गोदान (भाग 2)

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गोबर को शहर आने पर मालूम हुआ था कि जिस अड्डे पर वह अपना खोंचा लेकर बैठता था,
वहां एक दूसरा खोंचेवाला बैठने लगा है और गाहक अब गोबर को भूल गये हैं. वह घर भी अब
उसे पिंजरे-सा लगता था. झुनिया उसमें अकेली बैठी रोया करती. लड़का दिन-भर आंगन में
या द्वार पर खेलने का आदी था. यहां उसके खेलने को कोई जगह न थी. कहां जाये?
द्वार पर मुश्किल से एक गज का रास्ता था. दुर्गन्ध उड़ा करती थी. गरमी में कहीं
बाहर लेटने-बैठने को जगह नहीं. लड़का मां को एक क्षण के लिए न छोड़ता था. और जब कुछ
खेलने को न हो, तो कुछ खाने और दूध पीने के सिवा वह और क्या करे! घर पर भी कभी
धनिया खेलाती, कभी रूपा कभी सोना, कभी होरी, कभी पुनिया. यहां अकेली झुनिया थी, और
और उसे घर का सारा काम करना पड़ता था.
और गोबर जवानी के नशे में मस्त था. उसकी अतृप्त लालसा विषय-भोग के सागर में डूब
जाना चाहती थी. किसी काम में उसका मन न लगता. खोंचा लेकर जाता, तो घण्टे भर ही में
लौट आता मनोरंजन का कोई दूसरा सामान न था. पड़ोस के मजूर और इक्केवान् रात-रात भर
ताश और जुआ खेलते थे. पहले वह भी खेलता था मगर अब उसके लिए केवल मनोरंजन था, झुनिया
के साथ हास-विलास. थोड़े ही दिनों में झुनिया इस जीवन से ऊब गयी. वह चाहती थी, कहीं
एकान्त में जाकर बैठे, खूब निश्चिन्त होकर लेटे-सोये, मगर वह एकान्त कहीं न मिलता.
उसे अब गोबर पर गुस्सा आता. उसने शहर के जीवन का कितना मोहक चित्र खींचा था, और
यहां इस काल-कोठरी के सिवा और कुछ नहीं. बालक से भी उसे चिढ़ होती थी. कभी-कभी वह
उसे मारकर निकाल देती और अन्दर से किवाड़ बन्द कर लेती.बालक रोते-रोते बेदम हो जाता
उस पर विपत्ति यह कि उसे दूसरा बच्चा पैदा होनेवाला था. कोई आगे, न पीछे. अक्सर सिर
में दर्द हुआ करता. खाने से अरुचि हो गयी थी. ऐसी तन्द्रा होती थी कि कोने में
चुपचाप पड़ी रहे. कोई उससे न बोले-चाले, मगर यहां गोबर का निष्ठुर प्रेम स्वागत के
लिए द्वार खटखटाता रहता था. स्तन में दूध नाम को नहीं, लेकिन लल्लू छाती पर सवार
रहता था.देह के साथ उसका मन भी दुर्बल हो गया.वह जो संकल्प करती उसे थोड़े से आग्रह
पर तोड़ देती. वह लेटी होती और लल्लू आकर जबरदस्ती उसकी छाती पर बैठ जाता और
स्तन मुंह में लेकर चबाने लगता. वह अब दो साल का हो गया था. बड़े तेज दांत निकल आये
थे. मुंह में दूध न जाता, तो वह क्रोध में आकर स्तन में दांत काट लेता, लेकिन
झुनिया में इतनी शक्ति भी न थी कि उसे छाती पर से ढकेल दे. उसे हरदम मौत सामने खड़ी
नजर आती. पति और पुत्र किसी से भी उसे स्नेह न था. सभी अपने मतलब के यार हैं.
बरसात के दिनों में जब लल्लू को दस्त आने लगे और उसने दूध पीना छोड़ दिया, तो
झुनिया को सिर से एक विपत्ति टल जाने का अनुभव हुआ. लेकिन जब एक सप्ताह के बाद बालक
मर गया, तो उसकी स्मृति पुत्र-स्नेह से सजीव होकर उसे रुलाने लगी.
और जब गोबर बालक के मरने के एक ही सप्ताह बाद फिर आग्रह करने लगा, तो उसने
क्रोध से जलकर कहा-तुम कितने पशु हो?
झुनिया को अब लल्लू की स्मति लल्लू से भी कहीं प्रिय थी. लल्लू जब तक सामने था, वह
उससे जितना सुख पाती, उससे कहीं ज्यादा कष्ट पाती थी. अब लल्लू उसके मन में आ बैठा
था, शान्त, स्थिर, सुशील, सुहास. उसकी कल्पना में अब वेदनामय आनन्द था,जिसमें
प्रत्यक्ष की काली छाया न थी बाहरवाला लल्लू उसके भीतरवाले लल्लू का प्रतिबिम्ब
मात्र था. प्रतिबिम्ब सामने न था, जो असत्य था, अस्थिर था. सत्य रूप तो उसके भीतर
था, उसकी आशाओं और शुभेच्छाओं से सजीव. दूध की जगह वह उसे अपना रक्त पिला-पिलाकर
पाल रही थी. उसे अब वह बन्द कोठरी और वह दुर्गन्धमय वायु और वह दोनों जून धुएं में
जलना, इन बातों का ज्ञान ही न रहा. वह स्मृति उसके भीतर बैठी हुई उसे शक्ति प्रदान
करती रहती. जीते-जी जो उसके जीवन का भार था, मरकर उसके प्राणों में समा गया था.
