मानसरोवर भाग 2

त्यागी का प्रेम

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

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ध्वजाधारियों की कमी न थी; पर सच्चे हृदय कहीं नजर न आते थे । चारों ओर से उनकी
खींच होने लगी । किसी संस्था के मंत्री बने, किसी के प्रधान, किसी के कुछ, किसी के
कुछ । इसके आवेश में दर्शनानुराग भी बिदा हुआ । पिंजरे में गानेवाली चिड़िया
विस्तृत पर्वतराशियों में आ कर अपना राग भूल गयी । अब भी वह समय निकाल कर
दर्शनग्रंथों के पन्ने उलट-पलट लिया करते थे, पर विचार और अनुशीलन का अवकाश कहाँ !
नित्य मन में यह संग्राम होता रहता कि किधर जाऊँ ? उधर या इधर ? विज्ञान अपनी
ओर खींचता, देश अपनी ओर खींचता ।
एक दिन वह इसी उलझन में नदी के तट बैठे हुए थे । जलधारा तट के दृश्यों और वायु के
प्रतिकूल झोंकों की परवा न करते हुए बड़े वेग के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ी चली
जाती थी ; पर लाला गोपीनाथ का ध्यान इस तरफ न था । वह अपने स्मृतिभंडार से किसी
ऐसे तत्त्वज्ञानी पुरुष को खोज निकालना चाहते थे, जिसने जाति-सेवा के साथ विज्ञान-
सागर में गोते लगाये हों । सहसा उनके कालेज के एक अध्यापक पंडित अमरनाथ अग्निहोत्री
आकर समीप बैठ गये बोले – कहिए लाला गोपीनाथ, क्या खबरें हैं ?
गोपीनाथ ने अन्यमनस्क हो कर उत्तर दिया- कोई नयी बात तो नहीं हुई । पृथ्वी अपनी
गति से चली जा रही है ।
अमरनाथ–म्युनिसिपल-बोर्ड नम्बर 21 की जगह खाली है, उसके लिए किसे चुनना निश्चित
किया है ?
गोपी–देखिए, कौन होता है । आप भी खड़े हुए हैं ?
अमर – अजी मुझे तो लोगों ने जबरदस्ती घसीट लिया । नहीं तो मुझे इतनी फुर्सत कहाँ ।
गोपी – मेरा भी यही विचार है । अध्यापकों का क्रियात्मक राजनीति में फँसना बहुत
अच्छी बात नहीं ।
अमरनाथ इस व्यंग्य से बहुत लज्जित हुए । एक क्षण के बाद प्रतिकार के भाव से बोले–
तुम आजकल दर्शन का अभ्यास करते हो या नहीं ।
गोपी–बहुत कम । इसी दुविधा में पड़ा हुआ हूँ कि राष्ट्रीय सेवा का मार्ग ग्रहण
करूँ या सत्य कि खोज में जीवन व्यतीत करूँ ?
अमर–राट्रीय संस्थाओं में सम्मिलित होने का समय अभी तुम्हारे लिए नहीं आया । अभी
तुम्हारी उम्र ही क्या है ? जब तक विचारों में गाम्भीर्य और सिद्धांतों पर दृढ़
विश्वास न हो जाय, उस समय तक केवल क्षणिक आवेशों के वशवर्ती हो कर किसी काम में
कूद पड़ना अच्छी बात नहीं । राष्ट्रीय सेवा बड़े उत्तरदायित्व का काम है ।

(2)

गोपीनाथ ने निश्चय कर लिया कि मैं जाति-सेवा से जीवन-क्षेप करूँगा । अमरनाथ ने भी
यही फैसला किया कि मैं म्युनिसिपैलिटी में अवश्य जाऊँगा । दोनों का परस्पर विरोध
उन्हें कर्म-क्षेत्र की ओर खींच ले गया । गोपीनाथ की साख पहले ही से जम गयी थी । घर
के धनी थे । शक्कर और सोने-चाँदी की दलाली होती थी । व्यापारियों में उनके पिता का
बड़ा मान था । गोपीनाथ के दो बड़े भाई थे । वह भी दलाली करते थे । परस्पर मेल था,
धन था, संतानें थीं । अगर न थी तो शिक्षा और शिक्षित समुदाय में गणना । यह बात
गोपीनाथ की बदौलत प्राप्त हो गयी । इसलिए उनकी स्वच्छंदता पर किसी ने आपत्ति नहीं
की, किसी ने उन्हें धनोपार्जन के लिए मजबूर नहीं किया । अतएव गोपीनाथ निश्चिंत और
निर्द्वंद्व होकर राष्ट्र-सेवा में कहीं किसी अनाथालय के लिए चंदे जमा करते, कहीं
किसी कन्या-पाठशाला के लिए भिक्षा माँगते फिरते । नगर की काँग्रेस कमेटी ने उन्हें
अपना मंत्री नियुक्त किया । उस समय तक काँग्रेस ने कर्मक्षेत्र में पदार्पण नहीं
किया था । उनकी कार्यशीलता ने इस जीर्ण संस्था का मानों पुनरुद्धार कर दिया । वह
प्रातः से संध्या और बहुधा पहर रात तक इन्हीं कामों में लिप्त रहते थे । चंदे का
रजिस्टर हाथ में लिये नित्यप्रति साँझ-सवेरे अमीरों और रईसों के द्वार पर खड़े
देखना एक साधारण दृश्य था । धीरे धीरे कितने ही युवक उनके भक्त हो गये । लोग
कहते, कितना निस्वार्थ, कितना आदर्शवादी, त्यागी, जाति-सेवक है । कौन सुबह से
शाम तक निस्वार्थ भाव से केवल जनता का उपकार करने के लिए यों दौड़-धूप करेगा ?
उनका आत्मोत्सर्ग प्रायः द्वेषियों को भी अनुरुक्त कर देता था । उन्हें बहुधा रईसों
की अभद्रता, असज्जनता, यहाँ तक कि उनके कटु शब्द भी सहने पड़ते थे । उन्हें
उन्हें अब विदित हो जाता था कि जाति-सेवा बड़े अंशों तक केवल चंदे माँगना है । इसके
लिए धनिकों की दरबारदारी या दूसरे शब्दों में खुशामद भी करनी पड़ती थी, दर्शन के उस
गौरवयुक्त अध्ययन और इस दानलोलुपता में कितना अंतर था ! कहाँ मिल और केंट;
स्पेन्सर और किड के साथ एकांत में बैठे हुए जीव और प्रकृति के गहन गूढ़ विषय पर
वार्तालाप और कहाँ इन अभिमानी, असभ्य, मूर्ख व्यापारियों के सामने सिर झुकाना ।
वह अतःकरण में उनसे घृणा करते थे । वह धनी थे और केवल धन कमाना चाहते थे ।
इसके अतिरिक्त उनमें और कोई विशेष गुण न था । उनमें अधिकांश ऐसे थे जिन्होंने कपट-
व्यापार से धनोपार्जन किया था पर गोपीनाथ के लिए वह सभी पूज्य थे, क्योंकि उन्हीं
की कृपादृष्टि पर उनकी राष्ट्र-सेवा अवलम्बित थी ।
इस प्रकार कई वर्ष व्यतीत हो गये । गोपीनाथ नगर के मान्य पुरुषों में गिने जाने लगे
वह दीनजनों के आधार और दुखियारों के मददगार थे । अब वह बहुत निर्भीक हो गये थे
और कभी कभी रईसों को भी कुमार्ग पर चलते देख कर फटकार दिया करते थे । उनकी
तीव्र आलोचना भी अब चंदे जमा करने में उनकी सहायक हो जाती थी ।
अभी तक उनका विवाह न हुआ था । वह पहले ही से ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर चुके हैं ।
विवाह करने से साफ इन्कार किया । मगर जब पिता और अन्य बंधुजनों ने बहुत आग्रह
किया, और उन्होंने स्वयं कई विज्ञान-ग्रंथों मे देखा कि इंद्रिय-दमन स्वास्थ्य के
लिए हानिकारक है, तो असमंजस में पड़े । कई हफ्ते सोचते हो गये और वह मन में
कोई बात पक्की न कर सके । स्वार्थ और परमार्थ में संघर्ष हो रहा था । विवाह का अर्थ
था अपनी उदारता की हत्या करना, अपने विस्तृत हृदय को संकुचित करना, न कि राष्ट्र
के लिए जीना । वह अब इतने ऊँचे आदर्श का त्याग करना निंद्य और उपहासजनक समझते
थे । इसके अतिरिक्त अब वह अनेक कारणों से अपने को पारिवारिक जीवन के अयोग्य पाते
थे । जीविका के लिए जिस उद्योगशीलता, जिस अनवरत परिश्रम और जिस मनोवृत्ति की
आवश्यकता है, वह उनमें न रही थी । जाति-सेवा में भी उद्योगशीलता और अध्यवसाय की कम
जरूरत न थी; लेकिन उसमें आत्मगौरव का हनन न होता था ।
परोपकार के लिए भिक्षा माँगना दान है, अपने लिए पान का एक बीड़ा भी भिक्षा है । स्व
भाव में एक प्रकार की स्वच्छंता आ गयी थी । इन त्रुटियों पर परदा डालने के लिए जाति
-सेवा का बहाना बहुत अच्छा था ।
एक दिन वह सैर करने जा रहे थे, कि रास्ते में अध्यापक अमरनाथ से मुलाकात हो गयी।यह
महाशय अब म्युनिसिपल बोर्ड के मंत्री हो गये थे और आजकल इस दुविधा में पड़े थे कि
शहर में मादक वस्तुओं के बेचने का ठेका लूँ या न लूँ । लाभ बहुत था,पर बदनामी भी कम
न थी । अभी तक कुछ निश्चय न कर सके थे । इन्हें देख कर बोले–कहिए लाला जी,
मिजाज अच्छा है न ! आपके विवाह के विषय में क्या हुआ ?
गोपीनाथ ने दृढ़ता से कहा–मेरा इरादा विवाह करने का नहीं है ।
अमरनाथ –ऐसी भूल न करना । तुम अभी नवयुवक हो, तुम्हें संसार का कुछ अनुभव नहीं
है । मैंने ऐसी कितनी मिसालें देखी हैं, जहाँ अविवाहित रहने से लाभ के बदले हानि ही
हुई है । विवाह मनुष्य को सुमार्ग पर रखने का सबसे उत्तम साधन है,जिसे अब तक मनुष्य
ने आविष्कृत किया है । उस व्रत से क्या फायदा जिसका परिणाम छीछोरापन हो ।
गोपीनाथ ने प्रत्युत्तर दिया–आपने मादक वस्तुओं के ठीके के विषय में क्या निश्चय
किया ?
अमर –अभी तक कुछ नहीं । जी हिचकता है । कुछ न कुछ बदनामी तो होगी ही ।
गोपी–एक अध्यापक के लिए मैं इस पेशे को अपमान समझता हूँ ।
अमर– कोई पेशा खराब नहीं है, अगर ईमानदारी से किया जाय ।
गोपी – यहाँ मेरा आपसे मतभेद है । कितने ही ऐसे व्यवसाय हैं जिन्हें एक सुशिक्षित
कभी स्वीकार नहीं कर सकता । मादक वस्तुओं की ठेका उनमें एक है ।
गोपीनाथ – आकर अपने पिता से कहा–मैं कभी विवाह न करूँगा । आप लोग मुझे विवश
न करें, वरना पछताइएगा ।
अमरनाथ ने उसी दिन ठेके के लिए प्रार्थना पत्र भेज दिया और वह स्वीकृत भी हो गया ।

(3)

