गोदान (भाग 2)

: 31 :

रायसाहब का सितारा बुलन्द था. उनके तीनों मंसूबे पूरे हो गये थे. कन्या की शादी धूम
-धाम से हो गयी थी, मुकदमा जीत गये थे और निर्वाचन में सफल ही न हुए थे, होम
मेम्बर भी हो गये थे. चारों ओर से बधाइयां मिल रही थीं. तारों का तांता लगा हुआ था.
सम्मान तो उनका पहले भी किसी से कम न था, मगर अब तो उसकी ज़ड़ और भी गहरी और
मजबूत हो गयी थी. सामयिक पत्रों में उनके चित्र और चरित्र दनादन निकल रहे थे. कर्ज
की मात्रा बहुत बढ़ गई थी, मगर अब रायसाहब को इसकी परवा न थी. वह इस नयी मिलकियत
का एक छोटा-सा टुकड़ा बेचकर कर्ज से मुक्त हो सकते थे. सुख की जो ऊंची-से-ऊंची
कल्पना उन्होंने की थी, उससे कहीं ऊंचे जा पहुंचे थे. अभी तक उनका बंगला केवल लखनऊ
में था. अब नैनीताल, मंसूरी और शिमला-तीनों स्थानों में एक-एक बंगला बनवाना लाजिमी
हो गया. अब उन्हें यह शोभा नहीं देता कि इन स्थानों में जायें, तो होटलों मे या
किसी दूसरे राजा के बंगले में ठहरें. जब सूर्यप्रतापसिंह के बंगले इन सभी स्थानों
में थे, तो रायसाहब के लिए यह बड़ी लज्जा की बात थी कि उनके बंगले न हों.
संयोग से बंगले बनवाने की जहमत न उठानी पड़ी. बने-बनाये बंगले सस्ते दामों में मिल
गये.हरएक बंगले के लिए माली, चौकीदार, कारिन्दा, खानसामा आदि भी रख लिए गये थे, और
सबसे बड़े सौभाग्य की बात यह थी कि अब हिज मैजेस्टी के जन्मदिन के अवसर पर उन्हें
राजा की पदवी भी मिल गयी. अब उनकी महत्वाकांक्षा सम्पूर्ण रूप से संतुष्ट हो गयी.
उस दिन खूब जश्न मनाया गया और इतनी शानदार दावत हुई कि पिछले सारे रेकार्ड टूट गये.
जिस वक्त हिज एक्सेलेन्सी गवर्नर ने उन्हें पदवी प्रदान की गर्व के साथ राज-भक्ति
की ऐसी तरंग उनके मन में उठी कि उनका एक-एक रोम उससे प्लावित हो उठा. यह है
जीवन! नहीं, विद्रोहियों के फेरे में पड़कर व्यर्थ बदनामी ली, जेल गये और अफ्सरों
की नजरों से गिर गये. जिस डी.एस.पी. ने उन्हें पिछली बार गिरफ्तार किया था, इस वक्त
वह उनके सामने हाथ बांधे खड़ा था, और शायद अपने अपराध के लिए क्षमा मांग रहा था.
मगर जीवन की सबसे बड़ी विजय उन्हें उस वक्त हुई, जब उनके पुराने, परास्त शत्रु
सूर्यप्रतापसिंह ने उनके बडे लड़के रुद्रपालसिंह से अपनी कन्या के विवाह का सन्देश
भेजा. रायसाहब को न मुकदमा जीतने की इतनी खुशी हुई थी, न मिनिस्टर होने की. यह सारी
बातें कल्पना में आती थीं, मगर यह बात तो आशातीत ही नहीं, कल्पनातीत थी. वही
सूर्यप्रतापसिंह, जो अभी कई महीने तक उन्हें अपने कुत्ते से भी नीच समझता था,
वह आज उनके लड़के से अपनी लड़की का विवाह करना चाहता था! कितनी असम्भव बात!
रुद्रपाल इस समय एम. ए में पड़ता था. बड़ा निर्भीक, पक्का आदर्शवादी, अपने ऊपर
भरोसा रखनेवाला, अभिमानी, रसिक और आलसी युवक था, जिसे अपने पिता की यह धन और
मानलिप्सा बुरी लगती थी.
रायसाहब इस समय नैनीताल में थे. यह सन्देशा पाकर फूल उठे. यद्यपि वह विवाह के विषय
में लड़के पर किसी तरह का दबाव डालना न चाहते थे, पर इसका उन्हें विश्वास था कि वह
जो कुछ निश्चय कर लेंगे, उसमें रुद्रपाल को कोई आपत्ति न होगी और राजा सूर्यप्रताप
सिंह से नाता हो जाना एक ऐसे सौभाग्य की बात थी कि रुद्रपाल का सहमत न होना खयाल
में न आ सकता था. उन्होंने तुरन्त राजा साहब को बात दे दी और उसी वक्त रुद्रपाल को
फोन किया. रुद्रपाल ने जवाब दिया-मुझे स्वीकार नहीं.
रायसाहब को अपने जीवन में न कभी इतनी निराशा हुई थी, न इतना क्रोध आया था, पूछा-
कोई वजह? `समय आने पर मालूम हो जायेगा.’
