218. राग ललित – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग ललित

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उठे नंद-लाल सुनत सुनत जननी मुख बानी ।
आलस भरे नैन, सकल सोभा की खानी ॥
गोपी जन बिथकित ह्वै चितवतिं सब ठाढ़ी ।
नैन करि चकोर, चंद-बदन प्रीति बाढ़ी ॥
माता जल झारी ले, कमल-मुख पखार््यौ ।
नैन नीर परस करत आलसहि बिसार््यौ ॥
सखा द्वार ठाढ़े सब, टेरत हैं बन कौं ।
जमुना-तट चलौ कान्ह, चारन गोधन कौं ॥
सखा सहित जेंवहु, मैं भोजन कछु कीन्हौ ।
सूर स्याम हलधर सँग सखा बोलि लीन्हौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– माताके मुखके शब्द सुनकर श्रीनन्दलाल उठ गये (जाग गये) समस्त
शोभा के निर्झर उनके नेत्र आलस्यपूर्ण थे । सब गोपियाँ उस (मुख) को देकती हुई मुग्ध
खड़ी रह गयीं । अपने नेत्रोंको उन्होंने चकोर बना लिया, जिनका प्रेम (मोहनके)
चन्द्रमुखसे बड़ता ही जाथा था । जलकी झारी लेकर माताने कमलमुखको धोया, नेत्रों
से जलका स्पर्श होनेसे आलस्य भूल गया (दूर हो गया ) सब सखा द्वारपर खड़े वनमें
चलनेके लिये पुकार रहे हैं – ‘कन्हाई ! गायें चराने यमुना-किनारे चलो।’ सूरदासजी
कहते हैं–श्यामसुन्दरने बलरामजी के साथ सब सखाओंको बुला लिया (और बड़े भाईसे
बोले-) ‘दादा ! तुम सखाओंके साथ कलेऊ करो, मैंने कुछ भोजन कर लिया है ।’

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