216. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

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नंद महर के भावते, जागौ मेरे बारे ।
प्रात भयौ उठि देखिऐ, रबि-किरनि उज्यारे ॥
ग्वाल-बाल सब टेरहीं, गैया बन चारन ।
लाल! उठौ मुख धीइऐ, लागी बदन उघारन ॥
मुख तैं पट न्यारौ कियौ, माता कर अपनैं ।
देखि बदन चकित भई, सौंतुष की सपनैं ॥
कहा कहौं वा रूप की, को बरनि बतावै ।
सूर स्याम के गुन अगम, नंद-सुवन कहावै ॥

भावार्थ / अर्थ :– (दूसरे दिन माता जगा रही हैं -) ‘व्रजराज नन्द के लाड़ले, मेरे लाल!
जागो, उठकर देखो तो सबेरा हो गया, सूर्यकिरणोंका प्रकाश फैल गया । सब गोपबालक
वनमें गायें चरानेके लिए पुकार रहे हैं । लाल उठो, मुख धो लो।’ (यह कहकर) माता मुख
खोलने लगी । माताने अपने हाथसे मुखसे वस्त्र अलग कर दिया । (मोहनका) मुख देखकर
वे चकित हो गयीं, वे सम्मुख ही (आनन्दसे) सो रहे थे । उस रूप (शोभा) को क्या कहूँ-

कौन वर्णन करके उसे बतला सकता है । सूरदासजी कहते हैं कि ये श्यामसुन्दर नन्द-पुत्र
कहलाते हैं;किंतु इनके गुण अगम्य हैं (उन्हें जाना नहीं जा सकता )।

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