`मैं अभी जानना चाहता हूं.’
`मैं नहीं बतलाना चाहता.’
`तुम्हें मेरा हुक्म मानना पड़ेगा.’
`जिस बात को मेरी आत्मा स्वीकार नहीं करती, उसे मैं आपके हुक्म से नहीं मान सकता.’
रायसाहब ने बड़ी नम्रता से समझाया-बेटा, तुम आदर्शवाद के पीछे अपने पैरों में
कुल्हाड़ी मार रहे हो. यह सम्बन्ध समाज में तुम्हारा स्थान कितना ऊंचा कर देगा, कुछ
तुमने सोचा है? इसे ईश्वर की प्रेरणा समझो.उस कुल की कोई दरिद्र कन्या भी मुझे
मिलती, तो मैं अपने भाग्य को सराहता, यह तो राजा सूर्यप्रताप की कन्या है, जो हमारे
सिरमौर है. मैं उसे रोज देखता हूं. तुमने भी देखा होगा. रूप, गुण, शील, स्वभाव में
ऐसी युवती मैंने आज तक नहीं देखी. मैं तो चार दिन का और मेहमान हूं, तुम्हारे सामने
जीवन पड़ा है. मैं तुम्हारे ऊपर दबाव नहीं डालना चाहता. तुम जानते हो, विवाह के
विषय में मेरे विचार कितने उदार हैं, लेकिन मेरा यह तो धर्म है कि अगर तुम्हें गलती
करते देखूं, तो चेतावनी दे दूं.
रुद्रपाल ने इसका जवाब दिया-मैं इस विषय में बहुत पहले निश्चय कर चुका हूं. अब कोई
परिवर्तन नहीं हो सकता!
रायसाहब को लड़के की जड़ता पर फिर क्रोध आ गया, गरजकर बोले-मालूम होता है तुम्हारा
सिर फिर गया है. आकर मुझसे मिलो. विलम्ब न करना.मैं राजा साहब को जबान दे चुका हूं.
रुद्रपाल ने जवाब दिया-खेद है, अभी मुझे अवकाश नहीं है.
दूसरे दिन रायसाहब खुद आ गये. दोनों अपने-अपने शस्त्रों से सजे तैयार खड़े थे. एक
ओर सम्पूर्ण जीवन का मंजा हुआ अनुभव था, समझौतों से भरा हुआ, दूसरी ओर कच्चा
आदर्शवाद था, जिद्दी, उद्दण्ड और निर्मम.
रायसाहब ने सीधे मर्म पर आघात किया-मैं जानना चाहता हूं, वह कौन लड़की है?
रुद्पाल ने अचल भाव से कहा-अगर आप इतने उत्सुक हैं, तो सुनिये. वह मालती देवी की
बहिन सरोज है.
रायसाहब आहत होकर गिर पड़े-अच्छा, वह!
`आपने तो सरोज को देखा होगा?’
`खूब देखा है. तुमने राजकुमारी को देखा है या नहीं?’
`जी हां, खूब देखा है.’
`फिर भी….’
`मैं रूप को कोई चीज नहीं समझता.’
`तुम्हारी अक्ल पर मुझे अफ्सोस आता है. मालती को जानते हो, कैसी औरत है? उसकी बहिन
क्या क्या कुछ और होगी?’
रुद्रपाल ने तेवरी चढ़ाकर कहा- मैं इस विषय में आपसे और कुछ नहीं चाहता, मगर मेरी

शादी होगी, तो सरोज से.
`मेरे जीते जी कभी नहीं हो सकती.’
`तो आपके बाद होगी.’
`अच्छा, तुम्हारे यह इरादे हैं?’
और रायसाहब की आंखें सजल हो गयीं. जैसे सारा जीवन उजड़ गया हो, मिनिस्ट्री और इलाका
और पदवी, सब जैसे बासी फूलों की तरह नीरस, निरानन्द हो गये हों. जीवन की सारी साधना
व्यर्थ हो गयी. उनकी स्त्री का जब देहान्त हुआ था, तो उनकी उम्र छत्तीस साल से
ज्यादा न थी. वह विवाह कर सकते थे, और भोग-विलास का आनन्द उठा सकते थे. सभी उनसे
विवाह करने के लिए आग्रह कर रहे थे, मगर उन्होंने इन बालकों का मुंह देखा और विधुर
जीवन की साधना स्वीकार कर ली. इन्ही लड़कों पर अपने जीवन का सारा भोग-विलास
न्यौछावर कर दिया.
आज तक अपने हृदय का सारा स्नेह लड़कों को देते चले आये हैं, और आज यह लड़का इतनी
निष्ठुरता से बातें कर रहा है, मानो उनसे कोई नाता नहीं, फिर वह क्यों जायदाद और
सम्मान और अधीकार के लिए जान दें? इन्हीं लड़कों ही के लिए तो वह सब कुछ कर रहे थे,
जब लड़कों को उनका जरा भी लिहाज नहीं, तो वह क्यों यह तपस्या करें? उन्हें कौन
संसार में बहुत दिन रहना है. उन्हें भी आराम से पड़े रहना आता है. उनके और हजारों
भाई मूंछों पर ताव देकर जीवन का भोग करते हैं और मस्त घूमते हैं. फिर भी क्यों न
भोग-विलास में पड़े रहें?
