरी, ससुर मरा, अपने दो बालक मरे,गांव के पचासों
आदमी मरे. प्राण में एक धक्का-सा लगा. आधार, जिस पर जीवन टिका हुआ था, जैसे खिसका
जा रहा था, लेकिन नहीं, यह धैर्य का समय है, उसकी शंका निर्मूल है, लू लग गयी है,
उसी से अचेत हो गये हैं.
उमड़ते हुए आंसुओ को रोककर बोली-मेरी ओर देखो, मैं हूं, क्या मुझे नहीं पहचानते?
होरी की चेतना लौटी. मृत्यु समीप आ गयी, आग दहकने वाली थी. धुंआ शान्त हो गया था.
धनिया को दीन आंखों से देखा, दोनों कोनों से आंसू की दो बूंदें ढुलक पड़ी. क्षीण
स्वर में बोला-मेरा कहा-सुना माफ करना धनिया. अब जाता हूं. गाय की लालसा मन में रह
गयी. अब तो यहां के रुपये क्रिया-करम में जायेंगे. रो मत धनिया, अब कब तक जिलायेगी?
सब दुर्दशा तो हो गयी. अब मरने दे.
और उसकी आंखें फिर बन्द हो गयीं. उसी वक्त हीरा और शोभा डोली लेकर पहुंच गये. होरी
को उठाकर डोली में लिटाया और गांव की ओर चले.
गांव में यह खबर हवा की तरह फैल गयी. सारा गांव जमा हो गया.
होरी खाट पर पड़ा शायद सब कुछ समझता था, पर जबान बन्द हो गयी थी. हां, उसकी
आंखों से बहते आंसू बतला रहे थे कि मोह का बन्धन तोड़ना कितना कठिन हो रहा है. जो
कुछ अपने से नहीं बन पड़ा, उसी के दुःख का नाम तो मोह है.पाले हुए कर्तव्य और
निपटाये हुए कामों का क्या मोह? मोह तो उन अनाथों को छोड़ जाने में है, जिनके साथ
हम अपना कर्तव्य न निभा सके, उन अधूरे मंसूबों में है, जिन्हें हम न पूरा कर सके.
मगर सब कुछ समझ कर भी धनिया आशा की मिटती हुई छाया को पकड़े हुए थी. आंखों से आंसू
गिर रहे थे, मगर यन्त्र की भांति दौड़-दौड़कर कभी आम भूनकर पना बनाती, कभी होरी की
देह में गेहूं की भूसी की मालिश करती. क्या करे, पैसे नहीं हैं,नहीं किसी को भेजकर
डाक्टर बुलाती.
हीरा ने रोते हुए कहा-भाभी, दिल कड़ा करो, गोदान करा दो, दादा चले.
धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आंखों से देखा. अब वह दिल को कितना कठोर करे?
अपने पति के प्रति उसका जो कर्म है, क्या वह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था
उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है?
और कई आवाजें आयीं-हां, गोदान करादो, अब यही समय है.
धनिया यन्त्र की भांति उठी, आज जो सुतली बेची थी, उसके बीस आने पैसे लायी और पति
के ठण्डे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली-महाराज! घर में न गाय है, न
बछिया, न पैसा. यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है.
और पछाड़ खाकर गिर पड़ी.

: समाप्त :

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