उसकी सारी ममता अन्दर जाकर बाहर से उदासीन हो गयी. गोबर देर में आता है या जल्द,
रुचि से भोजन करता है या नहीं, प्रसन्न है या उदास अब उसे बिलकुल चिन्ता न थी. गोबर
क्या कमाता है और कैसे खर्च करता है, इसकी भी उसे परवा न थी. उसका जीवन जो
कुछ था, बाहर वह केवल निर्जीव थी.
उसके शोक में भाग लेकर, उसके अन्तर्जीवन में बैठकर उसके समीप आ सकता था, उसके
जीवन का अंग बन सकता था, पर वह उसके बाह्य जीवन के सूखे तट पर आकर ही प्यासा लौट
जाता था.
एक दिन उसने रूखे स्वर में कहा-तो लल्लू के नाम को कब तक रोये जायेगी. चार-पांच
महीने तो हो गये.
झुनिया ने ठण्डी सांस लेकर कहा- तुम मेरा दुःख नहीं समझ सकते. अपना काम करो. मैं
जैसी हूं, वैसी पड़ी रहने दो.
`तेरे रोते रहने से लल्लू लौट आयेगा?’
झुनिया के पास इसका कोई जवाब न था. वह उठकर पतीली में कचालू के लिए आलू उबालने
लगी. गोबर को ऐसा पाषाण हृदय उसने न समझा था.
इस बेदर्दी ने लल्लू को उसके मन में और सजग कर दिया.लल्लू उसी का है,उसमें किसी का
साझा नहीं, किसी का हिस्सा नहीं. अभी वह सम्पूर्ण रूप से उसका था.
गोबर ने खोंचे से निराश होकर शक्कर के मिल में नौकरी कर ली थी. मिस्टर खन्ना ने
पहले से प्रोत्साहित होकर हाल में यह दूसरा मिल खोल दिया था. गोबर को वहां बड़े

सबेरे जाना पड़ता, और दिन-भर के बाद जब वह दिया-जले घर लौटता, तो उसकी देह में जरा
भी थकान न होती थी. बीच-बीच में वह हंस-बोल भी लेता था.फिर उस खुले हुए मैदान में,
उन्मुक्त आकाश के नीचे, जैसे उसकी क्षति पूरी हो जाती थी. वहां उसकी देह चाहे जितना
काम करे, मन स्वच्छन्द रहता था. यहां देह की उतनी मेहनत न होने पर भी जैसे उस
कोलाहल, उस गति और तूफानी शोर का उस पर बोझ-सा लदा रहता था. यह शंका भी बनी रहती
थी कि न जाने कब डांट पड़ जाये.सभी श्रमिकों की यही दशा थी. सभी ताड़ी या शराब में
अपनी दैहिक थकान और मानसिक अवसाद को डुबोया करते थे. गोबर को भी शराब का चस्का पड़ा
घर आता तो नशे में चूर, और पहर रात गये. और आकर कोई-न-कोई बहाना खोजकर झुनिया को
गालियां देता, घर से निकालने लगता और कभी-कभी पीट भी देता.
झुनिया को अब यह शंका होने लगी कि वह रखेली है, इसी से उसका यह अपमान हो रहा है.
ब्याहता होती, तो गोबर की मजाल थी कि उसके साथ यह बर्ताव करता. बिरादरी उसे दण्ड
देती,हुक्का-पानी बन्द कर देती. उसने कितनी बड़ी भूल की कि इस कपटी के साथ घर से
निकल भागी. सारी दुनिया में हंसी भी हुई और हाथ कुछ न आया. वह गोबर को अपना दुश्मन
समझने लगी. न उसके खाने-पीने की परवाह करती, न अपनी खाने-पीने की. जब गोबर उसे
मारता, तो उसे ऐसा क्रोध आता कि गोबर का गला छुरे से रेत डाले. गर्भ ज्यों-ज्यों
पूरा होता जाता है, उसकी चिन्ता बढ़ती जाती है. इस घर में तो उसकी मरन हो जायेगी.
कौन उसकी देखभाल करेगा, कौन उसे संभालेगा? और जो गोबर इसी तरह मारता पीटता रहा, तब
तो उसका जीवन नरक ही हो जायेगा.
एक दिन वह बम्बे पर पानी भरने गयी, तो पड़ोस की एक स्त्री ने पूछा-कै महीने का है
रे? झुनिया ने लजाकर कहा-क्या जाने दीदी, मैंने तो गिना-गिनाया नहीं.
दोहरी देह की, काली-कलुटी, नाटी, कुरूपा, बड़े-बड़े स्तनोंवाली स्त्री थी. उसका
पति एक्का हांकता था और वह खुद लकड़ी की दुकान करती थी. झुनिया कई बार उसकी दुकान
से लकड़ी लायी थी. इतना ही परिचय था.
मुसकराकर बोली-मुझे तो जान पड़ता है, दिन पूरे हो गये हैं. आज ही कल में होगा. कोई
दाई-वाई ठीक करली है?
झुनिया ने भयातुर स्वर में कहा-मैं तो यहां किसी को नहीं जानती.
`तेरे मर्दुआ कैसा है, जो कान में तेल डाले बैठा है?’
`उन्हें मेरा क्या फिकर?’
`हां, देख तो रही हूं. तुम तो सौर में बैठोगी, कोई करने-धरनेवाला चाहिए कि नहीं?
सास-ननद, देवरानी-जेठानी, कोई है कि नहीं? किसी को बुला लेना था.’
`मेरे लिए सब मर गये.’