दो साल हो गये हैं । लाला गोपीनाथ ने एक कन्या-पाठशाला खोली है और उसके प्रबन्धक
हैं । शिक्षा की विभीन्न पद्धितियों का उन्होंने खूब अध्ययन किया है और इस पाठशाला
में वह उनका व्यवहार कर रहें हैं । शहर में यह पाठशाला बहुत ही सर्वप्रिय है । उसने
बहुत अंशों में उस उदासीनता का परिशोध कर दिया है जो माता-पिता को पुत्रियों की
शिक्षा की ओर होती है । शहर के गण्यमान्य पुरुष अपनी लड़कियों को सहर्ष पढ़ने भेजते
हैं । वहाँ की शिक्षा-शैली कुछ ऐसी मनोरंजक है कि बालिकाएँ एक बार जा कर मानो
मंत्रमुग्ध हो जाती हैं । फिर उन्हें घर पर चैन नहीं मिलता । ऐसी व्यवस्था की गयी
है कि तीन-चार वर्षों में ही कन्याओं का गृहस्थी के मुख्य कामों से परिचय हो जाय ।
सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ धर्म-शिक्षा का भी समुचित प्रबंध किया गया है । अबकी
साल से प्रबंधक महोदय ने अँगरेजी की कक्षाएँ भी खोल दी हैं ।
एक सुशिक्षित गुजराती महिला को बम्बई से बुला कर पाठशाला उनके हाथ में दे दी है ।
इन महिला का नाम है आनंदी बाई । विधवा हैं । हिंदी भाषा से भली-भाँति परिचित नहीं
है; किंतु गुजराती में कई पुस्तकें लिख चुकी हैं । कई कन्या-पाठशालाओं में काम कर
चुकी हैं । शिक्षा-संबंधी विषयों में अच्छी गति है । उनके आने से मदरसे में और भी
रौनक आ गयी है । कई प्रतिष्ठित सज्जनों ने जो अपनी बालिकाओं को मंसूरी और नैनीताल
भेजना चाहते थे, अब उन्हें यहीं भरती करा दिया है । आनंदी रईसों के घरों में जाती
हैं और स्त्रियों में शिक्षा का प्रचार करती हैं । उनके वस्त्राभूषणों से सुरुचि का
बोध होता है । हैं भी उच्चकुल की, इसलिए शहर में उनका बड़ा सम्मान होता है ।
लड़कियाँ उन पर जान देती हैं, उन्हें माँ कहकर पुकारती हैं । गोपीनाथ पाठशाला की
उन्नति देख-देख कर फूले नहीं समाते । जिससे मिलते हैं, आनंदी बाई का ही गुणगान
करते हैं । बाहर से कोई सुविख्यात पुरुष आता है, तो उससे पाठशाला का निरीक्षण अवश्य
कराते हैं । आनंदी की प्रशंसा से उन्हें वही आनंद प्राप्त होता है, जो स्वयं अपनी
प्रशंसा से होता । बाई जी को भी दर्शन से प्रेम है, और सबसे बड़ी बात यह है कि
उन्हें गोपीनाथ पर असीम श्रद्धा है । वह हृदय से उनका सम्मान करती हैं ।
उनके त्याग और निष्काम जाति-भक्ति ने उन्हें वशीभूत कर लिया है । वह मुँह पर तो
उनकी बड़ाई नहीं करतीं; पर रईसों के घरों में बड़े प्रेम से उनका यशोगान करती हैं ।
ऐसे सच्चे सेवक आजकल कहाँ ? लोग कीर्ति पर जान देते हैं । जो थोड़ी-बहुत सेवा
करते हैं, दिखावे के लिए । सच्ची लगन किसी में नहीं । मैं लाला जी को पुरुष नहीं
देवता समझती हूँ । कितना सरल, संतोषमय जीवन है । न कोई व्यसन, न विलास ।
भौर से सायंकाल तक दौड़ते रहते हैं, न खाने का कोई समय, न सोने का समय । उस
पर कोई ऐसा नहीं, जो उनके आराम का ध्यान रखे । बिचारे घर गये, जो कुछ किसी ने
सामने रख दिया, चुपके से खा लिया, फिर छड़ी उठायी और किसी तरफ चल दिये ।
दूसरी कदापि अपनी पत्नी की भाँति सेवा सत्कार नहीं कर सकती ।
दशहरे के दिन थे । कन्या-पाठशाला में उत्सव मनाने की तैयारियाँ हो रही थीं । एक
नाटक खेलने का निश्चय किया गया था । भवन खूब सजाया गया था । शहर के रईसों
को निमंत्रण दिये गये थे । यह कहना कठिन है कि किसका उत्साह बढ़ा हुआ था, बाई जी
का या लाला गोपीनाथ का । गोपीनाथ सामग्रियाँ एकत्र कर रहे थे, उन्हें अच्छे ढंग से
सजाने का भार आनंदी ने लिया था,नाटक भी इन्हीं ने रचा था । नित्य प्रति उसका अभ्यास
करती थीं और स्वयं एक पार्ट ले रखा था ।
विजयदशमी आ गयी । दोपहर तक गोपीनाथ फर्श और कुर्सियों का इंतजाम करते रहे ।
अब एक बज गया और अब भी वह वहाँ से न टले तो आनंदी ने कहा–लाला जी, आपको
भोजन करने को देर हो रही है । अब सब काम हो गया है । जो कुछ बच रहा है, मुझ
पर छोड़ दीजिए ।
गोपीनाथ ने कहा–खा लूँगा । मैं ठीक समय पर भोजन करने का पाबंद नहीं हूँ । फिर घर
तक कौन जाय । घंटों लग जायँगे । भोजन के उपरांत आराम करने को जी चाहेगा ।
शाम हो जायगी ।
आनंदी –भोजन तो मेरे यहाँ तैयार है, ब्राह्मणी ने बनाया है चल कर खा लीजिए और
यहीं जरा देर आराम भी कर लीजिए ।
गोपीनाथ –यहाँ क्या खा लूँ ! एक वक्त न खाऊँगा, तो ऐसी कौन-सी हानि हो जायगी ।
आनंदी – जब भोजन तैयार है तो उपवास क्यों कीजिएगा ।
गोपीनाथ – आप जायें आपको अवश्य देर हो रही है । मैं काम में ऐसा भूला कि आपकी
सुधि ही न रही ।
आनंदी – मैं भी एक जून उपवास कर लूँगी तो क्या हानि होगी ?
गोपीनाथ – नहीं-नहीं, इसकी क्या जरूरत है ? मैं आपसे सच कहता हूँ, मैं बहुधा
एक ही जून खाता हूँ ।
आनंदी – अच्छा , मैं आपके इनकार का माने समझ गयी । इतनी मोटी बात अब तक मुझे
न सूझी ।
गोपीनाथ – क्या समझ गयीं ? मैं छूतछात नहीं मानता । यह तो आपको मालूम ही है ।
आनंदी – इतना जानती हूँ, किंतु जिस कारण से आप मेरे यहाँ भोजन करने से इनकार कर
रहे हैं, उसके विषय में केवल इतना निवेदन है कि मुझे आपसे केवल स्वामी और सेवक का
संबंध नहीं है । मुझे आपसे आत्मीयता का संबंध है । आपका मेरे पान-फूल को अस्वीकार
करना अपने एक सच्चे भक्त के मर्म को आघात पहुँचाना है । मैं आपको इसी दृष्टि से
देखती हूँ ।
गोपीनाथ को अब कोई आपत्ति न हो सकी । जा कर भोजन कर लिया । वह जब तक आसन
पर बैठे रहे, आनंदी बैठी पंखा झलती रही ।
इस घटना की लाला गोपीनाथ के मित्रों ने यों आलोचना की, “महाशय जी अब तो वहीं
(“वहीं”पर खूब जोर देकर) भोजन भी करते हैं ।”

(4)

