211. राग केदारौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग केदारौ

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बहुतै दुख हरि सोइ गयौ री ।
साँझहि तैं लाग्यौ इहि बातहिं, क्रम-क्रम बोधि लयौरी ॥
एक दिवस गयौ गाइ चरावन, ग्वालनि संग सबारै ।
अब तौ सोइ रह्यौ है कहि कै, प्रातहि कहा बिचारै ॥
यह तौ सब बलरामहिं लागै, सँग लै गयौ लिवाइ ।
सूर नंद यह कहत महरि सौं, आवन दै फिरि धाइ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (व्रजरानी कहती हैं-) ‘सखी ! श्याम बहुत दुःखी होकर सो गया । सायंकाल
से ही इसी चर्चा में (गायें चरानेकी धुनमें ) लगा था, किसी प्रकार धीरे-धीरे मैं
समझा सकी । एक दिन सबेरे ही ग्वालबालकोंके साथ गाय चरानेचला गया । सो अब तो
(कल जानेको) कहकर सो रहा है, पता नहीं सबेरे क्या सोचेगा (कैसी हठ ठानेगा) सब
तो बलरामसे स्पर्द्धा करते हैं, वही इसे (भी) अपने साथ ले गया था ।’ सूरदासजी कहते
हैं कि श्रीनन्दजी (यह सुनकर) व्रजरानी से कहने लगे – ‘उसे दौड़-घूम आने दो ।’

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