वह पानी लाकर झूठे बरतन मांजने लगी, तो प्रसव की शंका से हृदय में धड़कनें हो रही
थी. सोचने लगी-कैसे क्या होगा भगवान्? उंह!यही होगा, मर जाऊंगी. अच्छा है,जञ्जाल से
छूट जाऊंगी.
शाम को उसके पेट में दर्द होने लगा. समझ गयी, विपत्ति की घड़ी आ पहुंची. पेट को एक
हाथ से पकड़े हुए पसीने से तर उसने चूल्हा जलाया, खिचड़ी डाली और दर्द से व्याकुल
होकर वहीं जमीन पर लेट रही. कोई दस बजे रात को गोबर आया, ताड़ी की दुर्गन्ध उड़ाता
हुआ. लटपटाती हुई जबान से ऊटपटांग बक रहा था-मुझे किसी की परवाह नहीं है. जिसे सौ
दफे गरज हो, रहे, नहीं चला जाये. मैं किसी की ताव नहीं सह सकता. अपने मां-बाप का
ताव नहीं सहा, जिसने जन्म दिया, तब दूसरों का ताव क्यों सहूं? जमादार आंखें दिखाता
है.यहां किसी की धौंस सहनेवाले नहीं हैं. लोगों ने पकड़ न लिया होता, तो खून पी
जाता, खून. कल देखूंगा बचा को, फांसी ही तो होगी. दिखा दूंगा कि मरद कैसे मरते हैं.
हंसता हुआ, अकड़ता हुआ, मूंछों पर ताव देता हुआ फांसी के तख्ते पर जाऊं तो सही.
औरत की जात! कितनी बेवफा होती है? खिचड़ी डाल दी और टांगे पसारकर सो रही. कोई खाये
या न खाये, उसकी बला से. आप मजे से फुलके उड़ाती है, मेरे लिए खिचड़ी! सता ले जितना
सताते बने, तुझे भगवान् सतायेंगे, जो न्याय करते हैं.
उसने झुनिया को जगाया नहीं. कुछ बोला भी नहीं. चुपके से खिचड़ी थाली में निकाली और
दो-चार कौर निगलकर बरामदे में लेट रहा. पिछले पहर उसे सर्दी लगी. कोठरी में कम्बल
लेने गया, ति झुनिया के कराहने की आवाज सुनी. नशा उतर चुका था. पूछा-कैसा जी है
झुनिया? कहीं दरद है क्या?
`हां पेट में जोर से दरद हो रहा है.’
`तूने पहले क्यों नहीं कहा? अब इस बखत कहां जाऊं?’
`किससे कहती?’
`मैं क्या मर गया था?’
`तुम्ही मेरे मरने-जीने की क्या चिन्ता!’
गोबर घबराया, कहां दाई खोजने जाये? इस वक्त वह आने ही क्यों लगी? घर में कुछ है भी
तो नहीं. चुड़ेल ने पहले बता दिया होता, तो किसी से दो चार रुपये मांग लाता. इन्हीं
हाथों में सौ-पचास रुपये हरदम पडे रहते थे, चार आदमी खुशामद करते थे. इस कुलच्छनी
के आते ही जैसे लक्ष्मी रूठ गयी. टके-टके को मुहताज हो गया.
सहसा किसी ने पुकारा-यह तुम्हारी घरवाली कराह रही है? दरद तो नहीं हो रहा है?
यह वही मोटी औरत थी, जिससे आज झुनिया की बात हुई थी. वह घोड़े को खिलाने उठी थी
झुनिया का कराहना सुनकर पूछने आ गयी थी.
गोबर ने बरामदे में जाकर कहा-पेट में दर्द है. छटपटा रही है. यहां कोई दाई मिलेगी?
`वह तो मैं आज उसे देखकर ही समझ गयी थी. दाई कच्ची सराय में रहती है. लपककर बुला
लाओ. कहना, जल्दी चल. तब तक मैं यहीं बैठी हूं.’
`मैंने तो कच्ची सराय नहीं देखी, किधर है?’
`अच्छा, तुम उसे पंखा झलते रहो, मैं बुलाये लाती हूं. यही कहते हैं, अनाड़ी आदमी
किसी काम का नहीं. पूरा पेट और दाई की खबर नहीं.’
यह कहती हुई वह चल दी. इसके मुंह पर तो लोग इसे चुहिया कहते हैं, यही इसका नाम था,
लेकिन पीठ पीछे मोटल्ली कहा करते थे. किसी को मोटल्ली कहते सुन लेती थी, तो ,उसके
सात पुरखों तक चढ़ जाती थी.
गोबर को बैठे दस मिनट भी न हुए होंगे कि वह लौट आयी और बोली-अब संसार में गरीबों का
कैसे निबाह होगा? रांड कहती है, पांच रुपये लूंगी, तब चलूंगी. और आठ आने रोज. बारह
वें दिन एक साड़ी. मैने कहा, तेरा मुंह झुलस दूं. तू जा चूल्हे में. मैं देख लूंगी.
बारह बच्चों की मां यों ही नहीं हो गयी हूं.
तुम बाहर आ जाओ गोबरधन, मैं सब कर लूंगी. बखत पड़ने पर आदमी ही आदमी के काम आता है.
चार बच्चे जना लिये, तो दाई बन बैठी.
वह झुनिया के पास जा बैठी और उसका सिर अपनी जांग पर रखकर उसका पेट सहलाती हुई बोली-
मैं तो आज तुझे देखते ही समझ गयी थी. सच पूछो, तो इसी धड़ाके में आज मुझे नींद
नहीं आयी. यहां तेरा कौन सगा बैठा है?
