200. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

[271]

……………
धेनु दुहत हरि देखत ग्वालनि ।
आपुन बैठि गए तिन कैं सँग, सिखवहु मोहि कहत गोपालनि ॥
काल्हि तुम्हैं गो दुहन सिखावैं, दुहीं सबै अब गाइ ।
भौर दुहौ जनि नंद-दुहाई, उन सौं कहत सुनाई ॥
बड़ौ भयौ अब दुहत रहौंगौ, अपनी धेनु निबेरि ।
सूरदास प्रभु कहत सौंह दै, मोहिं लीजौ तुम टेरि ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्यानसुन्दर गोपोंको गायें दुहते देखते हैं । (एक दिन) स्वयं भी उनके साथ बैठ गये
और गोपालोंसे कहने लगे -‘मुझे भी सिखलाओ ।’ (गोपोंने कहा-) ‘इस समय तो सब गायें
दुही जा चुकी हैं, कल तुम्हें गाय दुहना सिखलायेंगे।’ तब उनसे सुनाकर कहने लगे –
‘तुम लोगोंको बाबा नन्दकी शपथ है, सबेरे मत दुह लेना । मैं अब बड़ा हो गया, अपनी
गायें अलग करके स्वयं दुह लिया करूँगा ।’ सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी शपथ
देकर (गोपोंसे) कह रहे हैं -‘तुमलोग मुझे पुकार लेना ।’

Leave a Reply

Are you human? *