शनैः शनैः परदा हटने लगा । लाला गोपीनाथ को अब परवशता ने साहित्य सेवी बना दिया
था । घर से उन्हें आवश्यक सहायता मिल जाती थी; किंतु पत्रों और पत्रिकाओं तथा अन्य
अनेक कामों के लिए उन्हें घरवालों से कुछ मागते हुए बहुत संकोच होता था । उनका
आत्म-सम्मान जरा-जरा सी बातों के लिए भाइयों के सामने हाथ फैलाना अनुचित समझता था ।
वह अपनी जरूरतें आप पूरी करना चाहते थे । घर पर भाइयों के लड़के इतने कोलाहल
मचाते कि उनका जी कुछ लिखने में न लगता ।
इसलिए जब उनकी कुछ लिखने की इच्छा होती तो बेखटके पाठशाला में चले जाते । आनंदी
बाई भी वहीं रहती थीं । वहाँ न कोई शोर था, न गुल । एकांत में कामकरने में जी लगता
भोजन का समय आ जाता तो वहीं भोजन भी कर लेते । कुछ दिनों के बाद उन्हें बैठ कर
लिखने में कुछ असुविधा होने लगी (आँखें कमजोर हो गयी थीं) तो आनंदी ने लिखने का भार
अपने सिर ले लिया । लाला साहब बोलते थे, आनंदी लिखती थीं । गोपीनाथ की प्रेरणा से
उन्होंने हिंदी सीखी थी और थोड़े ही दिनों में इतनी अभ्यस्त हो गयी थी कि लिखने में
जरा भी हिचक न होती । लिखते समय कभी कभी उन्हें ऐसे शब्द और मुहावरे सूझ जाते
कि गोपीनाथ फड़क फड़क उठते, उनके लेख में जान-सी पड़ जाती । वह कहते, यदि
तुम स्वयं कुछ लिखो तो मुझसे बहुत अच्छा लिखोगी । मैं तो बेगारी करता हूँ ।
तुम्हें परमात्मा की ओर से यह शक्ति प्रदान हुई है । नगर के लाल-बुझक्कड़ों में इस
सहकारिता पर टीका-टिप्पणियाँ होने लगीं । पर विद्वज्जन अपनी आत्माकी शुचिता के
सामने ईर्ष्या के व्यंग्य की कब परवाह करते हैं । आनंदी कहतीं-यह तो संसार है,
जिसके मन में आये कहे; पर मैं उस पुरुष का निरादर नहीं कर सकती जिस पर मेरी
श्रद्धा है । पर गोपीनाथ इतने निर्भीक न थे । उनकी सुकीर्ति का आधार लोकमत था ।
वह उसकी भर्त्सना न कर सकते थे । इसलिए वह दिन के बदले रात को रचना करने
लगे । पाठशाला में इस समय कोई देखनेवाला न होता था । रात की नीरवता में खूब जी
लगता । आराम कुरसी पर लेट जाते । आनंदी मेज के सामने कलम हाथ में लिए उनकी
ओर देखा करतीं । जो कुछ उनके मुख से निकलता तुरंत लिख लेती । उनकी आँखों से
विनय और शील, श्रद्धा और प्रेम की किरण-सी निकलती हुई जान पड़ती । गोपीनाथ जब
किसी भाव को मन में व्यक्त करने के बाद आनंदी की ओर ताकते कि वह लिखने के लिए
तैयार है या नहीं, तो दोनों व्यक्तियों की निगाहें मिलती और आप ही झुक जातीं । गोपी
नाथ को इस तरह काम करने की ऐसी आदत पड़ती जाती थी कि जब किसी कार्यवश यहाँ
आने का अवसर न मिलता तो वह विकल हो जाते थे ।
आनंदी से मिलने के पहले गोपीनाथ को स्त्रियों का जो कुछ ज्ञान था, यह केवल पुस्तकों
पर अवलम्बित था ।
स्त्रियों के विषय में प्राचीन और अर्वाचीन, प्राच्य और पाश्चात्य सभी विद्वानों
का एक ही मत था– यह मायावी, आत्मिक उन्नति की बाधक, परमार्थ की
विरोधिनी, वृत्तियों को कुमार्ग की ओर ले जानेवाली, हृदय को संकीर्ण बनानेवाली होती
है । इन्हीं कारणों से उन्होंने इस मायावी जाति से अलग रहना ही श्रेयस्कर समझा था;
किंतु अब अनुभव बतला रहा था कि स्त्रियाँ सन्मार्ग की ओर भी ले जा सकती हैं ,उनमें
सद्गुण भी हो सकते हैं । वह कर्तव्य और सेवा के भावों को जागृत भी कर सकती हैं ।
तब उनके मन में प्रश्न उठता कि यदि आनंदी से मेरा विवाह होता तो मुझे क्या आपत्ति
हो सकती थी । उसके साथ तो मेरा जीवन बड़े आनंद से कट जाता । एक दिन वह
आनंदी के यहाँ गये तो सिर में दर्द हो रहा था । कुछ लिखने की इच्छा न हुई । आनंदी
को इसका कारण मालूम हुआ तो उसने उनके सिर में धीरे धीरे तेल मलना शुरू किया ।
गोपीनाथ को उस समय अलौकिक सुख मिल रहा था । मन में प्रेम की तरंगे उठ रही थीं
नेत्र , मुख वाणी–सभी प्रेम में पगे जाते थे ।
उसी दिन से उन्होंने आनंदी के यहाँ आना छोड़ दिया । एक सप्ताह बीत गया और न
आये । आनंदी ने लिखा–आपसे पाठशाला संबंधी कई विषयों में राय लेनी है । अवश्य
आइए । तब भी न गये । उसने फिर लिखा–मालूम होता है आप मुझसे नाराज हैं ! मैंने
जान-बूझ कर तो कोई ऐसा काम नहीं किया, लेकिन यदि वास्तव में आप नाराज हैं तो मैं
यहाँ रहना उचित नहीं समझती । अगर आप अब भी न आयेंगे तो मैं द्वितीय अध्यापिका को
चार्ज दे कर चली जाऊँगी । गोपीनाथ पर इस धमकी का भी कुछ असर न हुआ । अब भी न
गये । अंत में दो महीने तक खिंचे रहने के बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि आनंदी बीमार है
और दो दिन से पाठशाला नहीं आ सकी । तब वह किसी तर्क या मुक्ति से अपने को न रोक
सके । पाठशाला में आये और कुछ झिझकते, कुछ सकुचाते, आनंदी के कमरे में कदम रखा ।
देखा तो चुपचाप पड़ी हुई थी । मुख पीला था, शरीर घुल गया था । उसने उनकी ओर दया
प्रार्थी नेत्रों से देखा । उठना चाहा पर अशक्ति ने उठने न दिया । गोपीनाथ ने
आर्द्र कंठ से कहा–लेटी रहो, लेटी रहो, उठने की जरूरत नहीं, मैं बैठ जाता हूँ ।
डाक्टर साहब आये थे ?
मिश्राइन ने कहा–जी हाँ, दो बार आये थे । दवा दे गये हैं ।
गोपीनाथ ने नुसखा देखा । डाक्टरी का साधरण ज्ञान था । नुसखे से ज्ञात हुआ-
हृदयरोग है । औषधियाँ सभी पुष्टिकर और बलवर्द्धक थीं । आनंदी की ओर फिर देखा ।
उसकी आँखों से अश्रुधारा बह रही थी । उनका गला भी भर आया । हृदय मसोसने लगा ।
गद्गद् हो कर बोले–आनंदी, तुमने मुझे पहले इसकी सूचना न दी, नहीं तो रोग इतना न
बढ़ने पाता ।
आनंदी–कोई बात नहीं, अच्छी हो जाऊँगी, जल्दी ही अच्छी हो जाऊँगी । मर भी जाऊँगी
तो कौन रोनेवाला बैठा हुआ है ? यह कहते कहते वह फूट फूट कर रोने लगी ।
गोपीनाथ दार्शनिक थे । पर अभी तक उनके मन के कोमल भाव शिथिल न हुए थे । कम्पित
स्वर से बोले–आनंदी, संसार में कम से कम एक ऐसा आदमी है जो तुम्हारे लिए अपने
प्राण तक दे देगा । यह कहते कहते वह रुक गये । उन्हें अपने शब्द और भाव कुछ भद्दे
और उच्छृंखल से जान पड़े । अपने मनोभावों को प्रकट करने के लिए वह इन सारहीन शब्दों
की अपेक्षा कहीं अधिक काव्यमय, रसपूर्ण, अनुरक्त शब्दों का व्यवहार करना चाहते थे,
पर वह इस वक्त याद न पड़े ।
आनंदी ने पुलकित हो कर कहा- दो महीने तक किस पर छोड़ दिया था ?
गोपीनाथ–इन दो महीनों में मेरी जो दशा थी, वह मैं ही जानता हूँ । यही समझ लो कि
मैंने आत्महत्या नहीं की, यही बड़ा आश्चर्य है । मैंने न समझा था कि अपने व्रत पर
स्थिर रहना मेरे लिए इतना कठिन हो जायगा ।
आनंदी ने गोपीनाथ का हाथ धीरे से अपने हाथ में लेकर कहा–अब तो कभी इतनी
कठोरता न कीजियेगा ?
गोपीनाथ — (संचित हो कर) अंत क्या है ?
आनंदी – कुछ भी हो ?
गोपी – कुछ भी हो ?
गोपी – अपमान, निंदा, उपहास, आत्मवेदना ।
आनंदी – कुछ भी हो, मैं सब कुछ सह सकती हूँ, और आपको भी मेरे हेतु सहना पड़ेगा ।
गोपी — आनंदी मैं अपने को प्रेम पर बलिदान कर सकता हूँ, लेकिन अपने नाम को नहीं ।
इस काम को अकलंकित रखकर मैं समाज की बहुत कुछ सेवा कर सकता हूँ ।
आनंदी – न कीजिए । आपने सब कुछ त्याग कर यह कीर्ति लाभ की है, मैं आपके यश को
नहीं मिटाना चाहती (गोपीनाथ का हाथ हृदयस्थल पर रख कर) इसको चाहती हूँ । इससे
अधिक त्याग की आकांक्षा नहीं रखती ?
गोपी – दोनों बातें एक साथ संभव है ?
आनंदी – संभव है । मेरे लिए संभव है । मैं प्रेम पर अपनी आत्मा को भी न्यौछावर
कर सकती हूँ ।

(5)

इसके पश्चात् लाला गोपीनाथ ने आनंदी की बुराई करनी शुरू की । मित्रों से कहते ,
उनका जी अब काम में नहीं लगता । पहले की-सी तनदेही नहीं है । किसी से कहते,
उनका जी अब यहाँ से उचाट हो गया है, अपने घर जाना चाहती उनकी इच्छा है कि
मुझे तरक्की मिला करे और उसकी यहाँ गुंजाइश नहीं । पाठशाला को कई-बार देखा और
अपनी आलोचना में काम को असंतोषजनक लिखा । शिक्षा,संगठन, उत्साह, सुप्रबंध सभी
बातों में निराशाजनक क्षति पायी । वार्षिक अधिवेशन में जब कई सदस्यों ने आनंदी की
वेतन-वृद्धि का प्रस्ताव उपस्थित किया तो लाला गोपीनाथ ने उसका विरोध किया । उधर
आनंदी बाई भी गोपीनाथ के दुखड़े रोने लगी । यह मनुष्य नहीं है, पत्थर का देवता है ।
उन्हें प्रसन्न करना दुस्तर है, अच्छा ही हुआ कि उन्होंने विवाह नहीं किया, नहीं तो
दुखिया इनके नखरे उठाते उठाते सिधार जाती । कहाँ तक कोई सफाई और सुप्रबंध पर
ध्यान दे ! दीवार पर एक धब्बा भी पड़ गया, किसी कोने-खुतरे में एक जाला भी लग गया,
बरामदों में कागद का एक टुकड़ा भी पड़ा मिल गया तो आपके तीवर बदल जाते हैं । दो
साल मैंने ज्यों-ज्यों करके निबाहा; लेकिन देखती हूँ तो लाला साहब की निगाह दिनों-
दिन कड़ी होती जाती है । ऐसी दशा में मैं यहाँ अधिक नहीं ठहर सकती ।
मेरे लिए नौकरी का कल्याण नहीं है , जब जी चाहेगा, उठ खड़ी हूँगी । यहाँ आप लोगों
से मेल मुहब्बत हो गयी है, कन्याओं से ऐसा प्यार हो गया है कि छोड़ कर जाने को जी
नहीं चाहता । आश्चर्य था कि और किसी को पाठशाला की दशा में अवनति न दीखती थी, वरन्
हालत पहले से अच्छी थी ।
एक दिन पंडित अमरनाथ की लाला जी से भेंट हो गयी । उन्होंने पूछा–कहिए, पाठशाला खूब
चल रही है न ?
गोपी –कुछ न पूछिए । दिनों-दिन दशा गिरती जाती है ।
अमर – आनंदी बाई की ओर से ढील है क्या ?
गोपी – जी हाँ,सरासर । अब काम करने में उनका जी नहीं लगता । बैठी हुई योग और ज्ञान
के ग्रंथ पढ़ा करती हैं । कुछ कहता हूँ तो कहती हैं,मैं अब इससे और अधिक कुछ नहीं
कर सकती । कुछ परलोक की भी चिंता करूँ कि चौबीसों घंटे पेट के धंधों में ही लगी
रहूँ ? पेट के लिए पाँच घंटे बहुत हैं । पहले कुछ दिनों तक बारह घंटे करती; पर वह
दशा स्थायी नहीं रह सकती थी । यहाँ आकर मैंने स्वास्थ्य खो दिया । एक बार कठिन
रोग ग्रस्त हो गयी । क्या कमेटी ने मेरा दवा-दर्पन का खर्च दे दिया ? कोई बात पूछने
भी आया ? फिर अपनी जान क्यों दूँ ? सुना है, घरों में मेरी बदगोई भी किया करती है ।
अमरनाथ मार्मिक भाव से बोले –यह बातें मुझे पहले ही मालूम थीं ।
दो साल और गुजर गये । रात का समय था । कन्या-पाठशाला के ऊपर वाले कमरे में लाला
गोपीनाथ मेज के सामने कुरसी पर बैठै हुए थे, सामने आनंदी कोच पर लेटी हुई थी । मुख
बहुत म्लान हो रहा था । कई मिनट तक दोनों विचार में मग्न थे । अंत में गोपीनाथ
बोले–मैंने पहले ही महीने में तुमसे कहा था कि मथुरा चली जाओ ।
आनंदी – वहाँ दस महीने क्योंकर रहती । मेरे पास इतने रुपये कहाँ थे और न तुम्हीं ने
कोई प्रबन्ध करने का आश्वासन दिया । मैंने सोचा, तीन-चार महीने यहाँ रहूँ । तब तक
किफायत करके कुछ बचा लूँगी, तुम्हारी किताब से भी कुछ मिल जायेंगे । तब मथुरा चली
जाऊँगी;
मगर यह क्या मालूम था कि बीमारी भी इसी अवसर की ताक में बैठी हुई है । मेरी दशा
दो चार दिन के लिए भी सँभली और मैं चली । इस दशा में तो मेरे लिए यात्रा करना
असम्भव है ।
गोपी — मुझे भय है कि कहीं बीमारी तूल न खींचे । संग्रहणी असाध्य रोग है । महीने
दो महीने यहाँ और रहने पड़ गये तो बात खुल जायगी ।
आनंदी – (चिढ़ कर) खुल जायगी, खुल जाय । अब इससे कहाँ तक डरूँ?
गोपी – मैं भी न डरता अगर मेरे कारण नगर की कई संस्थाओं का जीवन संकट में न पड़
जाता । इसीलिए मैं बदनामी से डरता हूँ । समाज के यह बन्धन निरे पाखंड हैं । मैं
उन्हें सम्पूर्णतः अन्याय समझता हूँ । इस विषय में तुम मेरे विचारों को भलीभाँति
जानती हो; पर करूँ क्या ? दुर्भाग्यवश मैंने जाति-सेवा का भार अपने ऊपर ले लिया है
और उसी का फल है कि आज मुजे अपने माने हुए सिद्धान्तों को तोड़ना पड़ रहा है जो
वस्तु मुझे प्राणों से भी प्रिय है, उसे यों निर्वासित करना पड़ रहा है ।
किंतु आनंदी की दशा सँभलने की जगह दिनों-दिन गिरती ही गयी । कमजोरी से उठना-बैठना
कठिन हो गया था । किसी वैद्य या डाक्टर को उसकी अवस्था न दिखायी जाती थी । गोपीनाथ
दवाएँ लाते थे, आनंदी उनका सेवन करती थी और दिन दिन निर्बल होती जाती थी । पाठशाला
से उसने छुट्टी ले ली थी । किसी से मिलती-जुलती भी न थी । बार बार चेष्टा करती कि
मथुरा चली जाऊँ; किंतु एक अनजान नगर में अकेले कैसे रहूँगी, न कोई आगे, न पीछे ।
कोई एक घूँट पानी देनेवाला भी नहीं । यह सब सोचकर उसकी हिम्मत टूट जाती थी । इसी
सोच-विचार और हैस-बेस में दो महीने और गुजर गये और अन्त में विवश हो कर आनंदी ने
निश्चय किया कि अब चाहे कुछ सिर पर बीते, यहाँ से चल ही दूँ । अगर सफर में मर भी
जाऊँ तो क्या चिन्ता है । उनकी बदनामी तो न होगी । उनके यश को कलंग तो न लगेगा
मेरे पीछे ताने तो न सुनने पड़ेंगे । सफर की तैयारियाँ करने लगी । रात को जाने का
मुहूर्त था कि सहसा संध्याकाल से ही प्रसवपीड़ा होने लगी और ग्यारह बजते बजते एक
नन्हा-सा दुर्बल सतवाँसा बालक प्रसव हुआ । बच्चे के होने की आवाज सुनते ही लाला
गोपीनाथ बेतहाशा ऊपर से उतरे और गिरते-पड़ते घर भागे ।
आनंदी ने इस भेद को अंत तक छिपाये रखा , अपनी दारुण प्रसव-पीड़ा का हाल किसी से
न कहा । दाई को भी सूचना न दी ; मगर जब बच्चे के रोने की ध्वनि मदरसे में गूँजी
तो क्षणमात्र में दाई सामने आकर खड़ी हो गयी । नौकरानियों को पहले से शंकाएँ थीं ।
उन्हें कोई आश्चर्य न हुआ । जब दाई ने आनंदी को पुकारा तो वह सचेत हो गयी । देखा
तो बालक रो रहा है ।