झुनिया ने दर्द से दांत जमाकर `सी’ करते हुए कहा- अब न बचूंगी दीदी. हाय! मैं तो
भगवान् से मांगने न गयी थी. एक को पाला-पोसा उसे छीन लिया, तो फिर इसका कौन काम था?
मैं मर जाऊं माता, तो तुम बच्चे पर दया करना. उसे पाल-पोस लेना. भगवान् तुम्हारा
भला करेंगे.
चुहिया स्नेह से उसके केश सुलझाती हुई बोली-धीरज धर बेटी, धीरज धर. अभी छन-भर में
कष्ट कटा जाता है. तूने भी तो जैसे चुप्पी साध ली थी. इसमें किस बात की लाज? मुझे
बता दिया होता, तो मैं मौलवी साहब के पास से ताबीज ला देती. वही मिर्जाजी जो इस
हाते में रहते हैं.
इसके बाद झुनिया को कुछ होश न रहा. नौ बजे उसे होश आया, तो उसने देखा, चुहिया शिशु
को लिये बैठी है और वह साफ साड़ी पहने लेटी हुई है. ऐसी कमजोरी थी मानों देह में
रक्त का नाम न हो.
चुहिया रोज सबेरे आकर झुनिया के लिए हरीरा और हलवा पका जाती और दिन में भी कई
बार आकर बच्चे को उबटन मल जाती और ऊपर का दूध पिला जाती. आज चौथा दिन था पर
झुनिया के स्तनों में दूध न उतरा था. शिशु रो-रोकर गला फाड़े लेता था, क्योंकि ऊपर
का दूध उसे पचता न था. एक छन को भी चुप न होता था. चुहिया अपना स्तन उसके मुंह में
देती. बच्चा क्षण चूसता, पर जब दूध न निकलता, तो फिर चीखने लगता. जब चौथे दिन सांझ
तक भी झुनिया के दूध न उतरा, तो चुहिया घबरायी. बच्चा सूखता चला जाता था. नखास पर
एक पेंशनर डाक्टर रहते थे. चुहिया उन्हें ले आयी. डाक्टर ने देख-भाल कर कहा-इसकी
देह में खून है ही नहीं, दूध कहां से आये? समस्या जटिल हो गई. देह में खून लाने के
लिए महीनों दवा-दारू करनी पड़ेगी, तब कहीं दूध उतरेगा. तब तक तो इस मांस के लोथड़े
का ही काम खतम हो जायेगा. पहर रात हो गयी. गोबर ताड़ी पिये ओसारे में पड़ा था.
चुहिया बच्चे को चुप कराने के लिए उसके मुंह में अपनी छाती डाले हुए थी कि सहसा उसे
ऐसा मालूम हुआ कि उसकी छाती में दूध आ गया है. प्रसन्न होकर बोली-ले झुनिया अब तेरा
बच्चा जी जायेगा, मेरे दूध आ गया.
झुनिया ने चकित होकर कहा-तुम्हें दूध आ गया?
`नहीं री, सच!’
मैं तो नहीं पतियाती!’
`देख ले!’
उसने अपना स्तन दबाकर दिखाया. दूध की धार फूट निकली.
झुनिया ने पूछा-तुम्हारी छोटी बिटिया तो आठ साल से कम की नहीं.
`हां, आठवां हैं, लेकिन मुझे दूध बहुत होता था.’
`इधर तो तुम्हें बाल-बच्चा नहीं हुआ.’
`वही लड़की पेट-पोछनी थी.छाती बिलकुल सूख गयी थी, लेकिन भगवान् की लीला है,और क्या!
अब से चुहिया चार-पांच बार आकर बच्चे को दूध पिला जाती. बच्चा पैदा तो हुआ था
दुर्बल, लेकिन चुहिया का स्वस्थ दूध पीकर गदराया जाता था. एक दिन चुहिया नदी स्नान
करने चली गयी. बच्चा भूख के मारे छटपटाने लगा. चुहिया दस बजे लौटी, तो झुनिया बच्चे
को कन्धे से लगाये झुला रही थी और बच्चा रोये जाता था.चुहिया ने बच्चे को उसकी गोद
से लेकर दूध पिला देना चाहा, 217
पर झुनिया ने उसे झिड़ककर कहा-रहने दो. अभागा मर जाये, वही अच्छा किसी का
एहसान तो न लेना पड़े. चुहिया गिड़गिड़ाने लगी. झुनिया ने बड़े अदरावन के साथ बच्चा
उसकी गोद में दे दिया.
लेकिन झुनिया और गोबर में अब भी न पटती थी. झुनिया के मन में बैठ गया कि यह पक्का
मतलबी बेदर्द आदमी है, मुझे केवल भोग की वस्तु समझता है. चाहे मैं मरूं या जिऊं, उस
की इच्छा पूरी किये जाऊं, उसे बिलकुल गम नहीं. सोचता होगा, यह मर जायेगी, तो दूसरी
लाऊंगा, लेकिन मुंह धो रखें बच्चू. मैं ही ऐसी अल्हड़ थी कि तुम्हारे फन्दे में आ
गयी. तब तो पैरों पर सिर रखे देता था. यहां आते ही न जाने क्यों जैसे इसका मिजाज ही
बदल गया. जाड़ा आ गया था, पर न ओढ़न, न बिछावन. रोटी-दाल से जो दो-चार रुपये
बचते, ताड़ी में उड़ जाते थे. एक पुराना लिहाफ था. दोनों उसी में सोते थे, लेकिन
फिर भी उनमें सौ कोस का अन्तर था. दोनों एक ही करवट में रात काट देते.
