मानसरोवर भाग 2

चकमा

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

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सेठ चंदूमल जब अपनी दूकान और गोदाम में भरे हुए माल को देखते तो मुँह से ठंडी साँस
निकल जाती । यह माल कैसे बिकेगा ? बैंक का सूद बढ़ रहा है, दूकान का किराया चढ़
रहा है, कर्मचारियों का वेतन बाकी पड़ता जाता है । ये सभी रकमें गाँठ से देनी
पड़ेंगी । अगर कुछ दिन यही हाल रहा तो दिवाले के सिवा और किसी तरह जान न बचेगी ।
तिस पर भी धरनेवाले नित्य सिर पर शैतान की तरह सवार रहते हैं ।
सेठ चंदूमल की दूकान चाँदनी चौक, दिल्ली में थी । मुफस्सिल में भी कई दूकानें थीं ।
जब शहर काँग्रेस कमेटी ने उनसे बिलायती कपड़े की खरीद और बिक्री के विषय में
प्रतिज्ञा करानी चाही तो उन्होंने कुछ ध्यान न दिया । बाजार के कई आढ़तियों ने उनकी
देखा-देखी प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया । चंदूमल को जो
नेतृत्व कभी न नसीब हुआ था, वह इस अवसर पर बिना हाथ-पैर हिलाये ही मिल गया ।
वे सरकार के खैरख्वाह थे । साहब बहादुरों को समय-समय पर डालियाँ नजर देते थे ।
पुलिस से भी घनिष्ठता थी । म्युनिसिपैलिटी के सदस्य भी थे । काँग्रेस के व्यापारिक
कार्य-क्रम का विरोध करके अमनसभा के कोषाध्यक्ष बन बैठे । यह इसी खैरख्वाही की
बरकत थी । युवराज का स्वागत करने के लिए अधिकारियों ने उनसे 25 हजार के कपड़े
खरीदे । ऐसा सामर्थी पुरुष काँग्रेस, है किस खेत की मूली ? पुलिसवालों ने भी बढ़ावा
दिया -“मुआहिदे पर हरगिज दस्तखत न कीजिएगा ।” लाला जी के हौसले बढ़े । उन्होंने
काँग्रेस से लड़ने की ठान ली । उसी के फलस्वरूप तीन महीनों से उसकी दूकान पर
प्रातःकाल से 9 बजे रात तक पहरा रहता था । पुलिस-दलों ने उनकी दूकान पर वालंटियरों
को कई बार गालियाँ दीं, कई बार पीटा, खुद सेठ जी ने भी कई बार उन पर बाण चलाये,
किंतु पहरेवाले किसी तरह न टलते थे । बल्कि इन अत्याचारों के कारण चंदूमल का बाजार
और भी गिरता जाता ।
मुफस्सिल की दूकानों से मुनीम लोग और भी दुराशाजनक समाचार
भेजते रहते थे । कठिन समस्या थी । इस संकट से निकलने का कोई उपाय न था । वे
देखते थे कि जिन लोगों ने प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये हैं वे चोरी-छिपे
कुछ-न-कुछ विदेशी माल बेच लेते हैं । उनकी दूकानों पर पहरा नहीं बैठता । यह सारी
विपत्ति मेरे ही सिर पर है ।
उन्होंने सोचा, पुलिस और हाकिमों की दोस्ती से मेरा भला क्या हुआ ? उनके हटाये ये
पहरे नहीं हटते । सिपाहियों की प्रेरणा से ग्राहक नहीं आते ! किसी तरह पहरे बंद हो
जाते तो सारा खेल बन जाता ।
इतने में मुनीम जी ने कहा – लाला जी, यह देखिए, कई व्यापारी हमारी तरफ आ रहे थे ।
पहरेवालों ने उनको न जाने क्या मंत्र पढ़ा दिया, सब चले जा रहे हैं ।
चंदूमल – अगर इन पापियों को कोई गोली मार देता तो मैं बहुत खुश होता । यह सब मेरा
सर्वनाश करके दम लेंगे ।
मुनीम – कुछ हेठी तो होगी, यदि आप प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर कर देते तो यह पहरा उठ
जाता । तब हम भी यह सब माल किसी न किसी तरह खपा देते ।
चंदूमल – मन में तो मेरे भी यह बात आती है, पर सोचो, अपमान कितना होगा ? इतनी
हेकड़ी दिखाने के बाद फिर झुका नहीं जाता । फिर हाकिमों की निगाहों में गिर
जाऊँगा । और लोग भी ताने देंगे कि चले थे बच्चा काँग्रेस से लड़ने ! ऐसी मुँह की
खाई कि होश ठिकाने आ गये । जिन लोगों को पीटा और पिटवाया, जिनको गालियाँ दीं,
जिनकी हँसी उड़ायी, अब उनकी शरण कौन मुँह ले कर जाऊँ ? मगर एक उपाय सूझ
रहा है । अगर चकमा चल गया तो पौ बारह है । बात तो तब है जब साँप को मारूँ, मगर
लाठी बचा कर । पहरा उठा दूँ, पर बिना किसी की खुशामद किये ।

