245. राग श्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग श्री

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जयति नँदलाल जय जयति गोपाल,

जय जयति ब्रजबाल-आनंदकारी ।
कृष्न कमनीय मुखकमल राजितसुरभि,
मुरलिका-मधुर-धुनि बन-बिहारी ॥
स्याम घन दिव्य तन पीत पट दामिनी,
इंद्र-धनु मोर कौ मुकुट सोहै ।
सुभग उर माल मनि कंठ चंदन अंग ,
हास्य ईषद जु त्रैलोक्य मोहै ॥
सुरभि-मंडल मध्य भुज सखा-अंस दियैं,
त्रिभँगि सुंदर लाल अति बिराजै ।
बिस्वपूरनकाम कमल-लोचन खरे,
देखि सोभा काम कोटि कोटि लाजै ॥
स्रवन कुंडल लोल, मधुर मोहन बोल,
बेनु-धुनि सुनि सखनि चित्त मोदे ।
कलप-तरुबर-मूल सुभग जमुना-कूल,
करत क्रीड़ा-रंग सुख बिनोदै ॥
देव, किंनर, सिद्ध, सेस, सुक, सनक,सिब,

देखि बिधि , ब्यास मुनि सुजस गायौ ।

सूर गोपाललाल सोई सुख-निधि नाथ,
आपुनौ जानि कै सरन आयौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्री नन्दलालकी जय हो! गोपालकी जय हो! जय हो ! व्रजके गोपकुमारोंको आनन्द देनेवाले
प्रभु की बार-बार जय हो! श्रीकृष्णचन्द्रके सुन्दर मुखमें कमलकी सुगन्ध शोभा देति
है और वंशीकी मधुर धवनि करते हुए वे वृन्दावनमें क्रीड़ा करते हैं । मेघके समान
श्याम शरीर है, उसपर विद्युत के समान पीताम्बर है और इन्द्रधनुषके समान मयूरपिच्छ
का मुकुट शोभा देता है । सुन्दर वक्षःस्थलपर वनमाला है, कण्ठमें कौस्तुभमणि है,
अंगोंमें चन्दन लगा है; मन्द हास्य ऐसा है, जो त्रिलोकीकी को मोहित करता है ।
गायोंके झुण्डके बीचमें सखाके कंधेपर भुजा रखे त्रिभंगी से खड़े सुन्दर गोपाललाल
अत्यन्त शोभा दे रहे हैं । विश्वकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले उनके नेत्र पूर्ण विक
सित कमलके समान हैं, (मोहनकी) शोभा देखकर करोड़ों कामदेव लज्जित हो रहे हैं ।
कानोंमें चञ्चल कुण्डल हैं, मोहनकी मधुर वाणी एवं वंशीकी ध्वनि सखाओंका चित्त
आनन्दित हो रहा है । मनोहर यमुना-किनारे उत्तम कल्पवृक्षोंके नीचे खेलकी उमंगमें
सुखपूर्वक विनोद-क्रीड़ा कर रहे हैं । देवता, किन्नर, सिद्ध,शेष, शुकदेव-सनकादिक
ऋषि, शंकरजी तथा ब्रह्मा यह छटा देख रहे हैं; व्यासमुनिने उनके सुयशका गान (वर्णन)
किया है । उन्हीं सुखके निधान गोपालको अपना स्वामी समझकर सूरदास उनकी शरणमें
आया है ।

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