गोबर का जी शिशु को गोद में लेकर खिलाने के लिए तरसकर रह जाता था. कभी-कभी वह रात
को उठाकर उसका प्यारा मुखड़ा देख लिया करता था, लेकिन झुनिया की ओर से उसका मन
खिंचता था. झुनिया भी उससे बात न करती, न उसकी कुछ सेवा ही करती और दोनों के बीच
में यह मालिन्य समय के साथ लोहे को मोर्चे की भांति गहरा, दृढ़ और कठोर होता जाता
था. दोनों एक-दूसरे की बातों का उलटा ही अर्थ निकालते, वही जिससे आपस का द्वेष और
भड़के. और कई दिनों तक-एक वाक्य को मन में पाले रहते और उसे अपना रक्त पिला-पिलाकर
एक-दूसरे पर झपट पड़ने के लिए तैयार करते रहते, जैसे शिकारी कुत्ते हों.
उधर गोबर के कारखाने में भी आये दिन एक-न-एक हंगामा उठता रहता था. अबकी बजट में
शक्कर पर ड्यूटी लगी थी. मिल के मालिकों को मजूरी घटाने का अच्छा बहाना मिल गया.
ड्यूटी से अगर पांच की हानि थी, तो मजूरी घटा देने से दस का लाभ था. इधर महीनों से
इस मिल में भी यही मसला छिड़ा हुआ था.मजूरों का संघ हड़ताल करने को तैयार बैठा हुआ
था. इधर मजूरी घटी और उधर हड़ताल हुई. उसे मजूरी में धेले की कटौती भी
स्वीकार न थी. जब इस तेजी के दिनों में मजूरी में एक धेले की भी बढ़ती नहीं हुई, तो
अब वह घाटे में क्यों साथ दें.
मिर्जा खुर्शेद संघ के सभापति और पण्डित ओंकारनाथ, `बिजली’सम्पादक, मंत्री थे.
दोनों ऐसी हड़ताल कराने पर तुले हुए थे कि मिल मालिकों को कुछ दिन याद रहे. मजदूरों
को भी हड़ताल से क्षति पहुंचेगी, यहां तक कि हजारों आदमी रोटियों को भी मोहताज हो
जायेंगे , इस पहलू की ओर उनकी निगाह बिलकुल न थी. और गोबर हड़तालियों में सबसे आगे
था. उद्दण्ड स्वभाव का था ही, ललकारने की जरूरत थी.फिर वह मारने-मरने को न डरता था.
एक दिन झुनिया ने उसे जी कड़ा करके समझाया भी- तुम बाल-बच्चे वाले आदमी हो,
तुम्हारा इस तरह आग में कूदना अच्छा नहीं. इस पर गोबर बिगड़ उठा-तू कौन होती है
मेरे बीच में बोलने वाली? मैं तुझसे सलाह नहीं पूछता. बात बढ़ गयी और गोबर ने
झुनिया को खूब पीटा. चुहिया ने आकर झुनिया को छुड़ाया और गोबर को डांटने लगी. गोबर
के सिर पर शैतान सवार था. लाल-लाल आंखें निकालकर बोला-तुम मेरे घर में मत आया करो
चुहिया, तुम्हारे आने का कुछ काम नहीं. चुहिया ने व्यंग के साथ कहा-तुम्हारे घर में
न जाऊंगी, तो मेरी रोटियां कैसे चलेंगी? यहीं से मांग-जांचकर ले जाती हूं, तब तवा
गरम होता है.मैं न होती लाला,तो यह बीबी आज तुम्हारी लातें खाने के लिए बैठी न होती
गोबर घूंसा तानकर बोला-मैंने कह दिया, मेरे घर में न आया करो. तुम्हीं ने इस चुड़ैल
का मिजाज आसमान पर चढ़ा दिया है.
चुहिया वहीं डटी हुई निःशंक खड़ी थी, वह बोली-अच्छा, अब चुप रहना गोबर. बेचारी

अधमरी लड़कोरी औरत को मारकर तुमने कोई बड़ी जवांमर्दी का काम नहीं किया है. तुम
उसके लिए क्या करते हो कि तुम्हारी मार सहे? एक रोटी खिला देते हो इसलिए? अपने भाग
बखानो कि ऐसी गऊ औरत पा गये हो. दूसरी होती, तो तुम्हारे मुंह में झाड़ू मारकर निकल
गयी होती.
मुहल्ले के लोग जमा हो गये और चारों ओर से गोबर पर फटकारें पड़ने लगीं. वही लोग, जो
अपने घरों में अपनी स्त्रियों को रोज पीटते थे, इस वक्त न्याय और दया के पुतले बने
हुए थे. चुहिया और शेर हो गयी और फरियाद करने लगी. दाढ़ीजार कहता है, मेरे घर न आया
करो. बीबी-बच्चा रखनेवाला है, यह नहीं जानता कि बीबी-बच्चों का पालना बड़े गुर्दे
का काम है. इससे पूछो, मैं न होती, तो आज यह बच्चा, जो ,बछड़ै की तरह कुलेंले कर
रहा है, कहां होता? औरत को मारकर जवानी दिखाता है. मैं न हुई तेरी बीबी, नहीं यही
जूती उठाकर मुंह पर तड़ातड़ जमाती और कोठरी में ढकेलकर बाहर से किवाड़ बन्द कर
देती. दाने को तरस जाते.