उन्हें इस वक्त याद न रहा कि वह जो तपस्या कर रहे हैं, वह लड़कों के लिए नहीं,
बल्कि अपने लिए, केवल यश के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि वह कर्मशील हैं और उन्हें
जीवित रहने के लिए इसकी जरूरत है. वह विलासी और अकर्मण्य बनकर अपनी आत्मा को
सन्तुष्ट नहीं रख सकते. उन्हें मालूम नहीं कि कुछ लोगों की प्रकृति ही ऐसी होती है
कि विलास का अपाहिजपन स्वीकार ही नहीं कर सकते. वे अपने जिगर का खून पीने ही के लिए
बने हैं, और मरते दम तक पिये जायेंगे.
मगर इस चोट की प्रतिक्रिया भी तुरन्त हुई. हम जिनके लिए त्याग करते है, उनसे किसी
बदले की आशा न रखकर भी उनके मन पर शासन करना चाहते हैं. चाहे वह शासन उन्हीं के हित
के लिए हो, यद्यपि उस हित को हम इतना अपना लेते हैं कि वह उनका न होकर हमारा हो
जाता है. त्याग की मात्रा जितनी ही ज्यादा होती है, यह शासन-भावना भी उतनी ही प्रबल
होती है और जब सहसा हमें विद्रोह का सामना करना पड़ता है, तो हम क्षुब्ध हो उठते
हैं और वह त्याग जैसे प्रतिहिंसा का रूप ले लेता है. रायसाहब को यह जिद पड़ गयी कि
रुद्रपाल का विवाह सरोज के साथ न होने पाये, चाहे इसके लिए उन्हें पुलिस की मदद
क्यों न लेनी पड़े, नीति की हत्या क्यों न करनी पड़े.उन्होंने जैसे तलवार खींचकर
कहा-हां, मेरे बाद ही होगी और अभी उसे बहुत दिन हैं.
रुद्रपाल ने जैसे गोली चलादी-ईश्वर करे, आप अमर हों. सरोज से मेरा विवाह हो चुका.
`झूठ!’
`बिलकुल नहीं, प्रमाण-पत्र मौजूद है.’
रायसाहब आहत होकर गिर पड़े. इतनी सतृष्ण हिंसा की आंखों से उन्होंने कभी किसी शत्रु 247
को न देखा था. शत्रु अधिक-से-अधिक उनके स्वार्थ पर आघात कर सकता था, या देह पर या
सम्मान पर, यह आघात तो उस मर्मस्थल पर था, जहां जीवन की सम्पूर्ण प्रेरणा सञ्चित
थी. एक आंधी थी, जिसने उनका जीवन जड़ से उखाड़ दिया. अब वह सर्वथा अपंग हैं. पुलिस

की सारी शक्ति हाथ में रहते हुए अपंग हैं. बलप्रयोग उनका अन्तिम शस्त्र था.वह
शस्त्र उनके हाथ से निकल चुका था. रुद्रपाल बालिग है, सरोज भी बालिग है. और
रुद्रपाल अपनी रियासत का मालिक है. उनका उस पर कोई दबाव नहीं. आह! अगर जानते, यह
लौंडा यों विद्रोह करेगा, तो इस रियासत के लिए लड़ते ही क्यों? इस मुकदमेंबाजी के
पीछे दो-ढाई लाख बिगड़ गये. जीवन ही नष्ट हो गया. अब तो उनकी लाज इसी तरह बचेगी कि
इस लौंडे की खुशामद करते रहें, उन्होंने जरा बाधा दी और इज्जत धूल में मिली. वह
जीवन का बलिदान करके भी अब स्वामी नहीं हैं. ओह! सारा जीवन नष्ट हो गया. सारा जीवन!
रुद्रपाल चला गया था. रायसाहब ने कार मंगवायी और मेहता से मिलने चले. मेहता अगर
चाहें, तो मालती को समझा सकते हैं. सरोज भी उनकी अवहेलना न करेगी, अगर दस-बीस
हजाररुपये बल खाने से भी विवाह रुक जाये, तो वह देने को तैयार थे. उन्हें उस
स्वार्थ के नशे में यह बिलकुल खयाल न रहा कि वह मेहता के पास ऐसा प्रस्ताव लेकर जा
रहे हैं, जिस पर मेहता की हमदर्दी कभी उनके साथ न होगी.
मेहता ने सारा वृतान्त सुनकर उन्हें बनाना शुरू किया. गम्भीर मुंह बनाकर बोले-यह तो
आपकी प्रतिष्ठा का सवाल है.
रायसाहब भांप न सके. उछलकर बोले- जी हां, केवल प्रतिष्ठा का. राजा सूर्यप्रतापसिंह
को तो आप जानते हैं?
`मैंने उनकी लड़की को भी देखा है. सरोज उसके पांव की धूल भी नहीं है.’
`मगर इस लौंडे की अक्ल पर पत्थर पड़ गया है.’
`तो मारिये गोली, आपको क्या करना है? वही पछतायेगा.’