(2)

नौ बज गये थे । सेठ चंदूमल गंगा-स्नान करके लौट आये थे और मसनद पर बैठ कर चिट्ठियाँ
पढ़ रहे थे । अन्य दूकानों के मुनीमों ने अपनी विपत्ति कथा सुनायी थी । एक एक पत्र
को पढ़ कर सेठ जी का क्रोध बढ़ता जाता था ।
इतने में दो वालंटियर झंडियाँ लिये हुए उनकी दूकान के सामने आ कर खड़े हो गये !
सेठ जी ने डाँट कर कहा–हट जाओ हमारी दूकान के सामने से ।
एक वालंटियर ने उत्तर दिया – महाराज, हम तो सड़क पर हैं । क्या यहाँ से भी चले
जायँ ।
सेठ जी – मैं तुम्हारी सूरत नहीं देखना चाहता ।
वालंटियर – तो आप काँग्रेस कमेटी को लिखिए । हमको तो वहाँ से यहाँ खड़े रह कर
पहरा देने का हुक्म मिला है ।
एक कान्सटेबिल ने आकर कहा – क्या है सेठ जी, यह लौंडा क्या टर्राता है ।
चंदूमल बोले – मैं कहता हूँ दूकान के सामने से हट जाओ, पर यह कहता है कि न हटेंगे,
न हटेंगे । जरा इसकी जबरदस्ती देखो ।
कान्सटेबिल – (वालंटियरों से) तुम दोनों यहाँ से जाते हो कि आकर गरदन नापूँ ?
वालंटियर – हम सड़क पर खड़े हैं, दूकान पर नहीं ।
कान्सटेबिल का अभीष्ट अपनी कारगुजारी दिखाना था । यह सेठ जी को खुश करके कुछ
इनाम-इकराम भी लेना चाहता था । उसने वालंटियरों को अपशब्द कहे और जब उन्होंने उसकी
कुछ परवा न की तो एक वालंटियर को इतने जोर से धक्का दिया कि वह बेचारा मुँह के बल
जमीन पर गिर पड़ा । कई वालंटियर इधर-उधर से आ कर जमा हो गये । कई सिपाही भी आ
पहुँचे । दर्शकवृन्द को ऐसी घटनाओं में मजा आता ही है । उनकी भीड़ लग गयी । किसी ने
हाँक लगायी `महात्मा गाँधी की जय’ औरों ने भी उसके सुर में सुर मिलाया, देखते देखते
एक जनसमूह एकत्रित हो गया ।
एक दर्शक ने कहा – क्या है लाला चंदूमल ? अपनी दूकान के सामने इन गरीबों की यह
दुर्गति करा रहे हो और तुम्हें जरा भी लज्जा नहीं आती ? कुछ भगवान का भी डर है या
नहीं ?
सेठजी ने कहा – मुझसे कसम ले लो जो मैंने किसी सिपाही से कुछ कहा हो । ये लोग अना
यास बेचारों के पीछे पड़ गये । मुझे सेंत में बदनाम करते हैं ।
एक सिपाही – लाला जी, आप ही ने तो कहा था कि ये वालंटियर मेरे ग्राहकों को छेड़ रहे
हैं । अब आप निकले जाते हैं ?
चंदूमल – बिलकुल झूठ, सरासर झूठ, सोलहों आना झूठ । तुम लोग अपनी कारगुजारी की
धुन में इनसे उलझ पड़े । यह बेचारे तो दूकान से बहुत दूर खड़े थे । न किसी से बोलते
थे, न चालते थे । तुमने जबरदस्ती ही इन्हें गरदनी देनी शुरू की । मुझे अपना सौदा
बेचना है कि किसी से लड़ना है ?
दूसरा सिपाही – लाला जी, हो बड़े होशियार । मुझसे आग लगवा कर आप अलग हो गये ।
तुम न कहते तो हमें क्या पड़ी थी कि इन लोगों को धक्के देते ? दारोगा जी ने भी हमको
ताकीद कर दी थी कि सेठ चन्दूमल की दूकान का विशेष ध्यान रखना । वहाँ कोई वालंटियर
न आये । तब हम लोग आये थे । तुम फरियाद न करते, तो दारोगा जी हमारी तैनाती ही
क्यों करते ?
चंदूमल – दारोगा जी को अपनी कारगुजारी दिखानी होगी । मैं उनके पास क्यों फरियाद
करने जाता ? सभी लोग काँग्रेस के दुश्मन हो रहे हैं । थाने वाले तो उनके नाम से
ही जलते हैं । क्या मैं शिकायत करता तभी तुम्हारी तैनाती करते ?
इतने में किसी ने थाने में इत्तिला दी कि चंदूमल की दूकान पर कांस्टेबिलों और
वालंटियरों में मारपीट हो गयी । काँग्रेस के दफ्तर में भी खबर पहुँची । जरा देर में
मय सशस्त्र पुलिस के थानेदार और इन्सपेक्टर साहब आ पहुँचे । उधर काँग्रेस के
कर्मचारी भी दल-बल सहित दौड़े । समूह और बढ़ा । बार-बार जयकार की ध्वनि
उठने लगी । काँग्रेस और पुलिस के नेताओं में वादविवाद होने लगा । परिणाम यह हुआ
कि पुलिसवालों ने दोनों को हिरासत में लिया और थाने की ओर चले ।
पुलिस अधिकारियों के चले जाने के बाद सेठ जी ने काँग्रेस के प्रधान से कहा- आज मुझे
मालूम हुआ कि ये लोग वालंटियरों पर इतना घोर अत्याचार करते हैं ।
प्रधान – तब तो दो वालंटियरों का फँसना व्यर्थ नहीं हुआ । इस विषय में अब तो आपको
कोई शंका नहीं है ? हम कितने लड़ाकू, कितने द्रोही, कितने शांतिभंगकारी हैं, यह तो
आपको खूब मालूम हो गया होगा ?
चंदूमल – जी हाँ, खूब मालूम हो गया ।
प्रधान – आपकी शहादत तो अवश्य ही होगी ।
चंदूमल – होगी तो मैं भी साफ-साफ कह दूँगा ; चाहे बने या बिगड़े । पुलिस की सख्ती
अब नहीं देखी जाती । मैं भी भ्रम में पड़ा हुआ था ।
मंत्री – पुलिसवाले आपको दबायेंगे बहुत ।
चंदूमल – एक नहीं, सौ दबाव पड़ें, मैं झूठ कभी न बोलूँगा । सरकार उस दरबार में
साथ न जायगी ।
मंत्री – अब तो हमारी लाज आपके हाथ है ।
चंदूमल – मुझे आप देश का द्रोही न पायेंगे ।
यहाँ से प्रधान और मंत्री तथा अन्य पदाधिकारी चले तो मंत्री जी ने कहा- आदमी सच्चा
जान पड़ता है ।
प्रधान -(संदिग्धभाव से) कल तक आप ही सिद्ध हो जायगा ।