(6)

दूसरे दिन दस बजते बजते यह समाचार सारे शहर में फैल गया । घर घर चर्चा होने लगी ।
कोई आश्चर्य करता था, कोई घृणा करता, कोई हँसी उड़ाता था । लाला गोपीनाथ के
छिद्रान्वेषियों की संख्या कम न थी । पंडित अमरनाथ उनके मुखिया थे । उन लोगों ने
लालाजी की निंदा करनी शुरु की । जहाँ देखिए वहीं दो-चार सज्जन बैठे गोपनीय भाव
से इसी घटना की आलोचना करते नजर आते थे । कोई कहता था, इस स्त्री के लक्षण पहले
ही से विदित हो रहे थे । अधिकांश आदमियों की राय में गोपीनाथ ने यह बुरा किया । यदि
ऐसा ही प्रेम ने जोर मारा था तो उन्हें निडर हो कर विवाह कर लेना चाहिए था । यह काम
गोपीनाथ का है,इसमें किसी को भ्रम नहीं था । केवल कुशल समाचार पूछने के बहाने से
लोग उनके घर जाते और दो-चार अन्योक्तियाँ सुनाकर चले आते थे । इसके विरुद्ध आनंदी
पर लोगों को दया आती थी । पर लाला जी के ऐसे भक्त भी थे, जो लाला जी के माथे यह
कलंक मढ़ना पाप समझते थे । गोपीनाथ ने स्वयं मौन धारण कर लिया था । सबकी भली-बुरी
बातें सुनते थे, पर मुँह न खोलते थे । इतनी हिम्मत न थी कि सबसे मिलना छोड़ दें ।
प्रश्न था, अब क्या हो ? आनंदी बाई के विषय में तो जनता ने फैसला कर दिया । बहस यह
थी कि गोपीनाथ के साथ क्या व्यवहार किया जाय । कोई कहता था, उन्होंने जो कुकर्म
किया है, उसका फल भोगें । आनन्दी बाई को नियमित रूप से घर में रखें । कोई कहता,
हमें इससे क्या मतलब, आनंदी जानें और वह जानें । दोनों जैसे के तैसे हैं, जैसे उदई
वैसे भान, न उनके चोटी न उनके कान । लेकिन इन महाशय को पाठशाला के अंदर अब
कदम न रखने देना चाहिए ।
जनता के फैसले साक्षी नहीं खोजते । अनुमान ही उसके लिए सबसे बड़ी गवाही है ।
लेकिन पं0 अमरनाथ और उनकी गोष्ठी के लोग गोपीनाथ को इतने सस्ते न छोड़ना चाहते थे ।
उन्हें गोपीनाथ से पुराना द्वेष था । यह कल का लौंडा दर्शन की दो-चार पुस्तकें उलट-
पुलट कर, राजनीति में कुछ शुदबुद करके लीडर बना हुआ बिचरे, सुनहरी ऐनक लगाये,
रेशमी चादर गले में डाले, यों गर्व से ताके, मानों सत्य और प्रेम का पुतला है । ऐसे
रंगे सियाने की जितनी कलई खोली जाय, उतना ही अच्छा । जाति को ऐसे दगाबाज, चरित्र
हीन, दुर्बलात्मा सेवकों से सचेत कर देना चाहिए । पंडित अमरनाथ पाठशाला की अध्या
-पिकाओं और नौकरों से तहकीकात करते थे । लालाजी कब आते थे, कब जाते थे, कितनी
देर रहते थे, यहाँ क्या किया करते थे, तुम लोग उनकी उपस्थिति में वहाँ जाने पाते थे
या रोक थी ? लेकिन यह छोटे छोटे आदमी, जिन्हें गोपीनाथ से संतुष्ट रहने का कोई कारण
न था (उनकी सख्ती की नौकर लोग बहुत शिकायत किया करते थे) इस दुरवस्था में उनके ऐबों
पर परदा डालने लगे । अमरनाथ ने प्रलोभन दिया, डराया धमकाया; पर किसी ने गोपीनाथ के
विरुद्ध साक्षी न दी ।
उधर लाला गोपीनाथ ने उसी दिन से आनन्दी के घर आना-जाना छोड़ दिया । दो हफ्ते तक
तो वह अभागिनी किसी तरह कन्या पाठशाला में रही । पन्द्रहवें दिन प्रबन्धक समिति ने
उसे मकान खाली कर देने की नोटिस दे दी । महीने भर की मुहलत देना भी उचित न समझा ।
अब वह दुखिया एक तंग मकान में रहती थी, कोई पूछनेवाला न था । बच्चा कमजोर , खुद
बीमार,कोई आगे, न पीछे, न कोई दुःख का संगी, न साथी । शिशु को गोद मे लिये दिन के
दिन बेदाना-पानी पड़ी रहती थी । एक बुढ़िया महरी मिल गयी थी, जो बर्तन धो कर चली
जाती थी । कभी कभी शिशु को छाती से लगाये रात की रात रह जाती; पर धन्य है उसके
धैर्य और सन्तोष को ! लाला गोपीनाथ से मुँह में शिकायत थी न दिल में । सोचती, इन
परिस्थितियों में उन्हें मुझसे पराङ्मुख ही रहना चाहिए । इसके अतिरिक्त और उपाय
नहीं है । उनके बदनाम होने से नगर की कितनी बड़ी हानि होती । सभी उन पर सन्देह
करते हैं; पर किसी को यह साहस तो नहीं हो सकता कि उनके विपक्ष में कोई प्रमाण दे
सके !
यह सोचते हुए उसने स्वामी अभेदानन्द की एक पुस्तक उठायी और उसके एक अध्याय
का अनुवाद करने लगी । अब उसकी जीविका का एकमात्र यही आधार था । सहसा किसी ने
धीरे से द्वार खटखटाया । वह चौंक पड़ी । लाला गोपीनाथ की आवाज मालूम हुई । उसने
तुरंत द्वार खोल दिया । गोपीनाथ आकर खड़े हो गये और सोते हुए बालक को प्यार से
देख कर बोले–आनंदी, मैं तुम्हें मुँह दिखाने लायक नहीं हूँ । मैं अपनी भीरुता और
नैतिक दुर्बलता पर अत्यंत लज्जित हूँ । यद्यपि मैं जानता हूँ कि मेरी बदनामी जो कुछ
होनी थी, वह हो चुकी । मेरे नाम से चलनेवाली संस्थाओं को जो हानि पहुँचनी थी,
पहुँच चुकी । अब असम्भव है कि जनता को अपना मुँह फिर दिखाऊँ और न वह मुझ पर
विश्वास ही कर सकती है । इतना जानते हुए भी मुझमें इतना साहस नहीं है कि अपने
कुकृत्य का भार सिर ले लूँ । मैं पहले सामाजिक शासन की रत्ती भर परवाह करता; पर
अब पग-पग पर उसके भय से मेरे प्राण काँपने लगते हैं । धिक्कार है मुझ पर कि
तुम्हारे ऊपर ऐसी विपत्तियाँ पड़ी, लोकनिंदा, रोग,शोक, निर्धनता सभी का सामना करना
पड़ा और मैं यों अलग अलग रहा मानो मुझसे कोई प्रयोजन नहीं ; पर मेरा हृदय ही जानता
है कि उसको कितनी पीड़ा होती थी । कितनी ही बार आने का निश्चय किया और फिर हिम्मत
हार गया । अब मुझे विदित हो गया कि मेरी सारी दार्शनिकता केवल हाथी का दाँत थी ।
मुझमें क्रिया-शक्ति नहीं है; लेकिन इसके साथ ही तुमसे अलग रहना मेरे लिए असह्य
है । तुमसे दूर रह कर मैं जिन्दा नहीं रह सकता, प्यारे बच्चे को देखने के लिए मैं
कितनी ही बार लालायित हो गया हूँ; पर यह आशा कैसे करुँ कि मेरी चरित्रहीनता का ऐसा
प्रत्यक्ष प्रमाण पाने के बाद तुम्हें मुझसे घृणा न हो गयी होगी ।
आनंदी – स्वामी, आप के मन में ऐसी बातों का आना मुझ पर घोर अन्याय है । मैं ऐसी
बुद्धिहीन नहीं हूँ कि केवल अपने स्वार्थ के लिए आपको कलंकित करूँ । मैं आपको अपना
इष्टदेव समझती हूँ और सदैव समझूँगी । मैं भी अब आपके वियोग-दुःख को नहीं सह सकती ।
कभी-कभी आपके दर्शन पाती रहूँ, यही जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा है ।
इस घटना को पंद्रह वर्ष बीत गये हैं । लाला गोपीनाथ नित्य बारह बजे रात को आनंदी के
साथ बैठे हुए नजर आते हैं । वह नाम पर मरते हैं, आनंदी प्रेम पर । बदनाम दोनों,
लेकिन आनंदी के साथ लोगों की सहानुभूति है, गोपीनाथ सबकी निगाह से गिर गये हैं ।
हाँ, उनके कुछ आत्मीयगण इस घटना को केवल मानुषीय समझ कर अब भी उनका सम्मान
करते हैं; किंतु जनता इतनी सहिष्णु नहीं है ।