`ओह! यही तो नहीं देखा जाता मेहताजी! मिलती हुई प्रतिष्ठा नहीं छोड़ी जाती. मैं इस
प्रतिष्ठा पर अपनी आधी रियासत कुर्बान करने को तैयार हूं. आप मालती देवी को समझा
दें, तो काम बन जाये. इधर से इनकार हो जाये, तो रुद्रपाल सिर पीटकर रह जायेगा और यह
नशा दस-पांच दिन में आप उतर जायेगा. यह प्रेम-स्नेह कुछ नहीं, केवल सनक है.’
`लेकिन मालती बिना कुछ रिश्वत लिए मानेगी नहीं.’
`आप जो कुछ कहिये, मैं उसे दूंगा. वह चाहे तो मैं उसे यहां के डफरिन हास्पिटल का
इञ्चार्ज बना दूं.’
`मान लीजिये, वह आपको चाहे, तो आप राजी होंगे? जब से आपको मिनिस्ट्री मिली है, आपके
विषय में उसकी राय जरूर बदल गयी होगी.’
रायसाहब ने मेहता के चेहरे की तरफ देखा. उस पर मुसकराहट की रेखा नजर आयी. समझ
गये. व्यथित स्वर में बोले-आपको भी मुझसे मजाक करने का यही अवसर मिला.मैं आपके पास
इसलिए आया था कि मुझे यकीन था कि आप मेरी हालत पर विचार करेंगे, मुझे उचित राय
देंगे. और आप मुझे बनाने लगे. जिसके दांत नहीं दुखे, वह दांतों का दर्द क्या जाने.
मेहता ने गम्भीर स्वर में कहा-क्षमा कीजियेगा, आप प्रश्न ही ऐसा लेकर आये हैं कि उस
पर गम्भीर विचार करना मैं हास्यापद समझता हूं. आप अपनी शादी के जिम्मेदार हो सकते
हैं. लड़के की शादी का दायित्व आप क्यों अपने ऊपर लेते हैं, खास कर जब आपका लड़का
बालिग है और अपना नफा-नुक्सान समझता है. कम-से-कम मैं तो शादी जैसे महत्व के मुआमले
में प्रतिष्ठा का कोई स्थान नहीं समझता. प्रतिष्ठा धन से होती, तो राजा साहब उस
नंगे के सामने घण्टों गुलामों की तरह हाथ बांधे न खड़े रहते.
मालूम नहीं कहां तक सही है, पर राजा साहब अपने इलाके के दारोगा तक को सलाम करते
हैं, इसे आप प्रतिष्ठा कहते हैं? लखनऊ मैं आप किसी दुकानदार, किसी अहलकार, किसी
राहगीर से पूछिये, उनका नाम सुनकर गालियां ही देगा. इसी को आप प्रतिष्ठा कहते है?
जाकर आराम से बैठिये. सरोज से अच्छी वधू आपको बड़ी मुश्किल से मिलेगी.
रायसाहब ने आपत्ति के भाव से कहा-बहिन तो मालती ही की है.
मेहता ने गरम होकर कहा-मालती की बहिन होना क्या अपमान की बात है? मालती को आपने
जाना नहीं और न जानने की परवा की. मैंने भी यही समझा था, लेकिन अब मालूम हुआ कि
वह आग मैं पड़कर चमकनेवाली सच्ची धातु है. वह उन वीरों में है, जो अवसर पड़ने पर
अपने जौहर दिखाते हैं, तलवार घुमाते नहीं चलते. आपको मालूम है, खन्ना की आजकल क्या
दशा है?
रायसाहब ने सहानुभूति के भाव से सिर हिलाकर कहा-सुन चुका हूं, और बार-बार इच्छा हुई
कि उनसे मिलूं,लेकिन फुर्सत न मिली.उस मिल में आग लगना उनके सर्वनाश का कारण हो गया
`जी हां. अब वह एक तरह से दोस्तों की दया पर अपना निर्वाह कर रहे हैं. उस पर
गोविन्दी महीनों से बीमार है. उसने खन्ना पर अपने को बलिदान कर दिया, उस पशु पर
जिसने हमेशा उसे जलाया, अब वह मर रही है. और मालती रात की रात उसके सिरहाने बैठी रह
जाती है-वही मालती, जो किसी राजा-रईस से पांच सौ फीस पाकर भी रात-भर न बैठेगी.
खन्ना के छोटे बच्चों को पालने का भार भी मालती पर है. यह मातृत्व उसमें कहां सोया
हुआ था, मालूम नहीं. मुझे तो मालती का यह स्वरूप देखकर अपने भीतर श्रद्धा का अनुभव
होने लगा, हालांकि आप जानते हैं, मैं घोर जड़वादी हूं, और भीतर के परिष्कार के साथ
उसकी छवि में भी देवत्व की झलक आने लगी है. मानवता इतनी बहुरंगी और इतनी समर्थ है,
इसलका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है. आप उनसे मिलना चाहें, तो चलिए, इसी बहाने
मैं भी चला चलूंगा.’