गोबर झल्लाया हुआ अपने काम पर चला गया. चुहिया औरत न होकर मर्द होती, तो मजा चखा
देता. औरत के मुंह क्या लगे.
मिल में असन्तोष के बादल घने होते जा रहे थे. मजदूर`बिजली’ की प्रतियां जेब में
लिये फिरते और जरा भी अवकाश पाते, तो दो तीन मजदूर मिलकर उसे पढ़ने लगते. पत्र की
बिक्री खूब बढ़ रही थी. मजदूरों के नेता`बिजली’ कार्यालय में आधी रात तक बैठे
हड़ताल की स्कीमें बनाया करते और प्रातःकाल जब पत्र में यह समाचार मोटे-मोटे
अक्षरों में छपता, तो जनता टूट पड़ती और पत्र की कापियां दूने-तिगुने दाम पर बिक
जातीं.
उधर कम्पनी के डायरेक्टर भी अपनी घात में बैठे हुए थे. हड़ताल हो जाने में ही उनका
हित था. आदमियों की कमी तो है ही नहीं. बेकारी बढ़ी हुई है, इसके आधे वेतन पर ऐसे
ही आदमी आसानी से मिल सकते हैं. माल की तैयारी में एकदम आधी बचत हो जायेगी. दस-पांच
दिन काम का हरज होगा, कुछ परवाह नहीं. आखिर यही निश्चय हो गया कि मजूरी में कमी का
ऐलान कर दिया जाये. दिन और समय नियत कर दिया गया, पुलिस को सूचना दे दी गयी.मजदूरों
को कानोंकान खबर न थी. वे अपनी घात में थे. उसी वक्त हड़ताल करना चाहते थे, जब
गोदाम में बहुत थोड़ा माल रह जाये और मांग की तेजी हो.
एकाएक एक दिन जब मजदूर लोग शाम को छुट्टी पाकर चलने लगे, तो डायरेक्टरों का
ऐलान सुना दिया गया.उसी वक्त पुलिस आ गयी. मजदूरों को अपनी इच्छा के विरुद्ध उसी
वक्त हड़ताल करनी पड़ी, जब गोदाम में इतना माल भरा हुआ था कि बहुत तेज मांग होने पर
भी छह-महीने से पहले न उठ सकता था.
मिर्जा खुर्शेद ने यह खबर सुनी, तो मुस्कराये, जैसे कोई मनस्वी योद्धा अपने शत्रु
के रणकौशल पर मुग्ध हो गया हो. एक क्षण विचारों में डूबे रहने के बाद बोले-अच्छी
बात है. अगर डायरेक्टरों की यही इच्छा है, तो यही सही. हालतें उनके मुआफिक हैं,
लेकिन हमें न्याय का बल है. वह लोग नये आदमी रखकर अपना काम चलाना चाहते हैं.
हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि उन्हें एक भी नया आदमी न मिले. यही हमारी फतह होगी.
`बिजली’ कार्यालय में उसी वक्त खतरे की मीटिंग हुई, कार्यकारिणी समिति का भी संगठन
हुआ, पदाधिकारियों का चुनाव हुआ और आठ बजे रात को मजदूरों का लम्बा जुलूस निकला. दस
बजे रात को कल का सारा प्रोग्राम तय किया गया और यह ताकीद कर दी गयी कि किसी तरह का
दंगा-फसाद न होने पाये.
मगर सारी कोशीश बेकार हुई. हड़तालियों ने मजदूरों का टिड्डी-दल मिल के द्वार पर
खड़ा देखा, तो इनकी हिंसा-वृत्ति काबू के बाहर हो गयी. सोचा था, सौ-सौ, पचास-पचास
आदमी रोज भर्ती के लिए आयेंगे. उन्हें समझा-बुझाकर या धमकाकर भगा देंगे. हड़तालियों 219

की संख्या देखकर नये लोग आप ही भयभीत हो जायेंगे, मगर यहां तो नक्शा ही कुछ और था.
अगर यह सारे आदमी भर्ती हो गये, तो हड़तालियों के लिए समझौते की कोई आशा ही न थी.
तय हुआ कि नये आदमियों को मिल में जाने ही न दिया जाये. बल-प्रयोग के सिवा और कोई
उपाय न था. नया दल भी लड़ने मरने को तैयार था. उनमें अधिकांश ऐसे भुखमरे थे, जो इस
अवसर को किसी तरह भी न छोड़ना चाहते थे. भूखों मर जाने से या अपने बाल-बच्चों को
भूखों मरते देखने से तो यह कहीं अच्छा था कि इस परिस्थिति से लड़कर मरें.दोनों दलों
में फौजदारी हो गई.बिजली सम्पादक तो भाग खड़े हुए, बेचारे मिर्जा जी पिट गये और
उनकी रक्षा करते हुए गोबर भी बुरी तरह घायल हो गया.मिर्जाजी पहलवान आदमी थे और
मंजे हुए फिकैत, अपने ऊपर कोई गहरा वार न पड़ने दिया. गोबर गंवार था.पूरा लट्ठ
मारना जानता था, पर अपनी रक्षा करना न जानता था, जो लड़ाई में मारने ज्यादा महत्व
की बात है. उसके एक हाथ की हड्डी टूट गयी, सिर खुल गया और अन्त में वह वहीं ढेर हो
गया. कन्धों पर अनगिनती लाठियां पड़ी थीं, जिससे उसका एक-एक अंग चूर-चूर हो गया था.
