208. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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बृदाबन देख्यौ नँद-नंदन, अतिहिं परम सुख पायौ ।
जहँ-जहँ गाइ चरति, ग्वालनि सँग, तहँ-तहँ आपुन धायौ ॥

बलदाऊ मोकौं जनि छाँड़ौ, संग तुम्हारैं ऐहौं ।
कैसैहुँ आजु जसोदा छाँड़यौ, काल्हि न आवत पैहौं ॥
सोवत मोकौं टेरि लेहुगे, बाबा नंद दुहाई ।
सूर स्याम बिनती करि बल सौं, सखनि समेत सुनाई ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्री नन्दनन्दनने जब वृन्दावन देखा तो उनको बहुत बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । जहाँ-
जहाँ गायें चरती हुई जाती थीं, वहाँ-वहाँ गोपबालकों के साथ स्वयं भी दौड़ते रहे ।
(बड़े भाईसे बोले -) ‘दाऊ दादा! मुझे छोड़कर मत आया करो, मैं तुम्हारे साथ ही
आऊँगा । आज तो किसी प्रकार मैया यशोदा ने छोड़ दिया है, (अकेले) कल नहीं आ पाऊँगा ।
नन्दबाबाकी शपथ, मैं सोता रहूँ तो मुझे पुकार लेना ।’ सूरदासजी कहते हैं कि इस
प्रकार श्यामसुन्दरने सखाओं सहित बलरामजी से प्रार्थना की ।

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