202. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

[273]

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जागौ हो तुम नँद-कुमार !
हौं बलि जाउँ मुखारबिंद की, गो-सुत मेलौ खरिक सम्हार ॥
अब लौं कहा सोए मन-मोहन, और बार तुम उठत सबार ।
बारहि-बार जगावति माता, अंबुज-नैन! भयौ भिनुसार ॥
दधि मथि खै माखन बहु दैहौं, सकल ग्वाल ठाढ़े दरबार ।

उठि कैं मोहन बदन दिखावहु, सूरदास के प्रान-अधार ॥

भावार्थ / अर्थ :– माता बार-बार जगा रही हैं -‘कमलनयन !उठो, सबेरा हो गया ।
नंदनन्दन ! तुम जागो । मैं तुम्हारे मुखकमलपर बलिहारी जाती हूँ, बछड़ोंको सँभालकर
गोष्ठमेंपहुँचा दो । मनमोहन ! अबतक तुम क्या सोये हो, दूसरे दिनोंतो तुम सबेरे ही
उठ जाते थे । दही मथकर मैं तुम्हें बहुत-सा मक्खन दूँगी, (देखो) सभी ग्वाल-बालक
द्वार पर खड़े हैं । उठकर (उन्हें) अपना मनोमोहक मुख तो दिखलाओ ।’ सूरदासजी कहते
हैं कि मेरे तो तुम प्राणाधार ही हो ।

[274]

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जागहु हो ब्रजराज हरी !
लै मुरली आँगन ह्वै देखौ, दिनमनि उदित भए द्विघरी ॥

गो-सुत गोठ बँधन सब लागे, गोदोहन की जून टरी ।
मधुर बचन कहि सुतहि जगावति, जननि जसोदा पास खरी ॥
भोर भयौ दधि-मथन होत, सब ग्वाल सखनि की हाँक परी ।
सूरदास-प्रभु -दरसन कारन, नींद छुड़ाई चरन धरी ॥

भावार्थ / अर्थ :– माता यशोदा पास खड़ी होकर बड़ी मीठी वाणी से पुत्रको जगा रही है-
‘व्रजराज श्यामसुन्दर ! तुम जागो । मुरली लेकर आँगनमें आकर देखो तो, सूर्योदय हुए
दो घड़ियाँ बीत चुका है । सबेरा हो गया है, सब घरोंमें दही मथा जा रहा है ।
तुम्हारे सब ग्वाल-सखाओंकी पुकार सुनायी पड़ रही है ।’ सूरदासजी कहते हैं कि मेरे
स्वामीका दर्शन करनेके लिये मैयाने उनका चरण पकड़कर (हिलाकर) उनकी निद्रा दूर
कर दी

[275]

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जागहु लाल, ग्वाल सब टेरत ।
कबहुँ पितंबर डारि बदन पर, कबहुँ उघारि जननि तन हेरत ॥
सोवत मैं जागत मनमोहन, बात सुनत सब की अवसेरत ।
बारंबार जगावति माता, लोचन खोलि पलक पुनि गेरत ॥
पुनि कहि उठी जसोदा मैया, उठहु कान्ह रबि -किरनि उजेरत ।
सूर स्याम , हँसि चितै मातु-मुख , पट करलै, पुनि-पुनि मुख फेरत ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती है–) ‘लाल ! जाग जाओ, सब गोप-बालक तुम्हें पुकार रहे हैं।’
मोहन कभी मुखपर पीताम्बर डाल लेते हैं और कभी मुख खोलकर माताकी ओर देखते हैं ।
मनमोहन सोतेमें भी जाग रहे हैं, सबकी बातें सुनते हैं, किंतु उठनेमें विलंब कर रहे
हैं । माता बार-बार जगाती हैं, नेत्र खोलकर भी फिर पलकें बंद कर लेते हैं । यशोदा
माता फिर बोल उठीं – ‘कन्हाई ! उठो ।सूर्यकी किरणें प्रकाश फैला रही हैं ।’ सूरदास
जी कहते हैं कि श्यामसुन्दर हँसकर माताके मुखकी ओर देखकर फिर वस्त्र हाथमें लेकर
बार-बार (सोनेके लिये) मुख घुमा लेते हैं ।

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