मानसरोवर भाग 1

8 – सच्चाई का उपहार

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

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तहसील मदरसा बराँव के प्रथमाध्यापक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था ।
क्यारियों में भाँति-भाँति के फूल और पत्तियाँ लगा रखी थीं । दरवाजे पर लताएँ चढ़ा
दी थीं । इससे मदरसे की शोभा अधिक हो गयी थी । वह मिडिल कक्षा के लड़कों से भी अपने
बगीचे के सींचने और साफ करने में मदद लिया करते थे । अधिकांश लड़के इस काम को
रुचि पूर्वक करते । इससे उनका मनोरंजन होता था । किंतु दरजे में चार-पाँच लड़के
जमींदारों के थे उनमें कुछ ऐसी दुर्जनता थी कि यह मनोरंजन कार्य भी उन्हें बेगार
प्रतीत होता उन्होंने बाल्यकाल से आलस्य में जीवन व्यतीत किया था । अमीरी का झूठ
अभिमान दिल में भरा हुआ था । वह हाथ से कोई काम करना निंदा की बात समझते थे ।
उन्हें इस बगीचे से घृणा थी । जब उनके काम करने की बारी आई तो कोई-न-कोई बहाना करके
उड़ जाते । इतना ही नहीं, दूसरे लड़कों को भी बहकाते और कहते वाह ! पढ़ें फारसी,
बेचें तेल ! यदि खुरपी, कुदाल ही करना है तो मदरसे में किताबों से सिर मारने की
क्या जरूरत ? यहाँ पढ़ने आते हैं । कुछ मजदूरी करने नहीं आते । मुंशी जी इस अवज्ञा
के लिए उन्हें कभी-कभी दंड दे देते थे । इससे उनका द्वेष और भी बढ़ता था । अंत में
यहाँ तक नौबत पहुँची कि एक दिन उन लड़कों ने सलाह करके उस पुष्प-वाटिका को विध्वंस
करने का निश्चय किया । दस बजे मदरसा लगता था, किंतु उस दिन वह आठ ही बजे आ
गये , और बगीचे में घुस कर उसे उजाड़ने लगे । कहीं पौधे उखाड़ फेंके, कई क्यारियों
को रौंद डाला, पानी की नालियाँ तोड़ डालीं, क्यारियों की मेंड़े खोद डालीं । मारे
भय के छाती धड़क रही थी कि कहीं कोई देखता न हो । लेकिन एक छोटी सी फुलवारी को
उजाड़ते कितने देर लगती है । दस मिनिट में हरा-भरा बाग नष्ट हो गया । तब यह लड़के
शीघ्रता से निकले, लेकिन दरवाजे तक आये थे कि उन्हें अपने एक सहपाठी की सूरत दिखायी
दी । यह एक दुबला पतला दरिद्र और चतुर लड़का था । उसका नाम बाजबहादुर था । बड़ा
गम्भीर शांत लड़का था ।
ऊधम पार्टी के लड़के उससे जलते थे । उसे देखते ही उनका रक्त सूख गया । विश्वास हो
गया कि इसने जरूर देख लिया । यह मुँशी जी से कहे बिना न रहेगा । बुरे फँसे, आज
कुशल नहीं है । यह राक्षस इस समय यहाँ क्या करने आया था । आपस में इशारे हुए ।
यह सलाह हुई कि इसे मिला लेना चाहिए । जगतसिंह उनका मुखिया था । आगे बढ़कर बोला,
बाजबहादुर ! सवेरे कैसे आ गये ? हमने तो आज तुम लोगों के गले की फाँसी छुड़ा दी ।
लाला बहुत दिक किया करते थे, यह करो, वह करो । मगर यार देखो कहीं मुंशी जी से
जड़ मत देना, नहीं तो लेने के देने पड़ जायँगे ।
जयराम ने कहा – यह क्या देंगे, अपने ही तो हैं, हमने जो कुछ किया है वह सब के लिए
किया है, केवल अपनी भलाई के लिए नहीं । चलो यार तुम्हें बाजार की सैर करा दें, मुँह
मीठा करा दें ।
बाजबहादुर ने कहा- नहीं, मुझे आज घर पर याद करने का अवकाश नहीं मिला ।
यहीं बैठ कर पढूँगा !
जगतसिंह – अच्छा मुंशी जी से कहोगे तो न ?
बाजबहादुर – मैं स्वयं कुछ न कहूँगा, लेकिन उन्होंने मुझसे पूछा तो ?
जगतसिंह – कह देना मुझे नहीं मालूम ।
बाजबहादुर – यह झूठ मुझसे न बोला जायगा ।
जयराम- अगर तुमने चुगली खायी और हमारे ऊपर मार पढ़ी तो हम तुम्हें पीटे बिना न
छोड़ेंगे ।
बाजबहादुर – हमने कह दिया कि चुगली न खायेंगे लेकिन मुंशीजी ने पूछा तो झूठ भी न
बोलेंगे ।
जयराम – तो हम तुम्हारी हड्डियाँ भी तोड़ देंगे ।
बाजबहादुर – इसका तुम्हें अधिकार है ।

