217. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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लालहि जगाइ बलि गई माता ।
निरखि मुख-चंद-छबि, मुदित भइ मनहिं-मन ,
कहत आधैं बचन भयौ प्राता ।
नैन अलसात अति, बार-बार जमुहात ,
कंठ लगि जात, हरषात गाता ।
बदन पोंछियौ जल जमुन सौं धौइ कै,
कह्यौ मुसुकाइ, कछु खाहु ताता ॥
दूध औट्यौ आनि, अधिक मिसिरी सानि ,
लेहु माखन पानि प्रान-दाता ।
सूर-प्रभु कियौ भोजन बिबिध भाँति सौं,
पियौ पय मोद करि घूँट साता ॥

भावार्थ / अर्थ :– अपने लालको जगाकर माता उसपर न्योछावर हो गयी । उस चन्द्रमुखकी
शोभा देखकर मन-ही-मन आनन्दित हुई । (श्याम) आधी (अस्पष्ट) वाणीमें कहते हैं-
‘सबेरा हो गया?’ नेत्र अधिक आलस्यभरे हैं, बार-बार जम्हाई लेते हैं, । माता के गले
लिपट जाते हैं, इससे उसका शरीर हर्षित (पुलकित) हो रहा है । यमुना-जल से
धोकर मुख पोंछ दिया और मुसकराकर (मैया) बोली–‘लाल! कुछ खा लो । मेरे प्राणदाता!
औटाया (गाढ़ाकिया) दूध लायी हूँ, उसमें खूब अधिक मिश्री मिलायी है; (और) यह मक्खन
(अपने) हाथपर ले लो ।’ सूरदासजी के स्वामीने अनेक प्रकार से भोजन किया और हर्षित
होकर (केवल) सात घूँट दूध पिया ।

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