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रानी सारंधा

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अँधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती
थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियाँ । नदी के दाहिने तट पर एक टीला है । उस पर
एक पुराना बना दुर्ग बना हुआ है, जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है । टीले के
पूर्व की ओर छोटा-सा गाँव है । यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरदार के कीर्ति-
चिह्न हैं । शताब्दियाँ व्यतीत हो गयीं, बुँदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और
अस्त हुआ, मुसलमान आये और बुँदेला राजा उठे और गिरे–कोई गाँव, कोई इलाका ऐसा न
था, जो इन दुर्व्यवस्थाओं से पीड़ित न हो; मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-
पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ । यह उसका
सौभाग्य था ।
अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था । वह जमाना ही ऐसा था जब मनुष्यमात्र को अपने बाहु-बल
और पराक्रम ही का भरोसा था । एक ओर मुसलमान सेनाएँ पैर जमाये खड़ी रहती थीं, दूसरी
ओर बलवान राजा अपने निर्बल भाइयों का ग०ला९ घोंटने पर तत्पर रहते थे । अनिरुद्धसिंह
के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा, मगर सजीव दल था । इससे वह अपने कुल
और मर्यादा की रक्षा किया करता था । उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था । तीन
वर्ष पहले उसका विवाह शीतला देवी से हुआ था; मगर अनिरुद्ध विहार के दिन और विलास की
रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में । वह कितनी बार पति
से अनुरोध कर चुकी थी, कितनी बार उसके पैरों पर गिर कर रोई थी कि तुम मेरी आँखों से
दूर न हो, मुझे हरिद्वार ले चलो, मुझे तुम्हारे साथा बनवास अच्छा है, यह वियोग अब
नहीं सहा जाता । उसने प्यार से कहा, जिद से कहा, विनय की; मगर अनिरुद्ध बुँदेला
था । शीतला अपने किसी हथियार से उसे परास्त न कर सकी ।

(2)

अँधेरी रात थी । सारी दुनिया सोती थी, तारे आकाश में जागते थे । शीतला देवी पलँग पर
पड़ी करवटें बदल रही थी और उसकी ननद सारंधा फर्श पर बैठी हुई मधुर स्वर से गाती
थी– बिनु रघुवीर कटत नहिं रैन
शीतला ने कहा–जी न जलाओ । क्या तुम्हें भी नींद नहीं आती ?
सारंधा — तुम्हें लोरी सुना रही हूँ ।
शीतला मेरी आँखों से तो नींद लोप हो गई ।
सारंधा — किसी को ढूँढ़ने गयी होगी ।
इतने में द्वार खुला और एक गठै हुए बदन के रूपवान पुरुष ने भीतर प्रवेश किया । वह
अनिरुद्ध था । उसके कपड़े भींगे हुए थे और बदन पर कोई हथियार न था । शीतला चारपाई
से उतर कर जमीन पर बैठ गयी ।
सारंधा ने पूछा–भैया, यह कपड़े भींगे क्यों हैं ?
अनिरुद्ध – नदी तैर कर आया हूँ ।
सारंधा – हथियार क्या हुए ?
अनिरुद्ध – छिन गये ।
सारंधा — और साथ के आदमी ?
अनिरुद्ध – सब ने वीर-गति पायी ।
शीतला ने दबी जबान से कहा – ईश्वर ने ही कुशल किया; मगर सारंधा के तीवरों पर बल पड़
गये और मुख-मंडल गर्व से सतेज हो गया । बोली–भैया, तुमने कुल की मर्यादा खो दी ऐसा
कभी न हुआ था ।
सारंधा भाई पर जान देती थी । उसके मुँह से यह धिक्कार सुनकर अनिरुद्ध लज्जा और खेद
से विकल हो गया । वह वीराग्नि जिसे क्षण भर के लिए अनुराग ने दबा लिया था, फिर
ज्वलंत हो गयी । वह उलटे पाँव लौटा और यह कह कर बाहर चला गया कि “सारंधा, तुमने
मुझे सदैव के लिए सचेत कर दिया । यह बात मुझे कभी न भूलेगी ।”
अँधेरी रात थी । आकाश -मंडल में तारों का प्रकाश बहुत धँधला था ।
अनिरुद्ध किले से बाहर निकला । पल भर में नदी के उस पार जा पहुँचा और फिर अंधकार
में लुप्त हो गया । शीतला उसके पीछे-पीछे किले की दीवारों तक आयी ; मगर जब अनिरुद्ध
छलाँग मार कर बाहर कूद पड़ा तो वह विरहिणी चट्टान पर बैठ कर रोने लगी ।
इतने में सारंधा भी वहीं आ पहुँची । शीतला ने नागिनकी तरह बल खा कर कहा-
मर्यादा इतनी प्यारी है ?
सारंधा — हाँ ।
शीतला — अपना पति होता तो हृदय में छिपा लेती ।
सारंधा — ना, छाती में छुरा चुभा देती ।
शीतला – ने ऐंठ कर कहा–चोली में छिपाती फिरोगी, मेरी गिरह में बाँध लो ।
सारंधा – जिस दिन ऐसा होगा, मैं भी अपना वचन पूरा कर दिखाऊँगी ।
इस घटना के तीन महीने पीछे अनिरुद्ध महरौनी को जीत करके लौटा और साल भर पीछे सारंधा
का विवाह ओरछा के राजा चम्पतराय से हो गया मगर उस दिन की बातें दोनों
महिलाओं के हृदय-स्थल में काँटे की तरह खटकती रही ।

(3)

राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे । सारी बुंदेला जाति उनके नाम पर जान देती
थी और उनके प्रभुत्व को मानती थीं । गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को
कर देना बंद कर दिया और वे अपने बाहु-बल से राज्य-विस्तार करने लगे । मुसलमानों
की सेवाएँ बार-बार उन पर हमले करती थीं , पर हार कर लौट जाती थीं ।
यही समय था जब अनिरुद्ध ने सारंधा का चम्पतराय से विवाह कर दिया । सारंधा ने
मुँह-माँगी मुराद पायी । उसकी यह अभिलाषा कि मेरा पति बुंदेला जाति का कुल-तिलक हो,
पूरी हुई । यद्यपि राजा के रनिवास में पाँच रानियाँ थीं मगर उन्हें शीघ्र ही मालूम
हो गया कि वह देवी, जो हृदय में मेरी पूजा करती है सारंधा है ।
परंतु कुछ ऐसी घटनाएँ हुई कि चम्पतराय को मुगल बादशाह का आश्रित होना पड़ा । वे
अपना राज्य अपने भाई पहाड़सिंह को सौंप कर देहली चले गये । यह शाहजहाँ के शासन
काल का अंतिम भाग था । शाहजादा दारा शिकोह राजकीय कार्यों को संभालते थे । युवराज
की आँखों में शील था और चित्त में उदारता । उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथाएँ
सुनी थीं, इसलिए उनका बहुत आदर-सम्मान किया और कालपी की बहुमूल्य जागीर उनको भेंट
की, जिसकी आमदनी नौ लाख थी । यह पहला अवसर था कि चम्पतराय को आये दिन के लड़ाई-
झगड़े से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग-विलास का प्राबल्य हुआ । रात-दिन आमोद-
प्रमोद की चर्चा रहने लगी । राजा विलास में डूबे, रानियाँ जड़ाऊँ गहनों पर रीझीं;
मगर सारंधा इन दिनों बहुत उदास और संकुचित रहती–वह इन रहस्यों में दूर-दूर रहती
ये नृत्य और गान की सभाएँ उसे सूनी प्रतीत होतीं ।
एक दिन चम्पतराय ने सारंधा से कहा–सारन, तुम उदास क्यों रहती हो ? मैं तुम्हें
कभी हँसते नहीं देखता । क्या मुझसे नाराज हो ?
सारंधा की आँखों में जल भर आया । बोली –स्वामी जी, आप क्यों ऐसा विचार करते हैं?
जहाँ आप प्रसन्न हैं, वहाँ मैं भी खुश हूँ ।
चम्पतराय – मैं जब से यहाँ आया हूँ, मैंने तुम्हारे मुख-कमल पर कभी मनोहारिणी
मुस्कराहट नहीं देखी । तुमने कभी अपने हाथों से मुझे बीड़ा नहीं खिलाया । कभी मेरी
पाग नहीं सँवारी । कभी मेरे शरीर पर शस्त्र नहीं सजाये । कहीं प्रेम-लता मुरझाने तो
नहीं लगी ?
सारंधा – प्राणनाथ, आप मुझसे ऐसी बात पूछते हैं, जिसका उत्तर मेरे पास नहीं है ।
यथार्थ में इन दिनों मेरा चित्त कुछ उदास रहता है । मैं बहुत चाहती हूँ कि खुश रहूँ
, मगर बोझ-सा हृदय पर धरा रहता है ।
चम्पतराय स्वयं आनंद में मग्न थे । इसलिए उनके विचार में सारंधा को असंतुष्ट रहने
का कोई उचित कारण नहीं हो सकता था । वे भौंहें सिकोड़ कर बोले–मुझे तुम्हारे उदास
रहने का कोई विशेष कारण नहीं मालूम होता । ओरछे में कौन-सा सुख था जो यहाँ नहीं
है ?
सारंधा का चेहरा लाल हो गया । बोली – मैं कुछ कहूँ, आप नाराज तो न होंगे ?
चम्पतराय – नहीं शौक से कहो ।
सारंधा – ओरछे में मैं एक राजा की रानी थी । यहाँ मैं एक जागीरदार की चेरी हूँ ।
ओरछे में वह थी जो अवध में कौशल्या थीं; यहाँ मैं बादशाह के एक सेवक की स्त्री
हूँ । जिस बादशाह के सामने आज आप आदर से सिर झुकाते हैं, वह कल आपके नाम से
काँपता था । रानी से चेरी हो कर भी प्रसन्नचित्त होना मेरे वश में नहीं है । आपने
यह पद और ये विलास की सामग्रियाँ बड़े महँगे दामों मोल ली हैं ।
चम्पतराय के नेत्रों पर से एक पर्दा-सा हट गया । वे अब तक सारंधा की आत्मिक उच्चता
को न जानते थे । जैसे वे माँ-बाप का बालक माँ की चर्चा सुनकर रोने लगता है, उसी तरह
ओरछे की याद से चम्पतराय की आँखें सजल हो गयीं । उन्होंने आदर युक्त अनुराग के साथ
सारंधा को हृदय से लगा लिया ।
आज से उन्हें फिर उसी उजड़ी बस्ती की फिक्र हुई, जहाँ से धन और कीर्ति की अभिलाषाएँ
खींच लायी थीं ।

(4)

