194. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

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जसुमति, किहिं यह सीख दई ।
सुतहि बाँधि तू मथति मथानी, ऐसी निठुर भई ॥
हरैं बोलि जुवतिनि कौं लीन्हौं, तुम सब तरुनि नई ।
लरिकहि त्रास दिखावत रहिऐ, कत मुरुझाइ गई ॥
मेरे प्रान-जिवन-धन माधौ, बाँधें बेर भई ।
सूर स्याम कौं त्रास दिखावति, तुम कहा कहति दई ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपियाँ कहती हैं ) ‘यशोदाजी ! तुमको यह (निषठुरताकी शिक्षा किसने दी?
पुत्रको बाँधकर मथानी लिये ( स्वयं) दही मथ रही हो ! इतनी निष्ठुर हो गयी हो तुम ?’
(तब यशोदाजीने) धीरेसे युवतियोंको बुला लिया (और बोलीं ) ‘तुम सब अभी नवीन तरुणियाँ
हो (तुम्हें अनुभव तो है नहीं । अरे) लड़केको भय दिखालाते रहना चाहिये । (जिसमें वह
बिगड़ न जाय । इसपर) तुम सब क्यों म्लान हो गयी हो ?’ सूरदासजी कहते हैं (गोपियाँ
बोलीं-) ‘हे भगवान् ! तुम यह क्या कहती हो? श्यामसुन्दर को भय दिखला रही हो? अरे !
ये माधव तो हमारे प्राण हैं, जीवन धन हैं, इन्हें बाँधे देर हो गयी । (अब तो छोड़
दो ।)’

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तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई ।
जुवती गई घरनि सब अपनैं, गृह-कारज जननी अटकाई ॥
आपु गए जमलार्जुन-तरु तर, परसत पात उठे झहराई ।
दिए गिराइ धरनि दोऊ तरु, सुत कुबेर के प्रगटे आई ॥
दोउ कर जोरि करत दोउ अस्तुति, चारि भुजा तिन्ह प्रगट दिखाई ।
सूर धन्य ब्रज जनम लियौ हरि, धरनि की आपदा नसाई ॥

भावार्थ / अर्थ :– उसी समय श्यामसुन्दरने एक उपाय सोच लिया । गोपियाँ तो सब अपने अपने
घर चली गयीं और मैया घरके काममें फँस गयी । (अवसर पाकर ऊखल घसीटते) स्वयं यमलार्जुन
के वृक्षोंके नीचे पहुँच गये । इनके छूते ही (वृक्षोंके) पत्ते हिल उठे, श्यामने
दोनों वृक्षोंको पृथ्वीपर गिरा दिया, उनसे कुबेरके पुत्र (नलकूबर और मणिग्रीव)
प्रकट हो गये । दोनों हाथ जोड़कर वे दोनों स्तुति करने लगे, श्यामने चतुर्भुजरूप
प्रकट करके उन्हें दर्शन दिया । सूरदासजी (केशब्दोंमें कुबेरपुत्र) कहते हैं कि यह
व्रज धन्य है जहाँ श्रीहरिने अवतार लिया और पृथ्वीकी आपत्ति (भार) दूर की ?

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