हड़तालियों ने उसे गिरते देखा, तो भाग खड़े हुए. केवल दस-बारह जंचे हुए आदमी मिर्जा
जी को घेरकर खड़े रहे. नये आदमी विजय पताका उड़ाते हुए मिल में दाखिल हुए और पराजित
हड़ताली अपने हताहतों को उठा-उठाकर अस्पताल पहुंचाने लगे, मगर अस्पताल में इतने
आदमियों के लिए जगह न थी. मिर्जाजी तो ले लिये गये, मगर गोबर की मरहम-पट्टी करके
उसके घर पहुंचा दिया गया.
झुनिया ने गोबर की वह चेष्टाहीन लोथ देखी, तो उसका नारीत्व जाग उठा. अब तक उसने उसे
सबल के रूप में देखा था, जो उस पर शासन करता था, डांटता था, मारता था. आज वह अपंग
था, निस्सहाय था, दयनीय था. झुनिया ने खाट पर झुककर आंसू-भरी आंखों से गोबर को देखा
और घर की दशा का खयाल करके उसे गोबर पर एक ईर्ष्यामय क्रोध आया. गोबर जानता था कि
घर में एक पैसा नहीं है. वह यह भी जानता था कि कहीं से एक पैसा मिलने की आशा नहीं
है. यह जानते हुए भी उसके बार-बार समझाने पर भी, उसने यह विपत्ति अपने ऊपर ली. उसने
कितनी बार कहा था-तुम इस झगड़े में न पड़ो. आग लगानेवाले आग लगाकर अलग हो जायेंगे,
जायेगी गरीबों के सिर. लेकिन वह कब उसकी सुनने लगा था? वह तो उसकी बैरिन थी. मित्र
तो वह लोग थे, जो अब मजे से मोटरों में घूम रहें हैं. उस क्रोध में एक प्रकार की
तुष्टि थी, जैसे हम उन बच्चों को कुरसी से गिर पड़ते देखकर, जो बार-बार मना करने पर
खड़े होने से बाज न आते थे, चिल्ला उठते हैं-अच्छा हुआ, बहुत अच्छा, तुम्हारा सिर
क्यों न दो हो गया?
लेकिन एक ही क्षण में गोबर का करुण-क्रन्दन सुनकर उसकी सारी संज्ञा सिहर उठी. व्यथा
में डूबे हुए यह शब्द उसके मुंह से निकले-हाय-हाय! सारी देह भुरकस हो गयी. सबों को
तनिक भी दया न आयी.
वह उसी तरह बड़ी देर तक गोबर का मुंह देखती रही. वह क्षीण होती हुई आशा से जीवन का
कोई लक्षण पा लेना चाहती थी, और प्रतिक्षण उसका धैर्य अस्त होने वाले सूर्य की
भांति डूबता जाता था, और भविष्य का अन्धकार उसे अपने अन्दर समेट लेता था.
सहसा चुहिया ने आकर पुकारा-गोबर का क्या हाल है बहू? मैंने तो अभी सुना,. दुकान से
दौड़ी आयी हूं.
झुनिया के रुके हुए आंसू उबल पड़े, कुछ बोल न सकी भयभीत आंखों से चुहिया की ओर देखा
चुहिया ने गोबर का मुंह देखा, उसकी छाती पर हाथ रखा और आश्वासन भरे स्वर में बोली-
यह चार दिन में अच्छे हो जायेंगे. घबरा मत. कुशल हुई. तेरा सोहाग बलवान था. कई आदमी
उसी दंगे में मर गये. घर में कुछ रुपये-पैसे है?
झुनिया ने लज्जा से सिर हिला दिया.
`मैं लाये देती हूं. धोड़ा-सा दूध लाकर गरम कर ले.’
झुनिया ने उसके पांव पकड़कर कहा-दीदी, तुम्ही मेरी माता हो.मेरा दूसरा कोई नहीं है.
जाड़ों की उदास सन्ध्या आज और भी उदास मालूम हो रही थी. झुनिया ने चूल्हा जलाया और
दूध उबालने लगी. चुहिया बरामदे में बच्चे को लिये खिला रही थी.
सहसा झुनिया भारी कण्ठ से बोली-मैं बड़ी अभागिन हूं दीदी! मेरे मन में ऐसा आ रहा है
जैसे मेरे ही कारन इनकी यह दशा हुई है. जी कुढ़ता है, तब मन दुखी होता ही है, फिर
गालियां भी निकलती हैं, सराप भी निकलता है. कौन जाने मेरी गालियों….
इसके आगे वह कुछ न कह सकी. आवाज आंसुओं के रेले में बह गयी. चुहिया ने अञ्चल से
उसके आंसू पोंछते हुए कहा-कैसी बातें सोचती है बेटी? यह तेरे सिन्दूर का भाग है कि
यह बच गये. मगर हां, इतना है कि आपस में लड़ाई हो, तो मुंह से चाहे जितना बक ले, मन
में कीना न पाले. बीज अन्दर पड़ा, तो अंखुआ निकले बिना नहीं रहता.
झुनिया ने कम्पन-भरे स्वर में पूछा-अब मैं क्या करूं दीदी?
चुहिया ने ढाढ़स दिया-कुछ नहीं बेटी! भगवान् का नाम ले.वही गरीबों की रक्षा करते
हैं. उसी समय गोबर ने आंखें खोली और झुनिया को सामने देखकर याचना भाव से क्षीण-स्वर
में बोला-आज बहुत चोट खा गया झुनिया! मैं किसी से कुछ नहीं बोला. सबों ने अनायास
मुझे मारा. कहा-सुना माफ कर. तुझे सताया था, उसी का फल मिला. थोड़ी देर का और
मेहमान हूं. अब न बचूंगा. मारे दरद के सारी देह फटी जाती है.