माँ अपने खोये हुए बालक को पाकर निहाल हो जाती है । चम्पतराय के आने से बुंदेलखंड
निहाल हो गया । ओरछे के बाग जागे । नौबतें झड़ने लगीं और फिर सारंधा के कमल नेत्रों
में जातीय अभिमान का आभास दिखायी देने लगा !
यहाँ रहते रहते कई महीने बीत गये । इसी बीच में शाहजहाँ बीमार पड़ा । पहले से
ईर्ष्या की अग्नि दहक रही थी । यह खबर सुनते ही ज्वाला प्रचंड हुई । संग्राम की
तैयारियाँ होने लगीं । शाहजादा मुराद और मुहीउद्दीन अपने अपने दल सजा कर दक्खिन से
चले । उर्वरा भूमि रंग-बिरंगेरूप भर कर अपने सौदर्य को दिखाती थी ।
मुराद और मुहीउद्दीन उमंगों से भरे हुए कदम बढ़ाते चले आते थे । यहाँ तक कि वे
धौलपुर के निकट चम्बल के तट पर आ पहुँचे; परंतु यहाँ उन्होंने बादशाही सेना को अपने
अपने शुभागमन के निमित्त तैयार पाया ।
शाहजादे अब बड़ी चिंता में पड़े । सामने अगम्य नदी लहरें मार रही थी, किसी योगी के
त्याग के सदृश । विवश हो कर चम्पतराय के पास संदेश भेजा कि खुदा के लिए आ कर हमारी
डूबती हुई नाव को पार लगाइए ।
राजा ने भवन में जा कर सारंधा से पूछा–इसका क्या उत्तर दूँ ?
सारंधा – आपको मदद करनी होगी ।
चम्पतराय – उनकी मदद करना दारा शिकोह से वैर लेना है ।
सारंधा – यह सत्य है ; परंतु हाथ फैलाने की मर्यादा भी तो निभानी चाहिए ।
चम्पतराय – प्रिये तुमने सोचकर जवाब नहीं दिया ।
सारंधा – प्राणनाथ , मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि यह मार्ग कठिन है । और अब हमें
अपने योद्धाओं का रक्त पानी के समान बहाना पड़ेगा; परंतु हम अपना रक्त बहायेंगे और
चम्बल की लहरों को लाल कर देंगे । विश्वास रखिए कि जब तक नदी की धारा बहती रहेगी
वह हमारे वीरों का कीर्ति गान करती रहेगी । जब तक बुंदेलों का एक भी नामलेवा रहेगा,
ये रक्त बिंदु उसके माथे पर केशर का तिलक बन कर चमकेंगे ।
वायुमंडल में मेघराज की सेनाएँ उमड़ रही थी । ओरछे के किले से बुंदेलों की एक काली
घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली । प्रत्येक सिपाही वीररस से झूम रहा था ।
सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा दे कर कहा-
बुंदेलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है ।
आज उसका एक एक अंग मुस्करा रहा है और हृदय हुलसित है । बुंदेलों की यह सेना देख
शाहजादे फूले न समाये । राजा वहाँ की अंगुल-अंगुल भूमि से परचित थे । उन्होंने
बुंदेलों को तो एक आड़ में छिपा दिया और वे शाहजादों की फौज को सजा कर नदी के
किनारे-किनारे पश्चिम किसी ओर चले । दारा शिकोह को भ्रम हुआ कि शत्रु किसी अन्य घाट
से नदी उतरना चाहता है । उन्होंने घाट पर से मोर्चे हटा लिए । घाट में बैठे हुए
बुंदेले उसी ताक में थे । बाहर निकल पड़े और उन्होंने तुरंत ही नदी में घोड़े डाल
दिये ।
चम्पतराय ने शाहजादा दारा शिकोह को भुलावा देकर अपनी फौज घुमा दी और वह
बुंदेलों के पीछे चलता हुआ उस पार उतार लाया । इस कठिन चाल में सात घंटों का विलंब
हुआ; परंतु जाकर देखा तो सात सौ बुंदेलों की लाशें तड़प रही थीं ।
राजा को देखते ही बुंदेलों की हिम्मत बँध गयी । शाहजादों की सेना ने भी `अल्लाहों
अकबर’ की ध्वनि के साथ धावा किया । बादशाही सेना में हलचल पड़ गयी । उनकी
पंक्तियाँ छिन्न-भिन्न हो गयी, हाथों हाथ लड़ाई होने लगी, यहाँ तक कि शाम हो गयी ।
रणभूमि रुधिर से लाल हो गयी और आकाश में अँधेरा हो गया । घमासान की मार हो रही
थी । बादशाही सेना शाहजादों को दबाये आती थी । अकस्मात् पश्चिम से फिर बुंदेलों की
एक लहर उठी और वेग से बादशाही सेना की पुश्त पर टकरायी कि उसके कदम उखड़
गये । जीता हुआ मैदान हाथ से निकल गया । लोगों को कुतूहल था कि यह दैवी सहायता
कहाँ से आयी ।
सरल स्वभाव के लोगों की धारण थी कि यह फतह के फरिश्ते हैं, शाहजादों की मदद के लिए
आये हैं ; परन्तु जब राजा चम्पतराय निकट गये तो सारंधा ने घोड़े से उतर कर उनके
पैरों पर सिर झुका दिया । राजा को असीम आनंद हुआ । यह सारंधा थी ।
समर-भूमि का दृश्य इस समय अत्यंत दुःखमय था । थोड़ी देर पहले जहाँ सजे हुए वीरों के
दल थे वहाँ अब बेजान लाशें तड़प रही थीं । मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए अनादि काल
से ही भाइयों की हत्या की है ।
अब विजयी सेना लूट पर टूट पड़ी । पहले मर्द मर्दों से लड़ते थे । वीरता और पराक्रम
का चित्र था, यह नीचता और दुर्बलता की ग्लानिप्रद तस्वीर थी । उस समय मनुष्य पशु
बना हुआ था, अब वह पशु से भी बढ़ गया था ।
इस नोच-खसोट में लोगों को बादशाही सेना के सेनापति वली बहादुरखाँ की लाश दिखायी
दी । उसके निकट उसका घोड़ा खड़ा हुआ अपनी दुम से मक्खियाँ उड़ा रहा था । राजा
को घोड़ों का शौक था । देखते ही वह उस पर मोहित हो गया । यह एराकी जाति का
अति सुंदर घोड़ा था । एक एक अंग साँचे में ढला हुआ, सिंह की-सी छाती; चीते की-सी
कमर, उसका यह प्रेम और स्वामि-भक्ति देखकर लोगों को बड़ा कुतूहल हुआ ।
राजा ने हुक्म दिया– खबरदार ! इस प्रेमी पर कोई हथियार न चलाये, इसे जीता पकड़
लो,यह मेरे अस्तबल की शोभा बढ़ायेगा । जो इसे मेरे पास ले आयेगा, उसे धन से निहाल
कर दूँगा ।
योद्धागण चारों ओर से लपके; परंतु किसी को साहस न होता था कि उसके निकट जा सके ।
कोई चुमकार रहा था, कोई फंदे में फँसाने की फिक्र में था पर कोई उपाय सफल न होता
था । वहाँ सिपाहियों का मेला-सा लगा हुआ था ।
तब सारंधा अपने खेमे से निकली और निर्भय हो कर घोड़े के पास चली गयी । उसकी आँखों
में प्रेम का प्रकाश था, छल का नहीं । घोड़े ने सिर झुका दिया । रानी ने उसकी गर्दन
पर हाथ रखा और वह उसकी पीठ सहलाने लगी । घोड़े ने उसके अंचल में मुँह छिपा लिया ।
रानी उसकी रास पकड़ कर खेमे की ओर चली । घोड़ा इस तरह चुपचाप उसके पीछे चला मानो
सदैव से उसका सेवक है ।
पर बहुत अच्छा होता कि घोड़े ने सारंधा से भी निष्ठुरता की होती । यह सुन्दर घोड़ा
आगे चलकर इस राज-परिवार के निमित्त स्वर्ण-जटित मृग साबित हुआ ।

(5)

संसार एक रणक्षेत्र है । इस मैदान में उसी सेनापति का विजय-लाभ होता है, जो अवसर
को पहचानता है । वह अवसर पर जितने उत्साह से आगे बढ़ता है, उतने ही उत्साह से
आपत्ति के समय पीछे हट जाता है । वह वीर पुरुष राष्ट्र का निर्माता होता है और
इतिहास उसके नाम पर यश के फलों कि वर्षा करता है ।
पर इस मैदान में कभी कभी ऐसे सिपाही भी जाते हैं, जो अवसर पर कदम बढ़ाना जानते हैं,
लेकिन संकट ,में पीछे हटाना नहीं जानते । ये रणवीर पुरुष विजय को नीति की भेंट कर
देते हैं । वे अपनी सेना का नाम मिटा देंगे, किंतु जहाँ एक बार पहुँच गये हैं, वहाँ
से कदम पीछे न हटायेंगे । उनमें कोई बिरला ही संसार-क्षेत्र में विजय प्राप्त करता
है, किंतु प्रायः उसकी हार विजय से भी अधिक गौरवात्मक होती है । अगर अनुभवशील
सेनापति राष्ट्रों की नींव डालता है, तो आन पर जान देनेवाला, मुँह न मोड़नेवाला
सिपाही राष्ट्र के भावों को उच्च करता है, और उसके हृदय पर नैतिक गौरव को अंकित
कर देता है ।
उसे इस कार्यक्षेत्र में चाहे सफलता न हो, किंतु जब किसी वाक्य या सभा में उसका नाम
जबान पर आ जाता है, तो श्रोतागण एक स्वर से उसके कीर्ति-गौरव को प्रतिध्वनित कर
देते हैं । सारंधा ‘आन पर जान देनेवालों’ में थी ।
शाहज़ादा मुहीउद्दीन चम्बल के किनारे से आगरे की ओर चला तो सौभाग्य उसके सिर पर
मोर्छल हिलाता था । जब वह आगरे पहुँचा तो विजयदेवी ने उसके लिए सिंहासन सजा दिया ।
औरंगजेब गुणज्ञ था । उसने बादशाही सरदारों के अपराध क्षमा कर दिये, उनके राज्य-पद
लौटा दिये और राजा चम्पतराय को उसके बहुमूल्य कृत्यों के उपलक्ष्य में बारह हजारी
मन्सब प्रदान किया । ओरछा से बनारस और बनारस से जमुना तक उसकी जागीर नियत
की गयी । बुँदेला राजा फिर राज्य-सेवक बना, वह फिर सुख-विलास में डूबा और रानी
सारंधा फिर पराधीनता के शोक से घुलने लगी ।
वली बहादुर खाँ बड़ा वाक्य-चतुर मनुष्य था । उसकी मृदता ने शीघ्र ही उसे बादशाह आलम
गीर का विश्वासपात्र बना दिया । उस पर राज्य-सभा में सम्मान की दृष्टि पड़ने लगी ।
खाँ साहब के मन में अपने घोड़े के हाथ से निकल जाने का बड़ा शोक था । एक दिन कुँवर
छत्रसाल उसी घोड़े पर सवार हो कर सैर को गया था । वह खाँ साहब के महल की तरफ जा
निकला । वली बहादुर ऐसे ही अवसर की ताक में था । उसने तुरंत अपने सेवकों को इशारा
किया । राजकुमार अकेला क्या करता ? पाँव पाँव घर आया और उसने सारंधा से सब समाचार
बयान किया । रानी का चेहरा तमतमा गया । बोली, “मुझे इसका शोक नहीं कि घोड़ा हाथ से
गया, शोक इसका है कि तू उसे खो कर जीता क्यों लौटा ? क्या तेरे शरीर में बुँदेलों
का रक्त नहीं है ? घोड़ा न मिलता, न सही, किन्तु तुझे दिखा देना चाहिए था कि एक
बुंदेला बालक से उसका घोड़ा छीन लेना हँसी नहीं है ।”
यह कह कर उसने अपने पच्चीस योद्धाओं को तैयार होने की आज्ञा दी । स्वयं अस्त्र
धारण किये और योद्धाओं के साथ वली बहादुर खाँ के निवास-स्थान पर जा पहुँची । खाँ
साहब उसी घोड़े पर सवार हो कर दरबार चले गये थे, सारंधा दरबार की तरफ चली, और
एक क्षण में किसी वेगवती नदी के सदृश बादशाही दरबार के सामने जा पहुँची, वह कैफियत
देखते ही दरबार में हलचल मच गयी । अधिकारी वर्ग इधर-उधर से आ कर जमा हो गये ।
आलमगीर भी सहन में निकल आये । लोग अपनी अपनी तलवारें सँभालने लगे और चारों
तरफ शोर मच गया । कितने ही नेत्रों ने इसी दरबार में अमरसिंह की तलवार की चमक देखी
थी । उन्हें वही घटना फिर याद आ गयी ।
सारंधा ने उच्च स्वर से कहाँ – खाँ साहब बड़ी लज्जा की बात है, आपने वही वीरता, जो
चम्बल के तट पर दिखाना चाहिए थी, आज एक अबोध बालक के सम्मुख दिखायी है । क्या
यह उचित था कि आप उससे घोड़ा छीन लेते ?
वली वहादुर खाँ की आँखों से अग्नि-ज्वाला निकल रही थी । वे कड़ी आवाज-से बोले-किसी
गैर को क्या मजाल कि है कि मेरी चीज अपने काम में लाये ?
रानी – वह आपकी चीज नहीं, मेरी है । मैंने उसे रण-भूमि में पाया है और उस पर मेरा
अधिकार है । क्या रण-नीति की इतनी मोटी बात भी आप नहीं जानते ?
खाँ साहब – वह घोड़ा मैं नहीं दे सकता, उसके बदले में सारा अस्तबल आपकी नजर है ।
रानी – मैं अपना घोड़ा लूँगी ।
खाँ साहब – मैं उसके बराबर जवाहरात दे सकता हूँ; परन्तु घोड़ा नहीं दे सकता !
रानी – तो फिर इसका निश्चय तलवार से होगा । बुंदेला योद्धाओं ने तलवारें सौंत लीं
और निकट था कि दरबार की भूमि रक्त से प्लावित हो जाय, बादशाह आलमगीर ने बीच
में आकर कहा – रानी साहबा, आप सिपाहियों को रोकें । घोड़ा मिल जायगा; परंतु इसका
मूल्य देना पड़ेगा ।
रानी – मैं उसके लिए अपना सर्वस्व खोने को तैयार हूँ ।
बादशाह – जागीर और मन्सतब कोई चीज नहीं ।
बादशाह – अपना राज्य भी ?
रानी – हाँ, राज्य भी ।
बादशाह – एक घोड़े के लिए ?
रानी – नहीं, उस पदार्थ के लिए जो संसार में सबसे अधिक मूल्यवान है ।
बादशाह – वह क्या है ?
रानी – अपनी आन ।
इस भाँति रानी ने अपने घोड़े के लिए अपनी विस्तृत जागीर, उच्च राज और राज-सम्मान सब
हाथ से खोया और केवल इतना ही नहीं, भविष्य के लिए काँटे बोये, इस घड़ी से अंत दशा
तक चम्पतराय को शांति न मिली ।

