मानसरोवर भाग 2

धोखा

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

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सतीकुंड में खिले हुए कमल वसंत के धीमे-धीमे झोंकों से लहरा रहे थे और प्रातःकाल की
मंद-मंद सुनहरी किरणें उनसे मिल-मिल कर मुस्कराती थीं । राजकुमारी प्रभा कुण्ड के
किनारे हरी-हरी घास पर खड़ी सुन्दर पक्षियों का कलरव सुन रही थी । उसका कनक वर्ण
तन इन्हीं फूलों की भाँति दमक रहा था । मानो प्रभात की साक्षात् सौम्य मूर्ति है,
जो भगवान अंशुमाली के किरणकरों द्वारा निर्मित हुई थी ।
प्रभा ने मौलसिरी के वृक्ष पर बैठी हुई एक श्यामा की ओर देख कर कहा- मेरा जी चाहता
है कि मैं भी एक चिड़िया होती ।
उसकी सहेली उमा ने मुस्करा कर पूछा – यह क्यों ?
प्रभा ने कुंड की ओर ताकते हुए उत्तर दिया – वृक्ष की हरी-भरी डालियों पर बैठी हुई
चहचहाती, मेरे कलरव से सारा बाग गूँज उठता ।
उमा ने छेड़ कर कहा – नौगढ़ की रानी ऐसी कितनी ही पक्षियों का गाना जब चाहे सुन
सकती है ।
प्रभा ने संकुचित हो कर कहा – मुझे नौगढ़ की रानी बनने की अभिलाषा नहीं है । मेरे
लिए किसी नदी का सुनसान किनारा चाहिए । एक बीणा और ऐसे ही सुन्दर सुहावने पक्षियों
के संगीत की मधुर ध्वनि में मेरे लिए सारे संसार का ऐश्वर्य भरा है ।
प्रभा का संगीत पर अपरिमित प्रेम था । वह बहुधा ऐसे ही सुख-स्वप्न देखा करती थी ।
उमा उत्तर देना ही चाहती थी कि इतने में बाहर से किसी के गाने की आवाज आयी–
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
प्रभा ने एकाग्र मन हो कर सुना और अधीर हो कर कहा – बहन, इस वाणी में जादू है ।
मुझसे अब बिना सुना नहीं रहा जाता, इसे भीतर बुला लाओ ।
उस पर भी गीत का जादू असर कर रहा था । वह बोली–निःसंदेह ऐसा राग मैंने आज तक
नहीं सुना, खिड़की खोल कर बुलाती हूँ ।
थोड़ी देर में रागिया भीतर आया — सुन्दर सजीले बदन का नौजवान था । नंगे पैर, नंगे
सिर, कंधे पर एक मृगचर्म, शरीर पर एक गेरुआ वस्त्र, हाथों में एक सितार । मुखारविंद
से तेज छिड़क रहा था । उसने दबी हुई दृष्टि से दोनों कोमलांगी रमणियों को देखा और
सिर झुका कर बैठ गया । प्रभा ने झिझकती हुई आँखों से देखा और दृष्टि नीचे कर ली ।
उमा ने कहा- योगी जी, हमारे बड़े भाग्य थे कि आपके दर्शन हुए, हमको भी कोई पद
सुना कर कृतार्थ कीजिए ।
योगी ने सिर झुका कर उत्तर दिया – हम योगी लोग नारायण का भजन करते हैं । ऐसे-ऐसे
दरबारों में हम भला क्या गा सकते हैं, पर आपकी इच्छा है तो सुनिए –
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
कहाँ वह प्रीति , कहाँ यह बिछरन, कहाँ मधुवन की रीति,
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
योगी का रसीला करूण स्वर , सितार का सुमधुर निनाद, उस पर गीत का माधुर्य, प्रभा को
बेसुध किये देता था । इसका रसज्ञ स्वभाव और उसका मधुर रसीला गान, अपूर्व संयोग था ।
जिस भाँति सितार की ध्वनि गगनमंडल में प्रतिध्वनित हो रही थी, उसी भाँति प्रभा के
हृदय में लहरी की हिलोरें उठ रही थीं । वे भावनाएँ जो अब तक शांत थीं, जाग पड़ी ।
हृदय सुख स्वप्न देखने लगा । सतीकुण्ड के कमल तिलिस्म की परियाँ बन-बन कर मँडराते
हुए भौंरों से कर जोड़ सजल नयन हो, कहते थे —
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
सूर्ख और हरी पत्तियों से लदी हुई डालियाँ सिर झुकाये चहकते हुए पक्षियों से रो-रो
कर कहती थीं —
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
और राजकुमारी प्रभा का हृदय भी सितार की मस्तानी तान के साथ गूँजता था —
कभी कभी उसे ऐसा भास होता कि बाहर से यह आवाज आ रही है । वह चौंक पड़ती और तृष्णा
से प्रेरित हो कर वाटिका की चहार-दीवारी तक जाती और वहाँ से निराश हो कर लौट आती ।
फिर आप ही विचार करती – यह मेरी क्या दशा है ! मुझे यह क्या हो गया है ! मैं हिंदू
कन्या हूँ, माता-पिता जिसे सौंप दें, उसकी दासी बन कर रहना धर्म है । मुझे तन-मन से
उसकी सेवा करनी चाहिए । किसी अन्य पुरुष का ध्यान तक मन में लाना मेरे लिए पाप है !