चुहिया ने अन्दर आकर कहा-चुपचाप पड़े रहो. बोलो-चालो नहीं. मरोगे नहीं, इसका मेरा
जुम्मा.
गोबर के मुख पर आशा की रेखा झलक पड़ी. बोला-सच कहती हो, मैं मरूंगा नहीं?
`हां, नहीं मरोगे. तुम्हें हुआ क्या है? जरा सिर मैं चोट आ गयी है और हाथ की हड्डी
उतर गयी है. ऐसी चोंटे मरदों को रोज ही लगा करती हैं? इन चोटों से कोई नहीं मरता.’
`अब मैं झुनिया को कभी न मारूंगा.’
`डरते होगे कि कहीं झुनिया तुम्हें न मारे.’
`वह मारेगी भी, तो न बोलूंगी.’
`अच्छे होने पर भूल जाओगे.’
`नहीं दीदी, कभी न भूलूंगा.’
गोबर इस समय बच्चों की सी बातें करता. दस-पांच मिनट अचेत-सा पड़ा रहता. उसका मन
न जाने कहां-कहां उड़ा फिरता. कभी देखता, वह नदी में डूबा जा रहा है, और झुनिया उसे
बचाने के लिए नदी में चली आ रही है. कभी देखता, कोई दैत्य उसकी छाती पर सवार है और
झुनिया की शक्ल की कोई देवी उसकी रक्षा कर रही है. और बार-बार चौंककर पूछता-मैं
मरूंगा तो नहीं झुनिया?
तीन दिन उसकी यही दशा रही और झुनिया को चुहिया संभाले रहती. चौथे दिन झुनिया एक्का
लायी और सबों ने गोबर को उस पर लादकर अस्पताल पहुंचाया. वहां से लौटकर गोबर को
मालूम हुआ कि अब वह सचमुच बच जायेगा. उसने आंखों में आंसू भरकर कहा-मुझे क्षमा कर
दो झुन्ना!
इन तीन-चार दिनों में चुहिया के तीन-चार रुपये खर्च हो गये थे, और अब झुनिया को
उससे कुछ लेते संकोच होता था. वह भी कोई मालदार तो थी नहीं. लकड़ी की बिक्री के
रुपये झुनिया को दे देती. आखिर झुनिया ने कुछ काम करने का विचार किया. अभी गोबर को
अच्छे होने में महीनों लगेंगे. 221
खाने पीने को भी चाहिए, दवा-दारू को भी चाहिए. वह कुछ काम करके खाने-भर को तो ले
ही आयेगी. बचपन से गउओं का पालन और घास छीलना सीखा था. यहां गउएं कहां थी? हां,
वह घास छील सकती थी. मुहल्ले के कितने ही स्त्री-पुरुष बराबर शहर के बाहर घास छीलने
जाते थे और आठ-दस आने कमा लेते थे. वह प्रातःकाल गोबर को हाथ-मुंह धुलाकर और बच्चे
को उसे सौंपकर घास छीलने निकल जाती और तीसरे पहर तक भूखी-प्यासी घास छीलती रहती.
फिर उसे मण्डी मे ले जाकर बेचती और शाम को घर आती.
रात को भी वह गोबर की नींद सोती और गोबर की नींद जागती, मगर इतना कठोर श्रम करने पर
भी उसका मन ऐसा प्रसन्न रहता, मानों झूले पर बैठी गा रही है. रास्ते-भर साथ की
स्त्रियों और पुरुषों से चुहल और विनोद करती जाती. घास छीलते समय भी सबों में हंसी-
दिल्लगी होती रहती. न किस्मत का रोना, न मुसीबत का गिला. जीवन की सार्थकता में,
अपनों के लिए कठिन-से-कठिन त्याग में, और स्वाधीन सेवा में जो उल्लास है, उसकी
ज्योति एक-एक अंग पर चमकती रहती. बच्चा अपने पैरों पर खड़ा होकर जैसे तालियां बजा-
बजाकर खुश होता है, उसी का वह अनुभव कर रही थी, मानो उसके प्राणों में आनन्द का कोई
सोता खुल गया हो! और मन स्वस्थ हो, तो देह कैसे अस्वस्थ रहे? उस एक महीने में जैसे
उसका कायाकल्प हो गया हो. उसके अंगों में अब शिथिलता नहीं चपलता है, लचक है,
सुकुमारता है. मुख पर पीलापन नहीं रहा, खून की गुलाबी चमक है. उसका यौवन जो बन्द
कोठरी में पड़े-पड़े अपमान और कलह से कुण्ठित हो गया था, वह मानों ताजी हवा और
प्रकाश पाकर लहलहा उठा है. अब उसे किसी बात पर क्रोध नहीं आता. बच्चे के जरा-सा
रोने पर जो वह झुंझला उठती थी, अब जैसे उसके धैर्य और प्रेम का अन्त ही न था.
इसके खिलाफ गोबर अच्छा होते जाने पर भी कुछ उदास रहता था जब हम अपने किसी प्रियजन
पर अत्याचार करते हैं, और जब विपत्ति आ पड़ने से हममें इतनी शक्ति आ जाती है कि
उसकी तीव्र व्यथा का अनुभव करें ,अभिमान की जगह नम्रता. उसे अब ज्ञात हुआ कि सेवा
करने का अवसर बड़े सौभाग्य से मिलता है, और वह इस अवसर को कभी न भूलेगा.

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