214. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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बोलि लियौ बलरामहि जसुमति ।
लाल सुनौ हरि के गुन , काल्हिहि तैं लँगरई करत अति ॥

स्यामहि जान देहि मेरैं सँग, तू काहैं डर मानति ।
मैं अपने ढिग तैं नहिं टारौं, जियहिं प्रतीति न आनति ॥
हँसी महरि बल की बतियाँ सुनि, बलिहारी या मुख की ।
जाहु लिवाइ सूर के प्रभु कौं, कहति बीर के रुख की ॥
यशोदाजीने बलरामको बुला लिया (और बोलीं-) ‘लाल! तुम इस श्यामके गुण तो सुनो,
कलसे ही यह अत्यन्त चपलता कर रहा है ।’ (बलराम बोले-) ‘श्यामको मेरे साथ जाने
दो, तुम भय क्यों करती हो । अपने मनमें विश्वास क्यों नहीं करती – मैं अपने पाससे
इसे तनिक भी हटने नहीं दूँगा ।’ व्रजरानी बलरामजीकी बातें सुनकर हँस पड़ी (और
बोलीं-)’इसमुखकी बलिहारी, अच्छा इसे लिवा जाओ।’ सूरदासजी कहते हैं कि इस
प्रकार (मैयाने) भाई (श्रीकृष्ण) के मनकी बात कह दी ।

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