238. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

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देखौ री नँद-नंदन आवत ।
बृंदाबन तैं धेनु-बृंद मैं बेनु अधर धरें गावत ।
तन घनस्याम कमल-दल-लोचन अंग-अंग छबि पावत ।
कारी-गोरी, धौरी-धूमरि लै- लै नाम बुलावत ॥
बाल गोपाल संग सब सोभित मिलि कर-पत्र बजावत ।
सूरदास मुख निरखतहीं सुख गोपी-प्रेम बढ़ावत ॥
(गोपियाँ कहती हैं-) ‘सखी , देखो ! नन्दनन्दन आ रहे हैं । वृन्दावनसे लौटते हुए
गायोंके झुण्डमें ओष्ठ पर वंशी धरे वे गा रहे हैं । मेघके समान श्याम शरीर है, कमल
दल के समान नेत्र हैं, प्रत्येक अंग अत्यन्त शोभा दे रहा है । ‘काली ! लाल धौरी !
धूमरी !(कृष्णा! गौरी! कपिला! धूम्रा)’ इस प्रकार नाम ले-लेकर गायोंको बुलाते हैं ।
सब गोपबालक साथमें शोभित हैं,

मिलकर (एक स्वर एवं लयसे) तालियाँ और पत्तोंके बाजे बजाते हैं । सूरदासजी कहते हैं
कि इनका तो मुख देखनेसे ही आनन्द होता है, ये गोपियोंके प्रेमको बढ़ा रहे हैं ।

[327]

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रजनी-मुख बन तैं बने आवत, भावति मंद गयंद की लटकनि ।
बालक-बृंद बिनोद हँसावत करतल लकुटधेनु की हटकनि ॥
बिगसित गोपी मनौ कुमुद सर, रूप-सुधा लोचन-पुट घटकनि ।
पूरन कला उदित मनु उड़पति, तिहिं छन बिरह-तिमिर की झटकनि ॥
लज्जित मनमथ निरखी बिमल छबि, रसिक रंग भौंहनि की मटकनि ।
मोहनलाल, छबीलौ गिरिधर, सूरदास बलि नागर-नटकनि ॥
संध्याके समय श्याम वनसे सजे हुए आ रहे हैं , उनका गजराजके समान झूमते हुए
मन्दगतिसे चलना चित्तको बड़ा रुचिकर लगता है । बालकोंका समूह उन्हें अपने विनोदसे

हँसाता चलता है, हाथोंमें गायोंको रोकने (हाँकने) की छड़ी है । गोपियोंका मनरूपी-
पुष्प इनके रूप-सुधाके सरोवरमें प्रफुल्लित होता है और नेत्रोंरूपी दोनोंसे वे उस
रूप-सुधाका पान करती हैं । मानों चन्द्रमा अपनी पूर्णकलाओंके साथ उदित हो गये हैं
और उसी क्षण विरहरूपी अन्धकार (वहाँसे) भाग छूटा है । कामदेव भी यह निर्मल शोभा
देखकर लज्जित हो गया है; भौंहोंका चलाना तो रसिकोंके लिये आनन्ददायक है । सूरदासजी
कहते हैं- ये मोहनलाल गिरधारी तो परम छबीले हैं, इन नटनागरके नृत्यपर मैं बलिहारी
हूँ ।

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