206. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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आजु मैं गाइ चरावन जेहौं ।
बृंदाबन के बाँति-भाँति फल अपने कर मैं खेहौं ॥
ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखो अपनी भाँति ।
तनक-तनक पग चलिहौ कैसैं, आवत ह्वै हैं राति ॥
प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं साँझ ।
तुम्हरौ कमल-बदन कुम्हिलैहै, रेंगत घामहिं माँझ ॥
तेरी सौं मोहि घाम न लागत, भूख नहीं कछु नेक ।
सूरदास-प्रभु कह्यौ न मानत, पर््यौ आपनी टेक ॥

भावार्थ / अर्थ :– ‘आज मैं गाय चराने जाऊँगा । वृन्दावनके अनेक प्रकारके फलोंको
अपने हाथों (तोड़कर) खाऊँगा ।’ (माता बोलीं-)’मेरे लाल ! ऐसी बात मत कहो ! अपनी
(शक्तिकी) ओर तो देखो, तुम्हारे पैर अभी छोटे-छोटे हैं, (वनमें कैसे चलोगे ? (घर
लौटकर) आनेमें रात्रि हो जायगी । (गोप तो) सबेरे गाये चराने ले जाते हैं और सन्ध्या
होनेपर घर आते हैं । तुम्हारा कमलमुख धूपमें घूमते-घूमते म्लान हो जायगा ।’ (श्याम
बोले-)’तेरी शपथ ! मुझे धूप लगती ही नहीं और थोड़ी भी भूख नहीं है ।’ सूरदासजी
कहते हैं कि मेरे स्वामी ने अपनी हठ पकड़ रखी है, वे (किसीका) कहना नहीं मान रहे
हैं ।

मैया ! हौं गाइ चरावन जैहौं ।
तू कहि महर नंद बाबा सौं, बड़ौ भयौ न डरैहौं ॥
रैता, पैता, मना, मनसुखा, हलधर संगहि रैहौं ।
बंसीबट तर ग्वालनि कैं सँग, खेलत अति सुख पैहौं ॥
ओदन भोजन दै दधि काँवरि, भूख लगे तैं खेहौं ।
सूरदास है साखि जमुन-जल सौंह देहु जु नहैहौं ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्यामसुन्दर कहते हैं-)’मैया ! मैं गाय चराने जाऊँगा। तू व्रजराज नन्द
बाबा से कह दे- अब मैं बड़ा हो गया, डरूँगा नहीं, रैता पैता, मना ,मनसुखा आदि
सखाओं तथा दाऊ दादाके साथ ही रहूँगा । वंशीवटके नीचे गोप-बालकोंके साथ खेलनेमें
मुझे अत्यन्त सुख मिलेगा । भोजन के लिये छींकेमें भात और दही दे दे, भूख लगने पर
खा लूँगा ।’ सूरदासजी कहते हैं कि ‘यमुनाजल मेरा साक्षी है, शपथ देदो यदि मैं वहाँ
स्नान करूँ तो ।’

[282]

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चले सब गाइ चरावन ग्वाल ।
हेरी-टेर सुनत लरिकनि के, दौरि गए नँदलाल ॥
फिरि इत-उत जसुमति जो देखै, दृष्टि न पैर कन्हाई ।
जान्यौ जात ग्वाल सँग दौर््यौ, टेरति जसुमति धाई ॥
जात चल्यौ गैयनि के पाछें, बलदाऊ कहि टेरत ।
पाछैं आवति जननी देखी, फिरि-फिरि इत कौं हेरत ॥
बल देख्यौ मोहन कौं आवत, सखा किए सब ठाढ़े ।
पहुँची आइ जसोदा रिस भरि, दोउ भुज पकरे गाढ़े ॥
हलधर कह््यौ, जान दै मो सँग, आवविं आज-सवारे ।
सूरदास बल सौं कहै जसुमति, देखे रहियौ प्यारे ॥

भावार्थ / अर्थ :– सब गोपबालक गाय चराने चले । बालकोंके द्वारा उच्चारित गायोंको पुकारने
का शब्द सुनते ही नन्दनन्दन भी दौड़ कर चले गये । फिर यशोदाजी जो इधर-उधर देखने
लगीं तो कन्हाई कहीं दीखते ही न थे ।

यह जानकर कि वह गोपबालकों के साथ भागा जा रहा है, यशोदाजी पुकारते हुए दौड़ पड़ीं ।
यह कहकर पुकारने लगीं कि ‘बलराम! देखो, कृष्ण गायोंके पीछे चला जा रहा है (उसे
रोको) ‘मोहनने माताको पीछे आते देखा तो बार-बार घूमकर उधरको ही देखते हैं ।
बलरामजी ने श्यामको आते देखा तो सब सखाओं को खड़ा कर लिया । (इतनेमें)
यशोदाजी आ पहुँची, क्रोधमें भरकर उन्होंने (श्यामके) दोनों हाथ कसकर पकड़ लिये ।
बलरामजी बोले-(इसे) साथ जाने दे, आज शीध्र ही हम सब लौट आयेंगे ।’ सूरदासजी कहते
हैं, श्रीयशोदाजी बलरामजीसे बोलीं–प्यारे कन्हाईको देखते रहना (इस छोटे भाईकी
सँभाल रखना) ।

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