रायसाहब ने सन्दिग्ध भाव से कहा-जब आप ही मेरे दर्द को नहीं समझ सके, तो मालती देवी
क्या समझेंगी, मुफ्त में शर्मिन्दगी होगी, मगर आपको पास जाने के लिए किसी बहाने की
जरुरत क्यों? मैं तो समझता था, आपने उनके ऊपर जादू डाल दिया है.
मेहता ने हसरत-भरी मुसकराहट के साथ जवाब दिया-वह बात अब स्वप्न हो गयी. अब तो कभी
उनके दर्शन भी नहीं होते. उन्हें अब फुर्सत भी नहीं रहती. दोचार बार गया. मगर मुझे
मालूम हुआ, मुझसे मिलकर वह कुछ खुश नहीं हुई,तब से जाते झेंपता हूं. हां, खूब याद
आया, आज महिला-व्यायामशाला का जलसा है, आप चलेंगे?
रायसाहब ने बेदिली के साथ कहा-जी नहीं, मुझे फुर्सत नहीं है. मुझे तो यह चिन्ता
सवार है कि राजा साहब को क्या जवाब दूंगा. मैं उन्हें वचन दे चुका हूं.
यह कहते हुए वह उठ खड़े हुए और मन्द गति से द्वार की ओर चले. जिस गुत्थी को सुलझाने
आये थे, वह और भी जटिल हो गयी. अन्धकार और भी असूझ हो गया. मेहता ने कार तक आकर
उन्हें विदा किया.
रायसाहब सीधे अपने बंगले पर आये और दैनिक पत्र उठाया था कि मिस्टर तंखा का कार्ड
मिला. तंखा से उन्हें घृणा थी, और उनका मुंह भी न देखना चाहते थे, लेकिन इस वक्त मन
की दुर्बल दशा में उन्हें किसी हमदर्द की तलाश थी, जो और कुछ न कर सके, पर उनके
मनोभावों से सहानुभूति तो करे. तुरन्त बुला लिया.
तंखा पांव दबाते हुए, रोनी सूरत लिये कमरे में दाखिल हुए और जमीन पर झुककर सलाम
करते हुए बोले- मैं तो हुजूर के दर्शन करने नैनीताल जा रहा था. सौभाग्य से यहीं
दर्शन हो गये. हुजूर का मिजाज तो अच्छा है?
इसके बाद उन्होंने बड़ी लच्छेदार भाषा मैं और अपने पिछले व्यवहार को बिलकुल भूलकर,
रायसाहब का यशोगान आरम्भ किया- ऐसे होम मेम्बरी कोई क्या करेगा, जिधर देखिये, हुजूर
ही के चर्चे हैं. यह पद हुजूर ही को शोभा देता है.
रायसाहब मन में सोच रहे थे, यह आदमी भी कितना बड़ा धूर्त है, अपनी गरज पड़ने पर गधे
को दादा कहनेवाला, पहले सिरे का बेवफा और निर्लज्ज मगर उन्हें उन पर क्रोध न आया,
दया आयी. पूछा-आजकल आप क्या कर रहें हैं?
कुछ नहीं हुजूर, बेकार बैठा हूं. इसी उम्मीद से आपकी खिदमत मैं हाजिर होने जा रहा
था कि अपने पुराने खादिमों पर निगाह रहे. आजकल बड़ी मुसीबत में पड़ा हुआ हूं हुजूर.
राजा सूर्यप्रतापसिंह को तो हुजूर जानते हैं, अपने सामने किसी को नहीं समझते. एक
दिन आपकी निन्दा करने लगे. मुझसे न सुना गया. मैंने कहा, बस कीजिये महाराज मेरे
स्वामी हैं और मैं उनकी निन्दा नहीं सुन सकता. बस, इसी बात पर बिगड़ गये. मैंने भी
सलाम किया और घर चला आया. साफ कह दिया, आप कितना ही ठाठ-बाट दिखाये, पर रायसाहब
की जो इज्जत है, वह आपको नसीब नहीं हो सकती. इज्जत ठाठ से नहीं होती लियाकत से होती
है. आपमें जो लियाकत है, वह तो दुनिया जानती है.
रायसाहब ने अभिनय किया-आपने तो सीधे घर में आग लगा दी.
तंखा ने अकड़कर कहा- मैं तो हुजूर साफ कहता हूं, किसी को अच्छा लगे या बुरा. जब
हुजूर के कदमों को पकड़े हुए हूं, तो किसी से क्यों डरूं? हुजूर के तो नाम से जलते
हैं. जब देखिये, हुजूर की बदगोई. जब से आप मिनिस्टर हुए हैं, उनकी छाती पर सांप लोट
रहा है. मेरी सारी की सारी मजदूरी साफ डकार गये.देना तो जानते नहीं हुजूर! असामियों
पर इतना अत्याचार करते हैं कि कुछ न पूछिये. किसी की आबरू सलामत नहीं. दिन
दहाड़ै औरतों को….
कार की आवाज आयी और राजा सूर्यप्रतापसिंह उतरे. रायसाहब ने कमरे से निकलकर उनका
स्वागत किया और इस सम्मान के बोझ से नत होकर बोले-मैं तो आपकी सेवा में आनेवाला

ही था.