(3)

शाम को इन्सपेक्टर-पुलिस ने लाला चंदूमल को थाने में बुलाया और कहा – आपको शहादत
देनी होगी । हम आपकी तरफ से बेफिक्र हैं ।
चंदूमल बोले – हाजिर हूँ ।
इन्स0 – वालंटियरों ने कान्स्टेबिलों को गालियाँ दीं ?
चंदू0 – मैंने नहीं सुनीं ।
इन्स0 – सुनी या न सुनी, यह बहस नहीं है । आपको यह कहना होगा वह सब खरीदारों
को धक्के दे कर हटा रहे थे, हाथा-पाई करते थे, मारने की धमकी देते थे , ये सभी
बातें कहनी होंगी । दारोगा जी, वह बयान लाइए जो मैंने सेठ जी के लिए लिखवाया है ।
चंदू0 – मुझसे भरी अदालत में झूठ न बोला जायगा । अपने हजारों जानने वाले अदालत में
होंगे । किस किस से मुँह छिपाऊँ ? कहीं निकलने को जगह भी चाहिए ?
इन्स0 – यह सब बातें निज के मुआमलों के लिए हैं । पोलिटिकल मुआमलों में झूठ-सच
शर्म और हया, किसी का भी खयाल नहीं किया जाता । चंदू – मुँह में कालिख लग जायगी ।
इन्स0 – सरकार की निगाह में इज्जत चौगुनी हो जायगी ।
चंदू 0 – (सोच कर) जी नहीं, गवाही न दे सकूँगा । कोई और गवाह बना लीजिए ।
इन्स0 – याद रखिए, यह इज्जत खाक में मिल जायगी ।
चंदू0 – मिल जाय; मजबूरी है ।
इन्स0 – अमन-सभा के कोषाध्यक्ष का पद छिन जायगा ।
चंदू 0 – उससे कौन रोटियाँ चलती हैं ?
इन्स0 – बंदूक का लाइसेंस छिन जायगा ।
चंदू0 – छिन जाय; बला से !
इन्स0 – इनकम टेक्स की जाँच फिर से होगी ।
चंदू 0 – जरूर कराइए । यह तो मेरे मन की बात हुई ।
इन्स 0 – बैठने को कुरसी न मिलेगी ।
चंदू0 – कुरसी ले कर चाटूँ ? दिवाला तो निकला जा रहा है ।
इन्स0 – अच्छी बात है । तशरीफ ले जाइए । कभी तो आप पंजे में आयेंगे ।