(2)

दस बजे जब मदरसा लगा और मुंशी भवानीसहाय ने बाग की यह दुर्दशा देखी तो क्रोध से आग
हो गये । बाग के उजड़ने का इतना खेद न था जितना लड़कों की शरारत का । यदि किसी
साँड ने यह दुष्कृत्य किया होता तो वह केवल हाथ मल कर रह जाते । किंतु लड़कों के इस
अत्याचार को सहन न कर सके ।
ज्यों ही लड़के दरजे में बैठ गये , वह तेवर बदले हुए आये और पूछा यह बाग किसने
उजाड़ा है ?
कमरे में सन्नाटा छा गया । अपराधियों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी मिडिल कक्षा के
पच्चीस विद्यार्थियों मे कोई ऐसा न था जो इस घटना को जानता हो किंतु किसी में यह
साहस नहीं था कि उठकर साफ-साफ कह दे । सब सिर झुकाये मौन धारण किये बैठे थे ।
मुंशीजी का क्रोध और भी प्रचंड हुआ । चिल्लाकर बोले -मुझे विश्वास है कि यह तुम्हीं
लोगों में किसी की शरारत है । जिसे मालूम हो स्पष्ट कह दे नहीं तो मै एक सिरे से
पीटना शुरू करूँगा । फिर कोई यह न कहे कि हम निरपराध मारे गये ।
एक लड़का भी न बोला । वही सन्नाटा !
मुंशी – देवीप्रसाद तुम जानते हो ?
देवी – जी नहीं, मुझे कुछ नहीं मालूम ।
`शिवदास तुम जानते हो ?’
`जी नहीं, मुझे कुछ नहीं मालूम ।’
`बाजबहादुर तुम कभी झूठ नहीं बोलते, तुम्हें मालूम है ?’
बाजबहादुर खड़ा हो गया, उसके मुख-मंडल पर वीरत्व का प्रकाश था । नेत्रों में साहस
झलक रहा था । बोला – जी हाँ ! मुंशी जी ने कहा -शाबाश
अपराधियों ने बाजबहादुर की ओर रक्त-वर्ण आँखों से देखा और मन में कहा-अच्छा !

(3)