यह पहला अवसर था कि राजा सूर्यप्रतापसिंह ने इस घर को अपने चरणों से पवित्र किया.
यह सौभाग्य!
मिस्टर तंखा भीगी बिल्ली बने बैठे हुए थे. राजा साहब यहां! क्या इधर इन दोनों
महोदयों में दोस्ती हो गयी है? उन्होंने रायसाहब की ईर्ष्याग्नि को उत्तेजित करके
अपना हाथ सेंकना चाहा था, मगर नहीं, राजा साहब यहां मिलने के लिए आ भले ही गये हों,
मगर दिलों में जो जलन है, वह तो कुम्हार के आंवे की तरह इस ऊपर की लेप-थोप से बुझने
वाली नहीं.
राजा साहब ने सिगार जलाते हुए तंखा की ओर कठोर आंखों से देखकर कहा-तुमने तो सूरत ही
नहीं दिखायी, मिस्टर तंखा! मुझसे उस दावत के सारे रुपये वसूल कर लिये और होटलवालों
को एक पाई न दी, मेरा सिर खा रहे हैं. मैं इसे विश्वासघात समझता हूं. मैं चाहूं, तो
अभी तुम्हें पुलिस में दे सकता हूं.
यह कहते हुए उन्होंने रायसाहब को सम्बोधित करके कहा-ऐसा बेईमान आदमी मैंने नहीं
देखा रायसाहब! मैं सत्य कहता हूं, मैं कभी आपके मुकाबले में न खड़ा होता. मगर इसी
शैतान ने मुझे बहकाया और मेरे एक लाख रुपये बरबाद कर दिये. बंगला खरीद लिया साहब,
कार रख ली. एक वैश्या से आशनाई भी कर रखी है. पूरे रईस बन गये और अब दगाबाजी
शुरू की है. रईसों की शान निभाने के लिए रियासत चाहिए. आपकी रियासत अपने दोस्तों की
आंखों में धूल झोंकना है.
रायसाहब ने तंखा की ओर तिरस्कार की आंखों से देखा और बोले-आप चुप क्यों हैं मिस्टर
तंखा, कुछ जवाब दीजिये. राजा साहब ने तो आपका सारा मेहनताना दबा लिया है. इसका कोई
जवाब आपके पास है? अब कृपा करके यहां से चले जाइये और खबरदार, फिर अपनी सूरत न
दिखाइयेगा. दो भले आदमियों मैं लड़ाई लगाकर अपना उल्लू सीधा करना बेपूंजी का रोजगार
है, मगर इसका घाटा और नफा दोनों ही जान-जोखिम है, समझ लीजिये.
तंखा ने ऐसा सिर गड़ाया कि फिर न उठाया. धीरे से चले गये जैसे कोई चोर कुत्ता मालिक
के अन्दर आ जाने पर दबककर निकल जाये.
जब वह चले गये, तो राजा साहब ने पूछा-मेरी बुराई करता होगा?
`जी हां, मगर मैंने भी खूब बनाया.’
`शैतान है.’
`पूरा.’
`बाप बेटे में लड़ाई करवा दे, मियां-बीवी में लड़ाई करवा दे. इस फन में उस्ताद है.
खैर, आज बचा को अच्छा सबक मिल गया.’
इसके बाद रुद्रपाल के विवाह की बातचीत शुरू हुई. रायसाहब के प्राण सूखे जा रहे थे,
मानो उन पर कोई निशाना बांधा जा रहा हो. कहां छिप जायें? कैसे कहें कि रुद्रपाल पर
उनका कोई अधिकार नहीं रहा, मगर राजा साहब को परिस्थिति का ज्ञान हो चुका था.
रायसाहब को अपनी तरफ से कुछ न कहना पड़ा. जान बच गयी.
उन्होंने पूछा-आपको इसकी क्योंकर खबर हुई?
`अभी-अभी रुद्रपाल ने लड़की के नाम एक पत्र भेजा है, जो उसने मुझे दिया.’
`आजकल के लड़कों में और तो कोई खूबी नजर नहीं आती, बस, स्वच्छन्दता की
सनक सवार है.’
`सनक तो है ही, मगर इसकी दवा मेरे पास है. मैं उस छोकरी को ऐसा गायब करवा दूं कि
कहीं पता न लगेगा.दस-पांच दिन में यह सनक ठण्डी हो जायेगी.समझाने से कोई नतीजा नही’
रायसाहब कांप उठे. उनके मन में भी इस तरह की बात आयी थी, लेकिन उन्होंने उसे आकार न
लेने दिया था. संस्कार दोनों व्यक्त्तियों के एक-से थे. गुफावासी मनुष्य दोनों ही
व्यक्तियों में जीवित था. रायसाहब ने उसे उपरी वस्त्रों से ढंक दिया था. राजा साहब
में वह नग्न न था. अपना बड़प्पन सिद्ध करने के अवसर को रायसाहब छोड़ न सके.
जैसे लज्जित होकर बोले-लेकिन यह बीसवीं सदी है, बारहवीं नहीं. रुद्रपाल के ऊपर इसकी
क्या प्रतिक्रिया होगी, मैं नहीं कह सकता, लेकिन मानवता की द्दष्टि….