(4)

दूसरे दिन इसी समय काँग्रेस के दफ्तर में कल के लिए कार्यक्रम निश्चित किया जा रहा
था । प्रधान ने कहा– सेठ चंदूमल की दूकान पर धरना देने के लिए दो स्वयंसेवक भेजिए।
मंत्री – मेरे विचार में वहाँ अब धरना देने की कोई जरूरत नहीं ।
प्रधान – क्यों ? उन्होंने अभी प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर तो नहीं किये ?
मंत्री – हस्ताक्षर नहीं किये, पर हमारे मित्र अवश्य हो गये । पुलिस की तरफ से
गवाही न देना यही सिद्ध करता है । अधिकारियों का कितना दबाव पड़ा होगा, इसका
अनुमान किया जा सकता है । यह नैतिक साहस में परिवर्तन हुए बिना नहीं आ सकता ।
प्रधान – हाँ, कुछ परिवर्तन तो अवश्य हुआ है ।
मंत्री – कुछ नहीं महाशय ! पूरी क्रांति कहना चाहिए । आप जानते हैं, ऐसे मुआमलों
में अधिकारियों की अवहेलना करने का क्या अर्थ है ?
यह राजविद्रोह की घोषणा के समान है ! त्याग में संन्यास से इसका महत्व कम नहीं है ।
आज जिले के सारे हाकिम उनके खून के प्यासे हो रहे हैं । आश्चर्य नहीं कि गवर्नर
महोदय को भी इसकी सूचना दी गयी हो ।
प्रधान – और कुछ नहीं तो उन्हें नियम का पालन करने ही के लिए प्रतिज्ञा पत्र पर
हस्ताक्षर कर देना चाहिए था । किसी तरह उन्हें यहाँ बुलाइए । अपनी बात तो रह जाय ।
मंत्री – वह बड़ा आत्माभिमानी है, कभी न आयेगा । बल्कि हम लोगों की ओर से इतना
अविश्वास देख कर सम्भव है कि फिर उस दल में मिलने की चेष्टा करने लगे ।
प्रधान – अच्छी बात है, आपको उन पर इतना विश्वास हो गया है तो उनकी दूकान को छोड़
दीजिए । तब भी मैं यही कहूँगा कि आपको स्वयं मिलने के बहाने से उस पर निगाह रखनी
होगी ।
मंत्री – आप नाहक इतना शक करते हैं ।
नौ बजे सेठ चंदूमल अपनी दूकान पर आये तो वहाँ एक भी वालंटियर न था । मुख पर
मुस्कराहट की झलक आयी । मुनीम से बोले – कौड़ी चित्त पड़ी ।
मुनीम – मालूम तो होता है । एक महाशय भी नहीं आये ।
चंदूमल – न आये और न आयेंगे । बाजी अपने हाथ रही । कैसा दाँव खेला – चारों खाने
चित्त ।
चंदू0 – आप भी बातें करते हैं ? इन्हें दोस्त बनाते कितनी देर लगती है । कहिए, अभी
बुला कर जूतियाँ सीधी करवाऊँ । टके के गुलाम हैं, न किसी के दोस्त , न किसी के
दुश्मन । सच कहिए कैसा चकमा दिया है ?
मुनीम – बस, यही जी चाहता है कि आपके हाथ चूम लें । साँप भी मरा और लाठी भी न टूटी।
मगर काँग्रेस वाले भी टोह में होंगे ।
चंदूमल – तो मैं भी मौजूद हूँ । वह डाल-डाल चलेंगे, तो मैं पात-पात चलूँगा ।
विलायती कपड़े की गाँठ निकलवाइए और व्यापारियों को देना शुरू कीजिए । एक अठवारे
में बेड़ा पार है ।

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