231. राग कल्याण – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कल्याण

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ये दोऊ मेरे गाइ-चरैया ।
मोल बिसाहि लियौ मैं तुम कौं, जब दोउ रहे नन्हैया ॥
तुम सौं टहल करावति निसि-दिन, और न टहल करैया ।
यह सुनि स्याम हँसे कहि दाऊ, झूठ कहति है मैया ॥
जानि परत नहिं साँच झुठाई, चारत धेनु झुरैया ।
सूरदास जसुदा मैं चेरी कहि-कहि लेति बलैया ॥

भावार्थ / अर्थ :– (मैया यशोदा विनोदमें कहती हैं -)’ दोनों मेरी गायें चरानेवाले हैं ।
तुम दोनों जब बहुत छोटे थे, तभी मैंने तुमको दाम देकर खरीद लिया था । इसीलिये तो
तुम दोनोंसे रात-दिन सेवा कराती हूँ, मेरे यहाँ दूसरा कोई सेवा करनेवाला है कहाँ।’
यह सुनकर श्यामसुन्दर यह कहते हुए हँस पड़े -‘ दाऊ दादा! मैया झूठ बोल रही है ।’

सूरदासजी कहते हैं, यशोदाजी बोलीं -सच और झूठ ही (तुम्हें) समझ नहीं पड़ती; देखो
तो गायें चरवाते- चरवाते तुम दोनोंको मैंने सुखा डाला; (किंतु सच तो यह है कि) मैं
ही तुम्हारी सेविका हूँ । यह कह-कहकर बलैया लेती हैं ।

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