राजा साहब ने बात काटकर कह- आप मानवता लिये फिरते हैं और यह नहीं देखते कि संसार
में आज भी मनुष्य की पशुता ही उसकी मानवता पर विजय पा रही है. नहीं, राष्ट्रों में
लड़ाइयां क्यों होतीं? पञ्चायतों से मामले न तय हो जाते? जब तक मनुष्य रहेगा, उसकी
पशुता भी रहेगी.
छोटी मोटी बहस छिड़ गयी और विवाद के रूप मैं आकर अन्त में वितण्डा बन गयी और राजा
साहब नाराज होकर चले गये. दूसरे दिन रायसाहब ने भी नैनीताल को प्रस्थान किया. और
उसके एक दिन बाद रुद्रपाल ने सरोज के साथ इंगलैण्ड की राह ली. अब उनमें पिता-पुत्र
का नाता न था. प्रतिद्वन्द्वी हो गये थे. मिस्टर तंखा अब रुद्रपाल के सलाहकार और
पैरोकार थे. उन्होंने रुद्रपाल की तरफ से रायसाहब पर हिसाब-फहमी का दावा किया.
रायसाहब पर दस लाख की डिग्री हो गयी. उन्हें डिग्री का इतना दुःख न था, जितना अपने
अपमान का. अपमान से भी बढ़कर दुःख था जीवन की सञ्चित अभिलाषाओं के धूल मैं मिल जाने
का और सबसे बड़ा दुःख था इस बात का कि अपने बेटे ने ही दगा दी. आज्ञाकारी पुत्र के
पिता बनने का गौरव बड़ी निर्दयता के साथ उनके हाथ से छीन लिया गया था.
मगर अभी उनके दुःख का प्याला भरा न था. जो कुछ कसर थी, वह लड़की और दामाद के
सम्बन्ध-विच्छेद ने पूरी कर दी. साधारण हिन्दू बालिकाओं की तरह मीनाक्षी भी बेजबान
थी. बाप ने जिसके साथ ब्याह कर दिया, उसके साथ चली गयी, लेकिन स्त्री-पुरुष में
प्रेम न था, दिग्विजयसिंह ऐयाश भी थे, शराबी भी. मीनाक्षी भीतर ही भीतर कुढ़ती रहती
थी.पुस्तकों और पत्रिकाओं से मन बहलाया करती थी. दिग्विजय की अवस्था तो तीस से अधिक
न थी. पड़ा-लिखा भी था, मगर बड़ा मगरूर, अपनी कुल-प्रतिष्ठा की डींग मारने वाला,
स्वभाव का निर्दयी और कृपण. गांव की नीच जाति की बहू-बेटियों पर डोरे डाला करता था.
सोहबत भी नीचों की थी, जिनकी खुशामदों ने उसे और भी खुशामदपसन्द बना दिया था.
मीनाक्षी ऐसे व्यक्ती का सम्मान दिल से न कर सकती थी फिर पत्रों में स्त्रियों के
अधिकारों की चर्चा पढ़-पढ़कर उसकी आंखें खुलने लगी थीं. वह जनाना क्लब में जाने आने
लगी थी. वहां कितनी ही शिक्षित ऊंचे कुल की महिलाएं आती थीं. उनमें वोट और अधिकार
और स्वाधीनता और नारी-जागृति की खूब चर्चा होती थी, जैसे पुरुषों के विरुद्ध कोई
षड्यंत्र रचा जा रहा हो. अधिकतर वही देवियां थीं, जिनकी अपने पुरुषों से न पटती थी,
जो नयी शिक्षा पाने के कारण पुरानी मर्यादा को तोड़ डालना चाहती थीं. कई युवतियां
भी थीं, जो डिग्रियां ले चुकी थीं और विवाहित जीवन को आत्मसम्मान के लिए घातक समझकर
नौकरियों की तलाश में थी. उन्हीं में एक मिस सुलतान थीं, जो विलायत से बार-एट-ला हो
कर आयी थीं और यहां परदानशीन महिलाओं को कानूनी सलाह देने का व्यवसाय करती थीं.
उन्हीं की सलाह से मीनाक्षी ने पति पर गुजारे का दावा किया. वह अब उसके घर में न
रहना चाहती थी. गुजारे की मीनाक्षी को जरूरत न थी. मैके में वह बड़े आराम से रह
सकती थी, मगर वह दिग्विजयसिंह के मुख मैं कालिख लगाकर यहां से जाना चाहती थी.
दिग्विजयसिंह ने उस पर उलटा बदचलनी का आक्षेप लगाया. रायसाहब ने इस कलह को शान्त कर
ने की भरसक बहुत चेष्टा की, पर मीनाक्षी अब पति की सूरत नहीं देखना चाहती थी.
यद्यपि दिग्विजयसिंह का दावा खारिज हो गया और मीनाक्षी ने उस पर गुजारे की डिग्री
पायी, मगर यह अपमान उसके जिगर में चुभता रहा. वह अलग एक कोठी में रहती थी,

समष्टिवादी आन्दोलन में प्रमुख भाग लेती थी, पर वह जलन शान्त न होती थी.