आह ! यह कलुषित हृदय ले कर मैं किस मुँह से पति के पास जाऊँगी ! इन कानों क्योंकर
प्रणय की बातें सुन सकूँगी जो मेरे लिए व्यंग्य से भी अधिक कर्ण=कटु होंगी ! इन
पापी नेत्रों से वह प्यारी-प्यारी चितवन कैसे देख सकूँगी जो मेरे लिए वज्र से भी
हृदय-भेदी होगी ! इस गले में वे मृदुल प्रेमबाहु पड़ेंगे जो लौह-दंड से भी अधिक
भारी और कठोर होंगे । प्यारे तुम मेरे हृदय मंदिर से निकल जाओ । यह स्थान तुम्हारे
योग्य नहीं । मेरा वश होता तो तुम्हें हृदय की सेज पर सुलाती ; परंतु मैं धर्म की
रस्सियों में बँधी हूँ । इस तरह एक महीना बीत गया । ब्याह के दिन निकट आते जाते
थे और प्रभा का कमल-सा मुख कुम्हलाया जाता था । कभी-कभी विरहवेदना एवं विचार-विप्लव
से व्याकुल हो कर उसका चित्त चाहता कि सती-कुण्ड की गोद में शांति लूँ, किंतु राव
साहब इस शोक में जान ही दे देंगे यह विचार कर वह रुक जाती । सोचती, मैं उनकी जीवन
सर्वस्व हूँ, मुझ अभागिनी को उन्होंने किस लाड़-प्यार से पाला है; मैं ही उनके जीवन
का आधार और अंतकाल की आशा हूँ । नहीं, यों प्राण दे कर उनकी आशाओं की हत्या न
करूँगी । मेरे हृदय पर चाहे जो बीते, उन्हें कुढ़ाऊँगी ! प्रभा का एक योगी गवैये के
पीछे उन्मत्त हो जाना कुछ शोभा नहीं देता । योगी का गान तानसेन के गानों से भी अधिक
मनोहर क्यों न हो, पर एक राजकुमारी का उसके हाथों बिक जाना हृदय की दुर्बलता प्रकट
करता है ; रावसाहब के दरबार में विद्या की, शौर्य की और वीरता से प्राण हवन करने की
चर्चा न थी । यहाँ तो रात-दिन राग-रंग की धूम रहती थी । यहाँ इसी शास्त्र के
आचार्य प्रतिष्ठा के मसनद पर विराजित थे और उन्हीं पर प्रशंसा के बहुमूल्य रत्न
लुटाये जाते थे । प्रभा ने प्रारंभ ही से इसी जलवायु का सेवन किया था और उस पर इनका
गाढ़ा रंग चढ़ गया था । ऐसी अवस्था में उसकी गान-लिप्सा ने यदि भीषण रूप धारण कर
लिया तो आश्चर्य ही क्या है !

