201. राग कान्हरू – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कान्हरू

[272]

…………$
मैं दुहिहौं मोहि दुहन सिखावहु ।
कैसैं गहत दोहनी घुटुवनि, कैसैं बछरा थन लै लावहु ॥
कैसै लै नोई पग बाँधत, कैसैं लै गैया अटकावहु ।
कैसैं धार दूध की बाजति, सोइ-सोइ बिधि तुम मोहि बतावहु ॥

निपट भई अब साँझ कन्हैया, गैयनि पै कहुँ चोट लगावहु ।
सूर स्याम सों कहत ग्वाल सब, धेनु दुहन प्रातहिं उठि आवहु ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्यामसुन्दर गोपोंसे कहते हैं-) ‘मैं गाय दुहूँगा, मुझे दुहना सिखला
दो । दोहनी घुटनों में कैसे पकड़ते हो? बछड़ेको लाकर थनसे कैसे लगाते हो? नोई
(पैर बाँधनेकी रस्सी) लेकर (गायके पिछले दोनों) पैरोंको कैसे बाँधते हो ? गायको ही
लाकर कैसे (उछलते-कूदनेसे) अटकाये (रोके) रहते हो? दूधकी धार (बर्तनमें) शब्द कैसे
करती है, तुमलोग जो कुछ करते हो, वह सारा ढंग मुझे बतलाओ।’ सूरदासजी कहते हैं
कि श्यामसुन्दरसे गोपलोग कह रहे हैं-‘ कन्हाई ! अब एकदम संध्या हो गयी है, कहीं
तुम गायोंसे चोट लगा लोगे; गाय दुहना है तो सबेरे ही उठकर आ जाना ।’

Leave a Reply

Are you human? *