भवानीसहाय बड़े धैर्यवान मनुष्य थे । यथाशक्ति लड़कों को यातना नहीं देते थे ।
किंतु ऐसी दुष्टता का दंड देने में वह लेशमात्र भी दया न दिखाते थे । छड़ी मँगा कर
पाँचों अपराधियों को दस-दस छड़ियाँ लगायी, सारे दिन बेंच पर खड़ा रखा और चालचलन के
रजिस्टर में उनके नाम के सामने काले चिह्न बना दिये ।
बाजबहादुर से शरारत पार्टीवाले लड़के यों ही जला करते थे, आज उसकी सचाई के कारण
उसके खून के प्यासे हो गये । यंत्रणा में सहानुभुति पैदा करने की शक्ति होती है ।
इस समय दरजे के अधिकांश लड़के अपराधियों के मित्र हो रहे थे ।
उनमें षड़यंत्र रचा जाने लगा कि आज बाजबहादुर की खबर ली जाय । ऐसा मारो कि फिर मद-
-रसे में मुँह न दिखावे । यह हमारे घर का भेदी है । दगाबाज ! बढ़ा सच्चे की दुम बना
है ! आज इस सचाई का हाल मालूम हो जायगा ! बेचारे बाजबहादुर को इस गुप्त-लीला की जरा
भी खबर न थी । विद्रोहियों ने उसे अंधकार में रखने का पूरा यत्न किया था ।
छुट्टी होने के बाद बाजबहादुर घर की तरफ चला । रास्ते में एक अमरूद का बाग था ।
वहाँ जगतसिंह और जयराम कई लड़कों के साथ खड़े थे । बाजबहादुर चौंका, समझ गया कि यह
लोग मुझे छेड़ने पर उतारू है । किंतु बचने का कोई उपाय न था । कुछ हिचकता हुआ आगे
बढ़ा । जगतसिंह बोला आओ लाला ! बहुत राह दिखायी । आओ सचाई का इनाम लेते जाओ ।
बाजबहादुर – रास्ते से हट जाओ, मुझे जाने दो ।
जयराम – जरा सचाई का मजा तो चखते जाइए ।
बाजबहादुर – मैंने तुमसे कह दिया था कि जब मेरा नाम ले कर पूछेंगे तो मैं बता दूँगा
जयराम – हमने भी तो कह दिया था कि तुम्हें इस काम का इनाम दिये बिना न छोड़ेंगे ।
यह कहते ही वह बाजबहादुर की तरफ घूँसा तान कर बढ़ा । जगतसिंह ने उसके दोनों हाथ
पकड़ने चाहे । जयराम का छोटा भाई शिवराम अमरूद की एक टहनी लेकर झपटा । शेष लड़के
चारों तरफ खड़े होकर तमाशा देखने लगे । यह `रिजर्व’ सेना थी जो आवश्यकता पड़ने पर
मित्रदल की सहायता के लिए तैयार थी । बाजबहादुर दुर्बल लड़का था । उसकी मरम्मत करने
को वह तीन मजबूत लड़के काफी थे । सब लोग यही समझ रहे थे कि क्षण भर में यह तीनों
उसे गिरा लेंगे । बाजबहादुर ने जब देखा कि शत्रुओं ने शस्त्र-प्रहार करना शुरू कर
दिया तो उसने कनखियों से इधर उधर देखा, तब तेजी से झपट कर शिव राम के हाथ से अमरूद
की टहनी छीन ली, और दो कदम पीछे हटकर टहनी ताने हुए बोला – तुम मुझे सचाई का इनाम
या सजा देने वाले कौन होते हो ?
दोनों ओर से दाँव-पेंच होने लगे । बाजबहादुर था तो कमजोर, पर अत्यंत चपल और सतर्क,
उस पर सत्य का विश्वास हृदय को और भी बलवान बनाये हुए था ।
सत्य चाहे सिर कटा दे, लेकिन कदम पीछे नहीं हटाता । कई मिनट तक बाजबहादुर उछल-
उछल कर वार करता और हटाता रहा । लेकिन अमरूद की टहनी कहाँ तक थाम सकती ।जरा
देर में उसकी धज्जियाँ उड़ गयी । जब तक वह उसके हाथ में रही तलवार रही कोई उसके
निकट आने की हिम्मत न करता था । निहत्था होने पर वह ठोकरों और घूसों से जवाब देता
रहा । मगर अंत में अधिक संख्या ने विजय पायी । बाजबहादुर की पसली में शिवराम का
एक घूँसा ऐसा पड़ा कि वह बेदम होकर गिर पड़ा । आँखें पथरा गयीं । और मूर्छा सी आ
गयी । शत्रुओं ने यह दशा देखी तो उनके हाथों के तोते उड़ गये । समझे इसकी जान निकल
गई । बेहताशा भागे ।