(3)

शादी बड़ी धूमधाम से हुई । रावसाहब ने प्रभा को गले लगा कर बिदा किया । प्रभा बहुत
रोयी । उमा को वह किसी तरह छौड़ती न थी ।
नौगढ़ एक बड़ी रियासडत थी और राजा हरिश्चंद्र के सुप्रबंध से उन्नति पर थी । प्रभा
की सेवा के लिए दासियों की एक पूरी फौज थी । उसके रहने के लिए वह आनंद-भवन सजाया
गया था, जिसके बनाने में शिल्प विशारदों ने अपूर्व कौशल का परिचय दिया था ।
श्रृंगार चतुराओं ने दुलहिन को खूब सँवारा । रसीले राजा साहब अधरामृत के लिए विह्वल
हो रहे थे । अंतःपुर में गये । प्रभा ने हाथ जोड़ कर, सिर झुका कर, उनका अभिवादन
किया । उनकी आँखों से आँसू की नदी बह रही थी । पति ने प्रेम के मद में मत्त हो कर
घूँघट हटा दिया, दीपक था, पर बुझा हुआ । फूल था, पर मुरझाया हुआ ।
दूसरे दिन से राजा साहब की यह दशा हुई कि भौंरे की तरह प्रतिक्षण इस फूल पर मँडराया
करते । न राज-पाट की चिन्ता थी, न सैर और शिकार की परवा । प्रभा की वाणी रसीला
राग थी, उसकी चितवन सुख का सागर और उसका मुख-चंद्र आमोद का सुहावना कुंज । बस,
प्रेम-मद में राजा साहब बिलकुल मतवाले हो गये थे, उन्हें क्या मालूम था कि दूध में
मक्खी है ।
यह असम्भव था कि राजासाहब के हृदय-हारी और सरस व्यवहार का जिसमें सच्चा अनुराग
भरा हुआ था, प्रभा पर कोई प्रभाव न पड़ता । प्रेम का प्रकाश अँधेरे हृदय को भी चमका
देता है । प्रभा मन में बहुत लज्जित होती । वह अपने को इस निर्मल और विशुद्ध प्रेम
के योग्य न पाती थी, इस पवित्र प्रेम के बदले में उसे अपने कृत्रिम, रँगे हुए भाव
प्रकट करते हुए मानसिक कष्ट होता था । जब तक कि राजासाहब उसके साथ रहते, वह
उनके गले लता की भाँति लिपटी हुई घंटों प्रेम की बातें किया करती । वह उनके साथ
सुमन-वाटिका में चुहल करती, उनके लिए फूलों का हार गुँथती और उनके गले में हाथ
डाल कर कहती–प्यारे, देखना ये फूल मुरझा न जायें, इन्हें सदा ताजा रखना । वह
चाँदनी रात में उनके साथ नाव पर बैठ कर झील की सैर करती, और उन्हें प्रेम का राग
सुनाती ।
यदि उन्हें बाहर से आने में जरा भी देर हो जाती, तो वह मीठा-मीठा उलाहना देती,
उन्हें निर्दय तथा निष्ठुर कहती । उनके सामने वह स्वयं हँसती, उनकी आँखें हँसती
और आँखों का काजल हँसता था । किंतु आह ! जब वह अकेली होती, उसका चंचल
चित्त उड़ कर उसी कुंड के तट पर जा पहुँचता; कुंड का वह नीला-नीला पानी, उस पर
तैरते हुए कमल और मौलसरी की वृक्ष-पंक्तियों का सुंदर दृश्य-आँखों के सामने आ
जाता । उमा मुस्कराती और नजाकत से लचकती हुई आ पहुँचती, तब रसीले योगी की
मोहनी छवि आँखों में आ बैठती और सितार के सूलसित सुर गूँजने लगते —
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
तब वह एक दीर्घ निःश्वास ले कर उठ बैठती और बाहर निकल कर पिंजरे में चमकते हुए
पक्षियों के कलरव में शांति प्राप्त करती । इस भाँति यह स्वप्न तिरोहित हो जाता ।

(4)

इस तरह कई महीने बीत गये । एक दिन राजा हरिश्चंद्र प्रभा को अपनी चित्रशाला में ले
गये । उसके प्रथम भाग में ऐतिहासिक चित्र थे । सामने ही शूरवीर महाराणा प्रतापसिंह
का चित्र नजर आया । मुखारविंद से वीरता की ज्योति स्पुटित हो रही थी । तनिक और
आगे बढ़ कर दाहिनी ओर स्वामिभक्त जगमल, वीरवर साँगा और दिलेर दुर्गादास विराजमान
थे । बायीं ओर उदार भीमसिंह बैठे हुए थे । राणाप्रताप के सम्मुख महाराष्ट्र केसरी