एक दिन वह क्रोध में आकर हण्टर लिये दिग्विजयसिंह के बंगले पर पहुंची. शोहदे जमा थे
और वैश्या का नाच हो रहा था. उसने रणचण्डी की भांति पिशाचों की इस चाण्डाल चौकड़ी
में पहुंचकर तहलका मचा दिया. हण्टर खा-खाकर लोग इधर-उधर भागने लगे. उसके तेज के
सामने वह नीच शोहदे क्या टिकते? जब दिग्विजयसींह अकेले रह गये, तो उसने उन पर
सड़ासड़ हण्टर जमाने शुरू किये और इतना मारा कि कुंवरसाहब बेदम हो गये. वेश्या अभी
तक कोने में दुबकी खड़ी थी. उसका नम्बर आया. मीनाक्षी हण्टर तानकर जमाना ही चाहती
थी कि वेश्या उनके पैरों पर गिर पड़ी और रोकर बोली-दुलहिनजी, आज आप मेरी जान बख्श
दें. मैं फिर कभी यहां न आऊंगी. मैं निरपराध हूं.
मीनाक्षी ने उसकी ओर घृणा से देखकर कहा-हां, तू निरपराध है. जानती है न, मैं कौन
हूं! चली जा. अब कभी यहां न आना. हम स्त्रियां भोगविलास की चीजें है ही, तेरा कोई
दोष नहीं!
वेश्या ने उसके चरणों पर सिर रखकर आवेश में कहा- परमात्मा आपको सुखी रखे. जैसा आपका
नाम सुनती थी, वैसा ही पाया.
`सुखी रहने से तुम्हारा क्या आशय है?’
`आप जो समझें महारानी जी!’
`नहीं, तुम बताओ.’
वेश्या के प्राण नखों में समा गये. कहां-से-कहां आशीर्वाद देने चली. जान बच गयी
थी, चुपके से अपनी राह लेनी चाहिए थी, दुआ देने की सनक सवार हुई. अब कैसे जान बचें?
डरती-डरती बोली-हुजूर का एकबाल बढ़े, नाम बढ़े.
मीनाक्षी मुस्करायी-हां ठीक है.
वह आकर अपनी कार में बैठी, हाकिम-जिला के बंगले पर पहुंचकर इस काण्ड की सूचना दी और
अपनी कोठी मैं चली आयी. तब से स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे थे.
दिग्विजयसिंह रिवाल्वर लिये उसकी ताक मैं फिरा करते और वह अपनी रक्षा के लिए दो
पहलवान ठाकुरों को अपने साथ लिये रहती थी और रायसाहब ने सुख का जो स्वर्ग बनाया
था, उसे अपनी जिन्दगी में ही ध्वंस होते देख रहे थे और अब संसार से निराश होकर उनकी
आत्मा अन्तर्मुखी होती जाती थी. अब तक अभिलाषाओं से जीवन के लिए प्रेरणा मिलती रहती
थी. उधर का रास्ता बन्द हो जाने पर उनका मन ही आप भक्ति की ओर झुका, जो अभिलाषाओं
से कहीं बढ़कर सत्य था. जिस नयी जायदाद के आसरे पर कर्ज लिये थे, वह जायदाद कर्ज की
पुरौती किये बिना ही हाथ से निकल गयी थी और वह बोझ सिर पर लदा हुआ था. मिनिस्ट्री
से जरूर अच्छी रकम मिलती थी, मगर वह सारी-की-सारी उस मर्यादा का पालन करने में ही
उड़ जाती थी और रायसाहब को अपना राजसी ठाठ निभाने के लिए वही असामियों पर इजाफा और
नजराना करना और लेना पड़ता था, जिससे उन्हें घृणा थी. वह प्रजा को कष्ट न देना
चाहते थे. उनकी दशा पर उन्हें दया आती थी, लेकिन जरूरतों से हैरान थे.
मुश्किल यह थी कि उपासना और भक्ति में भी उन्हें शान्ति न मिलती थी. वह मोह को छोड़
ना चाहते थे, पर मोह उन्हें न छोड़ता था और इस खींच-तान में उन्हें अपमान, ग्लानि
और अशान्ति से छुटकारा न मिलता था. और जब आत्मा में शान्ति नहीं, तो देह कैसे
स्वस्थ रहती? नीरोग रहने का सब उपाय करने पर भी एक-न-एक बाधा गले पड़ी रहती थी.
रसोई में भी सभी तरह के पकवान बनते थे, पर उनके लिए वही मूंग की दाल और फुलके थे.
अपने और भाइयों को देखते थे, जो उनसे भी ज्यादा मक्रुज, अपमानित और शोकग्रस्त थे,
जिनके भोग-विलास में, ठाठ-बाट में किसी तरह की कमी न थी, मगर इस तरह की बेहयाई उनके
बस में न थी. उनके मन के ऊंचे संस्कारों का ध्वंस न हुआ था. परपीड़ा, मक्कारी,
निर्लज्जता और अत्याचार को वह ताल्लुकेदारी की शोभा और रोब-दाब का नाम देकर अपनी
आत्मा को सन्तुष्ट कर सकते थे, और यही उनकी सबसे बड़ी हार थी.

Leave a Reply

Are you human? *