(6)

राजा चम्पतराय ने फिर ओरछे के किले में पदार्पण किया ।उन्हें मन्सब और जागीर के हाथ
से निकल जाने का अत्यन्त शोक हुआ; किंतु उन्होंने अपने मुँह से शिकायत का एक शब्द
भी नहीं निकाला, वे सारंधा के स्वभाव को भली-भाँति जानते थे । शिकायत इस समय उसके
आत्म-गौरव पर कुठार का काम करती । कुछ दिन यहाँ शांतिपूर्वक व्यतीत हुए; लेकिन
बादशाह सारंधा की कठोर बात भूला न था, वह क्षमा करना जानता ही न था । ज्यों ही
भाइयों की ओर से निश्चिंत हुआ, उसने एक बड़ी सेना चम्पतराय का गर्व चूर्ण करने के
लिए भेजी और बाईस अनुभवशील सरदार इस मुहीम पर नियुक्त किये ।
शुभकरण बुँदेला बादशाह का सूबेदार था । वह चम्पतराय का बचपन का मित्र और सहपाठी था
उसने चम्पतराय को परास्त करने का बीड़ा ऊठाया । और भी कितने ही बुँदेला सरदार राजा
से विमुख हो कर बादशाही सूबेदार से आ मिले ।एक घोर संग्राम हुआ । भाइयों की तलवारें
रक्त से लाल हुई । यद्यपि इस समर में राजा को विजय प्राप्त हुई लेकिन उसकी शक्ति
सदा के लिए क्षीण हो गयी । निकटवर्ती बुँदेला राजा जो चम्पतराय के बाहुबल थे,
बादशाह के कृपाकांक्षी बन बैठे । साथियों में कुछ तो काम आये, कुछ दगा कर गये ।
यहाँ तक कि निज संबंधियों ने भी आँखें चुरा लीं, परंतु इन कठिनाइयों में भी
चम्पतराय ने हिम्मत नहीं हारी,
धीरज को न छोड़ा । उन्होंने ओरछा छोड़ दिया और वे
तीन वर्ष तक बुंदेलखंड के सघन पर्वतों पर छिपे फिरते रहे । बादशाही सेनाएँ शिकारी
जानवरों की भाँति सारे देश में मँडरा रही थीं । आये दिन राजा का किसी न किसी से
सामना हो जाता था । सारंधा सदैव उनके साथ रहती और उनका साहस बढ़ाया करती ।
बड़ी बड़ी आपत्तियों में जब कि धैर्य लुप्त हो जाता–और आशा साथ छोड़ देती-आत्म
रक्षा का धर्म उसे सँभाले रहता था । तीन साल के बाद अंत में बादशाह के सूबेदार ने
आलमगीर को सूचना दी कि इस शेर का शिकार आपके सिवाय और किसी से न होगा । उत्तर
आया कि सेना को हटा लो और घेरा उठा लो । राजा ने समझा, संकट से निवृत्ति हुई, पर वह
बात शीघ्र ही भ्रमात्मक सिद्ध हो गयी ।

(7)

तीन सप्ताह से बादशाही सेना ने ओरछा घेर रखा है । जिस तरह कठोर वचन हृदय को छेद
डालते हैं, उसी तरह तोपों के गोलों ने दीवार को छेद डाला है । किले में 20 हजार
आदमी घिरे हुए हैं, लेकिन उनमें से आधे से अधिक स्त्रियाँ और उनसे कुछ ही कम बालक
हैं ।मर्दों की संख्या दिनों-दिन न्यून होती जाती है । आने-जाने के मार्ग चारों तरफ
से बंद हैं । हवा का भी गुजर नहीं । रसद का सामान बहुत कम रह गया है । स्त्रियाँ
पुरषों और बालको को जीवित रखने के लिए आप उपवास करती हैं । लोग बहुत हताश हो रहे
हैं । औरतें सूर्यनारायण की ओर हाथ उठा उठा कर शत्रु को कोसती हैं । बालकवृन्द मारे
क्रोध के दीवार की आड़ से उन पर पत्थर फेंकते हैं, जो मुश्किल से दीवार के उस पार
जा पाते हैं । राजा चम्पतराय स्वयं ज्वर से पीड़ित हैं । उन्होंने कई दिन से चारपाई
नहीं छोड़ी । उन्हें देख कर लोगों को कुछ ढारस होता था , लेकिन उनकी बीमारी से सारे
किले में नैराश्य छाया हुआ है ।
राजा ने सारंधा से कहा – आज शत्रु किले में घुस आयेंगे ।
सारंधा – ईश्वर न करे कि इन आँखों से वह दिन देखना पड़े ।
राजा – मुझे बड़ी चिंता इन अनाथ स्त्रियों और बालकों की है । गेहूँ के साथ यह धुन
भी पिस जायेंगे ।
सारंधा – हम लोग यहाँ से निकल जायँ तो कैसा ?
राजा – इन अनाथों को छोड़ कर ?
सारंधा – इस समय इन्हें छोड़ देने में ही कुशल है । हम न होंगे तो शत्रु इन पर कुछ
दया ही करेंगे ।
राजा – नहीं यह लोग मुझसे नहीं छोड़े जायँगे । जिन मर्दों ने अपनी जान हमारी सेवा
में अर्पण कर दी है ,उनकी स्त्रियों और बच्चों को मैं कदापि नहीं छोड़ सकता ।
सारंधा – लेकिन यहाँ रह कर हम उनकी कुछ मदद भी तो नहीं कर सकते?
राजा – उनके साथ प्राण तो दे सकते हैं । मैं उनकी रक्षा में अपनी जान लड़ा दूँगा ।
उनके लिए बादशाही सेना की खुशामद करूँगा, कारावास की कठिनाइयाँ सहूँगा किंतु इस
संकट में उन्हें छोड़ नहीं सकता ।
सारंधा ने लज्जित हो कर सिर झुका लिया और सोचने लगी, निःस्संदेह प्रिय साथियों को
आग की आँच में छोड़ कर अपनी जान बचाना घोर नीचता है ! मैं ऐसी स्वार्थंता क्यों हो
गई हूँ ? लेकिन एकाएक विचार उत्पन्न हुआ । बोली–यदि आपको विश्वास हो जाय कि इन
आदमियों के साथ कोई अन्याय न किया जायगा तब तो आपको चलने में कोई बाधा न होगी ?
राजा – (सोच कर) कौन विश्वास दिलायेगा ?
सारंधा – बादशाह के सेनापति का प्रतिज्ञा-पत्र ।
राजा – हअँ, तब मैं सानंद चलूँगा ।
सारंधा विचार-सागर में डूबी । बादशाह के सेनापति से क्योंकर यह प्रतिज्ञा कराऊँ ?
कौन यह प्रस्ताव लेकर वहा जायगा और निर्दयी ऐसी प्रतिज्ञा करने ही क्यों लगे ।
उन्हें तो अपनी विजय की पूरी आशा है । मेरे यहाँ ऐसा नीति-कुशल, वाक्पटु चतुर कौन
है जो इस दुस्तर कार्य को सिद्ध करे ? छत्रसाल चाहे तो कर सकता है । उसमें ये सब
गुण मौजूद हैं ।
इस तरह मन में निश्चय करके रानी ने छत्रसाल को बुलाया । यह उसके चारों पुत्रों में
सबसे बुद्धिमान और साहसी था । रानी उसे सबसे अधिक प्यार करती थीं । जब छत्रसाल ने
आकर रानी को प्रणाम किया तो उनके कमल नेत्र सजल हो गये और हृदय से दीर्घ निःश्वास
निकल गया ।
छत्रसाल – माता, मेरे लिए क्या आज्ञा है ?
रानी – आज लड़ाई का क्या ढंग है ?
छत्रसाल – हमारे पचास योद्धा अब तक काम आ चुके हैं ।
रानी – बुंदेलों की लाज अब ईश्वर के हाथ है ।
छत्रसाल – हम आज रात को छापा मारेंगे ।
रानी ने संक्षेप में अपना प्रस्ताव छत्रसाल के सामने उपस्थित किया और कहा–यह काम
किसे सौंपा जाय ।
छत्रसाल – मुझको ।
`तुम उसे पूरा कर दिखाओगे ?’
हाँ , मुझे पूर्ण विश्वास है ।
`अच्छा जाओ, परमात्मा तुम्हारा मनोरथ पूरा करे ।’
छत्रसाल जब चला तो रानी ने उसे हृदय से लगा लिया और तब आकाश की ओर दोनों हाथ उठा
कर कहा–दयानिधि ,मैंने अपना तरुण और होनहार पुत्र बुंदेलों की आन के आगे भेंट कर
दिया । अब इस आन को निभाना तुम्हारा काम है । मैंने बड़ी मूल्यवान वस्तु अर्पित की
है, इसे स्वीकार करो ।

