237. राग कान्हरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कान्हरौ

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अब कैं राखि लेहु गोपाल ।
दसहूँ दिसा दुसह दावागिनि, उपजी है इहिं काल ॥
पटकत बाँस काँस-कुस चटकत, टकत ताल-तमाल ।
उचटत अति अंगार, फुटत फर, झपटत लपट कराल ॥

धूम-धूँधि बाढ़ी धर-अंबर, चमकत बिच-बिच ज्वाल ।
हरिन बराह, मोर चातक, पक, जरत जीव बेहाल ॥
जनि जिय डरहु, नैन मूँदहु सब, हँसि बोले नँदलाल ।
सूर अगिनि सब बदन समानी, अभय किए ब्रज-बाल ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपबालक कहते हैं -) ‘गोपाल! इस बार रक्षा कर लो । इस समय दसों दिशाओंमें
असह्य दावाग्नि प्रकट हो गयी है । बाँस पटापट शब्द करते फट रहे हैं, जलते कुश एवं
काशसे चटचटाहट हो रही है, ताल और तमालके (बड़े) वृक्ष भी (जलकर) गिर रहे हैं ।
बहुत अधिक चिनगारियाँ उछल रही हैं, फलफूट रहे हैं और दारुण लपटें फैल रही हैं ।
धुएँका अन्धकार पृथ्वीसे आकाशतक बढ़ गया है, उसके बीच-बीचमें ज्वाला चमक रही है ।
हरिन, सूअर, मोर, पपीहे, कोयल आदि जीव बड़ी दुर्दशाके साथ भस्म हो रहे हैं ।’
(यह सुनकर) श्रीनन्दलाल हँसकर बोले–‘अपने चित्तमें डरो मत ! सब लोग नेत्र बंद कर
लो।’सूरदासजी कहते हैं कि सब अग्नि मेरे प्रभुके मुखमें प्रविष्ट हो गयी, उन्होंने
व्रजके बालकोंको निर्भय कर दिया ।

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