वीर शिवाजी का चित्र था । दूसरे भाग में कर्मयोगी कृष्ण और मर्यादा पुरुषोत्तम राम
विराजते थे । चतुर चित्रकारों ने चित्र-निर्माण में अपूर्व कौशल दिखलाया था । प्रभा
ने प्रताप के पाद-पद्मों को चूमा और वह कृष्ण के सामने देर तक नेत्रों में प्रेम और
श्रद्धा के आँसू-भरे मस्तक झुकाये खड़ी रही । उसके हृदय पर इस समय कलुषित प्रेम
का भय खटक रहा था । उसे मालूम होता था कि यह उन महापुरुषों के चित्र नहीं,
उनकी पवित्र आत्माएँ हैं । उन्हीं के चरित्र से भारतवर्ष का इतिहास गौरवान्वित है ।
वे भारत के बहुमूल्य जातीय रत्न, उच्चकोटि के जातीय स्मारक और गगनभेदी जातीय
तुमुल ध्वनि हैं । ऐसी उच्च आत्माओं के सामने खड़े होते उसे संकोच होता था । आगे
बढ़ी दूसरा भाग सामने आया ।
यहाँ ज्ञानमय बुद्ध योगसाधन में बैठे हुए देख पड़े । उनकी दाहिनी ओर शास्त्रज्ञ
शंकर थे और दार्शनिक दयानंद । एक ओर शांतिपथगामी कबीर और भक्त रामदास यथायोग्य
खड़े थे । एक दीवार पर गुरुगोविंद अपने देश और जाति पर बलि चढ़नेवाले दोनों बच्चों
के साथ विराजमान थे । दूसरी दीवार पर वेदांत की ज्योति फैलानेवाले स्वामी रामतीर्थ
और विवेकानंद विराजमान थे । चित्रकारों की योग्यता एक एक अवयव से टपकती थी । प्रभा
ने इनके चरणों पर मस्तक टेका । वह उनके सामने सिर न उठा सकी । उसे अनुभव होता
था कि उनकी दिव्य आँखें उसके हृदय में चुभी जाती हैं ?
इसके बाद तीसरा भाग आया । वह प्रतिभाशाली कवियों की सभा थी । सर्वोच्च स्थान पर आदि
कवि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास सुशोभित थे ।दाहिनी ओर श्रृंगाररस के अद्वितीय कवि
कालिदास थे, बाँयीं तरफ गम्भीर भावों से पूर्ण भवभूति । निकट ही भर्तृहरि अपने
संतोषाश्रम में बैठे हुए थे ।
दक्षिण की दीवार पर राष्ट्रभाषा हिंदी के कवियों का सम्मेलन था । सहृदय कवि सूर,
तेजस्वी तुलसी, सुकवि केशव और रसिक बिहारी यथाक्रम विराजमान थे । सूरदास से प्रभा
का अगाध प्रेम था । वह समीप जा कर उनके चरणों पर मस्तक रखना ही चाहती थी कि
अकस्मात् उन्हीं चरणों के सम्मुख सर झुकाये उसे एक छोटा-सा चित्र दीख पड़ा । प्रभा
उसे देख कर चौंक पड़ी । यह वही चित्र था जो उसके हृदय-पट पर खिंचा हुआ था । वह
खुल कर उसकी तरफ ताक न सकी । दबी हुई आँखों से देखने लगी । राजा हरिश्चंद्र ने
मुस्करा कर पूछा – इस व्यक्ति को तुमने कहीं देखा है ?
इस प्रश्न से प्रभा का हृदय काँप उठा । जिस तरह मृग-शावक व्याध के सामने व्याकुल
हो कर इधर-उधर देखता है, उसी तरह प्रभा अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से दीवार की ओर ताकने
लगी । सोचने लगी – क्या उत्तर दूँ ? इसको कहीं देखा है, उन्होंने यह प्रश्न मुझसे
क्यों किया ? कहीं ताड़ तो नहीं गये ? हे नारायण, मेरी पत तुम्हारे हाथ है, क्योंकर
इनकार करूँ ? मुँह पीला हो गया । सिर झुका कर क्षीण स्वर से बोली, `हाँ, ध्यान आती
है कि कहीं देखा है ।’
हरिश्चंद्र ने कहा — कहाँ देखा है ?
प्रभा के सिर में चक्कर-सा आने लगा । बोली – शायद एक बार यह गाता हुआ मेरी वाटिका
के सामने जा रहा था । उमा ने बुला कर इसका गाना सुना था ।
हरिश्चंद्र ने पूछा – कैसा गाना था ?
प्रभा के होश उड़े हुए थे । सोचती थी, राजा के इन सवालों में जरूर कोई बात है ।
देखूँ, लाज रहती है या नहीं । बोली – उसका गाना ऐसा बुरा न था । हरिश्चंद्र ने
मुस्करा कर कहा – क्या गाता था ?
