209. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

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बन में आवत धेनु चराए ।
संध्या समय साँवरे मुख पर, गो-पद-रजि लपटाए ॥
बरह-मुकुट कैं निकट लसति लट, मधुप मनौ रुचि पाए ।
बिलसत सुधा जलज-आनन पर उड़त न जात उड़ाए ।
बिधि-बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए ॥
एक बरन बपु नहिं बड़-छोटे, ग्वाल बने इक धाए ।
सूरदास बलि लीला प्रभु की, जीवत जन जस गाए ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्याम) वनसे गायें चराकर आ रहे हैं । संध्याके समय उनके साँवले मुखपर
गायोंके खुरसे उड़ती धूलि लगी है । मयूरपिच्छके पास अलकें ऐसी शोभा देती हैं मानो
भौंरे अमृतपूर्ण खिले कमलके समान मुखके चारों ओर रुचिपूर्वक बैठे हैं और उड़ानेसे
भी उड़ते नहीं । हृदयपर मोतियोंकी माला पहन रखी है, जो (बड़ी) शोभा दे रही है ।
सभी गोपबालक एक समान रंग-रूप तथा अवस्था के हैं, कोई बड़ा-छोटा नहीं है, सब साथ
दौड़ते हुए शोभित हो रहे हैं ।

सूरदास अपने स्वामीकी इस लीलापर बलिहारी है, यह सेवक तो उनका यशोगान करके ही
जीता है ।

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जसुमति दौरि लिए हरि कनियाँ ।
आजु गयौ मेरौ गाइ चरावन, हौं बलि जाउँ निछनियाँ ॥
मो कारन कछु आन्यौ है बलि, बन-फल तोरि नन्हैया ।
तुमहि मिलैं मै अति सुख पायौ, मेरे कुँवर कन्हैया ॥
कछुक खाहु जो भावै मोहन, दैरी माखन-रोटी ।
सूरदास प्रभु जीवहु जुग-जुग हरिहलधर की जोटी ॥

भावार्थ / अर्थ :– यशोदाजीने दौड़कर श्यामको गोदमें उठा लिया । (बोलीं-)’मेरा लाल! आज
गाय चराने गया था । मैं सर्वथा इसपर बलिहारी जाती हूँ मैं तेरी बलैया लूँ, मेरे
नन्हे लाल ! मेरे लिये भी वनसे कुछ फल तोड़कर लाया है? मेरे कुँवर कन्हाई ! तुमसे
मिलने पर मुझे बहुत सुख मिला । मोहन ! जो भी अच्छा लगे, कुछ खा लो ।’ (श्याम बोले-)
‘मैया मक्खन-रोटी दे।’ सूरदासके स्वामी श्याम-बलरामकी यह जोड़ी युग-युग जीवे ।

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