244. राग सोरठ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सोरठ

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(तेरैं) भुजनि बहुत बल होइ कन्हैया ।
बार-बार भुज देखि तनक-से, कहति जसोदा मैया ॥
स्याम कहत नहिं भुजा पिरानी, ग्वालनि कियौ सहैया ।
लकुटिनि टेकि सबनि मिलि राख्यौ, अरु बाबा नँदरैया ॥
मोसौं क्यौं रहतौ गोबरधन, अतिहिं बड़ौ वह भारी ।
सूर स्याम यह कहि परबोध्यौ चकित देखि महतारी ॥

मैया यशोदाजी बार-बार छोटी सी भुजा देककर कहती हैं-‘कन्हाई! तेरी भुजामें बहुत
बल हो ।’ श्यामसुन्दर कहते हैं-‘गोपोंने (पर्वत उठानेमें मेरी सहायता की, इससे मेरा
हाथ दुखा नहीं । सबने और नन्द बाबाने भी मिलकर लाठियोंके सहारे उसे रोक रखा ।
नहीं तो भला, वह गोवर्धन मुझसे कैसे रोके रुकता, वह तो बड़ा और भारी है ।’ सूरदासजी
कहते हैं कि माताको चकित देखकर श्यामसुन्दरने यह कहकर आश्वासन दिया ।

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