प्रभा ने सोचा, इस प्रश्न का उत्तर दे दूँ तो बाकी क्या रहता है । उसे विश्वास हो
गया कि आज कुशल नहीं है । वह छत की ओर निरखती हुई बोली – सूरदास का कोई पद था ।
हरिश्चंद्र ने कहा — यह तो नहीं —
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
प्रभा की आँखों के सामने अँधेरा छा गया । सिर घूमने लगा, वह खड़ी न रह सकी, बैठ गयी
और हताश हो कर बोली – हाँ यही पद था । फिर उसने कलेजा मजबूत करके पूछा – आपको
कैसे मालूम हुआ ?
हरिश्चंद्र बोले – वह योगी मेरे यहाँ अक्सर आया-जाया करता है । मुझे भी उसका गाना
पसंद है । उसी ने मुझे यह हाल बताया था, किंतु वह तो कहता था कि राजकुमारी ने मेरे
गानों को बहुत पसंद किया और पुनः आने के लिए आदेश किया ।
प्रभा को अब सच्चा क्रोध दिखाने का अवसर मिल गया । वह बिगड़ कर बोली – यह
बिलकुल झूठ है । मैंने उससे कुछ नहीं कहा ।
हरिश्चंद्र बोले – यह तो मैं पहले ही समझ गया था कि यह उन महाशय की चालाकी है ।
डींग मारना गवैयों की आदत है, परंतु इसमे तो तुम्हें इन्कार नहीं कि उसका गान बुरा
न था ।
प्रभा बोली – ना ! अच्छी चीज को बुरा कौन कहेगा ?
हरिश्चंद्र ने पूछा – फिर सुनना चाहो तो उसे बुलवाऊँ । सिर के बल दौड़ा आयेगा ।
क्या उनके दर्शन फिर होंगे ? इस आशा से प्रभा का मुखमंडल विकसित हो गया ।
परंतु इन कई महीनों की लगातार कोशिश से जिस बात की भुलाने में वह किंचित् सफल
हो चुकी थी, उसके फिर नवीन हो जाने का भय हुआ । बोली – इस समय गाना सुनने को
मेरा जी नहीं चाहता ।
राजा ने कहा–यह मैं न मानूँगा कि तुम और गाना नहीं सुनना चाहती, मैं उसे अभी
बुलाये लाता हूँ ।
यह कह कर राजा हरीश्चंद्र तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गये । प्रभा उन्हें रोक
न सकी । वह बड़ी चिंता में डूबी खड़ी थी । हृदय में खुशी और रंज की लहरें बारी-बारी
से उठती थीं । मुश्किल से दस मिनट बीते होंगे कि उसे सितार के मस्ताने सुर के साथ
योगी की रसीली तान सुनाई दी —
कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।
वही हृदय-ग्राही राग था ,वही हृदय-भेदी प्रभाव, वही मनोहरता और वही सब कुछ, जो मन
को मोह लेता है । क्षण-एक में योगी की मोहिनी मूर्ति दिखायी दी । वही मस्तानापन,
वही मतवाले नेत्र, वही नयनाभिराम देवताओं का-सा स्वरूप । मुखमंडल पर मंद-मंद
मुस्कान थी । प्रभा ने उसकी तरफ सहमी हुई आँखों से देखा । एकाएक उसका हृदय उछल
पड़ा । उसकी आँखों के आगे से एक पर्दा हट गया । प्रेम-विह्वल हो, आँखों में आँसू-
भरे अपने पतिके चरणारविंदों पर गिर पड़ी और गद्गद् कंठ से बोली-प्यारे ! प्रियतम !
राजा हरिश्चंद्र को आज सच्ची विजय प्राप्त हुई । उन्होंने प्रभा को उठा कर छाती से
लगा लिया । दोनों आज एक प्राण हो गये । राजा हरिश्चंद्र ने कहा – जानती हो, मैंने
यह स्वाँग क्यों रचा था ? गाने का मुझे सदा से व्यसन है और सुना है तुम्हें भी इसका
शौक है । तुम्हें अपना हृदय भेंट करने से प्रथम एक बार तुम्हारा दर्शन करना आवश्यक
प्रतीत हुआ और उसके लिए सबसे सुगम उपाय यही सूझ पड़ा ।
प्रभा ने अनुराग से देखकर कहा–योगी बन कर तुमने जो कुछ पा लिया, वह राजा रह कर
कदापि न पा सकते । अब तुम मेरे पति हो और प्रियतम भी हो; पर तुमने मुझे बड़ा धोखा
दिया और मेरी आत्मा को कलंकित किया । इसका उत्तरदाता कौन होगा ?

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