(8)

दूसरे दिन प्रातःकाल सारंधा स्नान करके थाल में पूजा की सामग्री लिये मंदिर की ओर
चली । उसका चेहरा पीला पड़ गया था और आँखों तले अँधेरा छाया जाता था । वह मंदिर
के द्वार पर पहुँची थी कि उसके थाल में बाहर से आ कर एक तीर गिरा । तीर की नोक पर
एक कागज का पुरजा लिपटा हुआ था । सारंधा ने थाल मंदिर के चबूतरे पर रख दिया और
पुर्जे को खोल कर देखा तो आनंद से चेहरा खिल गया; यह आनंद क्षण-भर का था । हाय !
इस पुर्जे के लिए मैंने अपना प्रिय पुत्र हाथ से खो दिया है । कागज के टुकड़े को
इतने महँगे दामों किसने लिया होगा ?
मंदिर से लौट कर सारंधा राजा चम्पतराय के पास गयी और बोली–`प्राणनाथ, आपने
जो वचन दिया था उसे पूरा कीजिए ।’
राजा ने चौंक कर पूछा, “तुमने अपना वादा पूरा कर दिया ?” रानी ने वह प्रतिज्ञापत्र
राजा को दे दिया । चम्पतराय ने उससे गौरव से देखा फिर बोले–अब मैं चलूँगा और ईश्वर
ने चाहा तो एक बार फिर शत्रुओं की खबर लूँगा । लेकिन सारन, सच बताओ, इस पत्र के
लिए क्या देना पड़ा है ?
रानी ने कुंठित स्वर से कहा – बहुत कुछ ।
राजा –सुनूँ ?
रानी — एक जवान पुत्र ।
राजा को बाण-सा लगा । पूछा — कौन ? अंगदराय ?
रानी – नहीं ।
राजा – रतनसाह ?
रानी – नहीं ।
राजा – छत्रसाल ?
रानी – हाँ ।
जैसे कोई पक्षी गोली खा कर परों को फड़फड़ाता है और तब बेदम हो कर गिर पड़ता है,
उसी भाँति चम्पतराय पलँग से उछले और फिर अचेत हो कर गिर पड़े । छत्रसाल उनका
परम प्रिय पुत्र था । उनके भविष्य की सारी कामनाएँ उसी पर अवलंबित थीं । जब चेत हुआ
तब बोले, `सारन तुमने बुरा किया ।’
अँधेरी रात थी । रानी सारंधा घोड़े पर सवार चम्पतराय को पालकी में बैठाये किले के
गुप्त मार्ग से निकली जाती थी । आज से बहुत काल पहले एक दिन ऐसी ही अँधेरी दुःखमयी
रात्रि थी । तब सारंधा ने शीतलादेवी को कुछ कठोर वचन कहे थे । शीतलादेवी ने उस समय
जो भविष्यवाणी की थी, वह आज पूरी हुई । क्या सारंधा ने उसका जो उत्तर दिया था, वह
भी पूरा हो कर रहेगा ?

(9)

मध्याह्न था । सूर्यनारायण सिर पर आ कर अग्नि की वर्षा कर रहे थे । शरीर को झुलसाने
वाली प्रचंड, प्रखर वायु वन और पर्वत में आग लगाती फिरती थी । ऐसा विदित होता था,
मानो अग्निदेव की समस्त सेना गरजती हुई चली आ रही है ।
गगन-मंडल इस भय से काँप रहा था । रानी सारंधा घोड़े पर सवार चम्पतराय को लिये ,
पश्चिम की तरफ चली जाती थी । ओरछा दस कोस पीछे छूट चुका था और प्रतिक्षण यह
अनुमान स्थिर होता जाता था कि अब हम भय के क्षेत्र से बाहर निकल आये । राजा पालकी
में अचेत पड़े हुए थे और कहार पसीने में सराबोर थे । पालकी के पीछे पाँच सवार घोड़ा
बढ़ाये चले आते थे, प्यास के मारे सबका बुरा हाल था । तालु सूखा जाता था । किसी
वृक्ष की छाँह और कुएँ की तलाश में आँखे चारों ओर दौड़ रही थी ।
अचानक सारंधा ने पीछे की तरफ फिर कर देखा, तो उसे सवारों का एक दल आता हुआ दिखायी
दिया ।उसका माथा ठनका कि अब कुशल नहीं है । यह लोग अवश्य हमारे शत्रु हैं । फिर
विचार हुआ कि शायद मेरे राजकुमार अपने आदमियों को लिये हमारी सहायता को आ रहे हैं ।
नैराश्य में भी आशा साथ नहीं छोड़ती । कई मिनट तक वह इसी आशा और भय की अवस्था में
रही ।यहाँ तक कि वह दल निकट आ गया और सिपाहियों के वस्त्र साफ नजर आने लगे ।
रानी ने एक ठंडी साँस ली, उसका शरीर तृणवत् काँपने लगा । यह बादशाही सेना के लोग
थे !
सारंधा ने कहारों से कहा — डोली रोक लो बुँदेला सिपाहियों ने भी तलवारें खींच
लीं । राजा की अवस्था बहुत शोचनीय थी; किन्तु जैसे दबी हुई आग हवा लगते ही प्रदीप्त
हो जाती है, उसी प्रकार इस संकट का ज्ञान होते ही उनके जर्जर शरीर में वीरात्मा चमक
उठी । वे पालकी का पर्दा उठा कर बाहर निकल आये । धनुष-बाण हाथ में लिया; किंतु वह
धनुष जो उनके हाथ में इंद्र का वज्र बन जाता था, इस समय जरा भी न झुका । सिर में
चक्कर आया, पैर थर्राये और वे धरती पर गिर पड़े । भावी अमंगल की सूचना मिल गयी ।
उस पंखरहित पक्षी के सदृश, जो साँप को अपनी तरफ आते देखकर ऊपर को उचकता और
फिर गिर पड़ता है, राजा चम्पतराय फिर सँभल उठे और फिर गिर पड़े । सारंधा ने उन्हें
सँभाल कर बैठाया और रो कर बोलने की चेष्टा की, परंतु मुँह से केवल इतना निकला–
प्राणनाथ ! इसके आगे मुँह से एक शब्द भी न निकल सका । आन पर मरनेवाली सारंधा
इस समय साधारण स्त्रियों की भाँति शक्तिहीन हो गयी, लेकिन एक अंश तक यह निर्बलता
स्त्री जाति की शोभा है ।
चम्पतराय बोले–सारन, देखो, हमारा एक वीर जमीन पर गिरा । शोक ! जिस आपत्ति से
यावज्जीन डरता रहा, उसने इस अंतिम समय में आ घेरा ! मेरी आँखों के सामने शत्रु
तुम्हारे कोमल शरीर में हाथ लगायेंगे, और मैं जगह से हिल भी न सकूँगा । हाय मृत्यु
तू कब आयेगी ! यह कहते कहते उन्हें एक विचार आया । तलवार की तरफ हाथ बढ़ाया,
मगर हाथों में दम न था । तब सारंधा से बोले-प्रिये, तुमने किते ही अवसरों पर मेरी
आन निभायी है ।
इतना सुनते ही सारंधा के मुरझाये हुए मुख पर लाली दौड़ गयी । आँसू सूख गये । इस
आशा ने कि मैं पति के कुछ काम आ सकती हूँ, उसके हृदय में बल का संचार कर दिया ।
वह राजा की ओर विश्वासोत्पादक भाव से देख कर बोली–ईश्वर ने चाहा तो मरते दम तक
निभाऊँगी । रानी ने समझा, राजा मुझे प्राण देने का संकेत कर रहे हैं ।
चम्पतराय – तुमने मेरी बात कभी नहीं टाली ।
सारंधा – मरते दम तक न टालूँगी ।
राजा – यह मेरी अंतिम याचना है । इसे अस्वीकार न करना ।
सारंधा ने तलवार को निकाल कर अपने वक्षः स्थल पर रख लिया और कहा – यह आपकी
आज्ञा नहीं है । मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि मरूँ तो यह मस्तक आपके पद-कमलों पर
हो ।
चम्पतराय – तुमने मेरा मतलब नहीं समझा । क्या तुम मुझे इसलिए शत्रुओं के हाथ में
छोड़ जाओगी कि मैं बेड़ियाँ पहने हुए दिल्ली की गलियों में निंदा का पात्र बनूँ ?
रानी ने जिज्ञासा की दृष्टि से राजा को देखा । वह उनका मतलब न समझी ।
राजा – तुमसे एक वरदान माँगता हूँ ।
रानी – सहर्ष माँगिए ।
राजा – यह मेरी अंतिम प्रार्थना है । जो कुछ कहूँगा, करोगी ?
रानी – सिर के बल करूँगी ।
राजा – देखो, तुमने वचन दिया है । इनकार न करना !
रानी – (काँप कर) आपके कहने की देर है ।
राजा – अपनी तलवार मेरी छाती में चुभा दो ?
रानी – रानी के हृदय पर वज्राघात-सा हो गया । बोलो –जीवननाथ ! इसके आगे वह और
कुछ न बोल सकी । आँखों में नैराश्य छा गया ।
राजा – मैं बेड़ियाँ पहनने के लिए जीवित रहना नहीं चाहता ।
रानी – मुझसे यह कैसे होगा ?
पाचवाँ और अंतिम सिपाही धरती पर गिरा । राजा ने झुँझला कर कहा–इसी जीवन पर आन
निभाने का गर्व था ?
बादशाह के सिपाही राजा की तरफ लपके । राजा ने नैराश्यपूर्ण भाव से रानी की ओर
देखा । रानी क्षण भर अनिश्चित रूप से खड़ी रही; लेकिन संकट में हमारी निश्चयात्मक
शक्ति बलवान हो जाती है । निकट था कि सिपाही लोग राजा को पकड़ लें कि सारंधा
ने दामिनी की भाति लपक कर तलवार राजा के हृदय में चुभा दी ।
प्रेम की नाव प्रेम के सागर में डूब गयी । राजा के हृदय से रुधिर की धारा निकल रही
थी; पर चेहरे पर शांति छायी हुई थी ।
कैसा हृदय है ! वह स्त्री जो अपने पति पर प्राण देती थी आज उसकी प्राणघातिका है ।
जिस हृदय से आलिंगन होकर उसने यौवनसुख लूटा, जो हृदय उसकी अभिलाषाओं का केन्द्र
था,जो उसके अभिमान का पोषक था, उसी हृदय को सारंधा की तलवार छेद रही है ! किसी
स्त्री की तलवार से ऐसा काम हुआ है ?
आह ! आत्माभिमान का कैसा विषादमय अंत है । उदयपुर और मारवाड़ के इतिहास में भी
आत्म-गौरव की ऐसी घटनाएँ नहीं मिलतीं ।
बादशाही सिपाही सारंधा का यह साहस और धैर्य देखकर दंग रह गये ।
सरदार ने आगे बढ़कर कहा रानी साहिबा खुदा गवाह है, हम सब आपके गुलाम हैं । आपका
जो हुक्म हो, उसे ब-सरों चश्म बजा लायेंगे ।
सारंधा ने कहा – अगर हमारे पुत्रों में से कोई जीवित हो, तो ये दोनों लाशें उसे
सौंप देना ।
यह कहकर उसने वही तलवार अपने हृदय में चुभा ली । जब वह अचेत हो कर धरती
पर गिरी, तो उसका सिर राजा चम्पतराय की छाती पर था ।

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