229. राग आसावरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग आसावरी

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सुनि मैया, मैं तौ पय पीवौं, मोहि अधिक रुचि आवै री ।
आजु सबारैं धेनु दुही मैं, वहै दूध मोहि प्यावै री ॥
और धेनु कौ दूध न पीवौं, जो करि कोटि बनावै री ।
जननी कहति दूध धौरी कौ, पुनि-पुनि सौंह करावै री ॥
तुम तैं मोहि और को प्यारौ, बारंबार मनावै री ।
सूर स्यामकौं पय धौरी कौ माता हित सौं ल्यावै री ॥

भावार्थ / अर्थ :– (मोहन बोले-) मैया ! सुन, मैं तभी दूध पीऊँगा और तभी वह मुझे अत्यन्त
रुचिकर लगेगा, जब आज सबेरे मैने जो गाय दुही थी, उसीका दूध यदि तू मुझे पिलाये ।
चाहे तू करोड़ों उपाय करके बनाये (दूधको गाढ़ा मीठा आदि करे) तो भी दूसरी गायका दूध
नहीं पीऊँगा ।’ माता कहती हैं- यह उसी धवलाका दूध है, (इतने पर भी मानते नहीं )
बार-बार शपथ करवाते हैं । माता बार-बार (यह कहकर) मनाती हैं -‘ मुझे तुमसे अधिक
प्यारा और कौन है (जिसे देनेके लिये धवलाका दूध रखूँगी) ।’ सूरदासजी कहते हैं कि
माता श्यामसुन्दरके लिये बड़े प्रेमसे धवला गायका दूध लाती हैं ।

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