कोई दस मिनट के पीछे बाजबहादुर सचेत हुआ । कलेजे पर चोट लग गयी । घाव ओछा पड़ा था,
तिसपर भी खड़े होने की शक्ति न थी । साहस करके उठा और लँगड़ाता हुआ घर की ओर चला ।
उधर यह विजय दल भागते भागते जयराम के मकान पर पहुँचा ।रास्ते ही में सारा दल तितर-
बितर हो गया । कोई इधर से निकल भागा, कोई उधर से, कठिन समस्या आ पड़ी थी । जयराम
के घर तक केवल तीन सुदृढ़ लड़के पहुँचे । वहाँ पहुँच कर उनकी जान में जान आयी ।’
जयराम – कहीं मर न गया हो । मेरा घूँसा बैठ गया था ।
जगतसिंह – तुम्हें पसली में नहीं मारना था । अगर तिल्ली फट गयी होगी तो न बचेगा !
जयराम – यार मैंने जान के थोड़े ही मारा था । संयोग ही था । अब बताओ क्या किया जाय
जगत – करना क्या है, चुपचाप बैठे रहो ।
जयराम – कहीं मैं अकेला तो न फँसूँगा ?
जगत – अकेले कौन फँसेगा, सबके साथ चलेंगे ।
जयराम – अगर बाजबहादुर मरा नहीं है तो उठकर सीधे मुंशी जी के पास जायगा ।
जगत – और मुँशीजी कल हम लोगों की खाल अवश्य उधेड़ेगे ।
जयराम – इसलिए मेरी सलाह है कि कल मदरसे जाओ ही नहीं । नाम कटा कर दूसरी जगह
चले चलें । नहीं तो बीमारी का बहाना करके बैठे रहें । महीने दो महीने के बाद जब
मामला ठंडा पड़ जायगा तो देखा जायगा ।
शिवराम – और जो परीक्षा होने वाली है ?
जयराम ओ हो ! इसका तो ख्याल ही न था । एक ही महीना तो और रह गया है ।
जगत – तुम्हें अबकी जरूर वजीफ मिलता ।
जयराम – हाँ, मैंने बहुत परिश्रम किया था । तो फिर ?
जगत – कुछ नहीं तरक्की तो हो ही जायगी । वजीफे से हाथ धोना पड़ेगा ?
जयराम – बाजबहादुर के हाथ लग जायगा ।
जगत – बहुत अच्छा होगा ! बेचारे ने मार भी तो खायी है ।
दूसरे दिन मदरसा लगा । जगतसिंह, जयराम और शिवराम तीनों गायब थे । वली मुहम्मद पैर
में पट्टी बाँधे आये थे, लेकिन भय के मारे बुरा हाल था । कल के दर्शकगण भी थरथरा
रहे थे कि कहीं हम लोग भी गेहूँ के साथ घून की तरह न पिस जायँ । बाजबहादुर नियमा
नुसार अपने काम में लगा हुआ था । ऐसा मालूम होता था मानो उसे कल की बातें याद ही
नहीं हैं । किसी ने उनकी चर्चा न की । हाँ, आज वह अपने स्वभाव के प्रतिकूल कुछ
प्रसन्नचित्त देख पड़ता था । विशेषतः कल के योद्धाओं से वह अधिक हिला-मिला हुआ था ।
वह चाहता था कि यह लोग मेरी ओर से निःशंक हो जायँ । रात भर की विवेचना के
पश्चात उसने यही निश्चय किया था । और आज जब संध्या समय वह घर चला तो उसे
अपनी उदारता का फल मिल चुका था । उसके शत्रु लज्जित थे ओर उसकी प्रशंसा करते थे ।
मगर वह तीनों अपराधी दूसरे दिन भी न आये । तीसरे दिन भी उनका कहीं पता न था । वह
घर से मदरसे को चलते लेकिन देहात की तरफ निकल जाते । वहाँ दिन भर किसी वृक्ष के
नीचे बैठे रहते, अथवा गुल्ली डंडे खेलते । शाम को घर चले आते ।
उन्होंने यह पता तो लगा लिया था कि इस समर के अन्य सभी योद्धागण मदरसे जाते हैं और
मुंशीजी उससे कुछ नहीं बोलते, किंतु चित्त से शंका दूर न होती थी । बाजबहादुर ने
जरूर कहा होगा । हम लोगों के जाने की देर है ।
गये और बेभाव की पड़ी । यही सोच कर मदरसे आने का साहस न कर सकते ।

(5)

चौथे दिन प्रातःकाल तीनों अपराधी बैठे सोच रहे थे कि आज किधर चलना चाहिए । इतने में
बाजबहादुर आता हुआ दिखाई दिया । इन लोगों को आश्चर्य तो हुआ परंतु उसे अपने द्वार
पर आते देखकर कुछ आशा बँध गयी । यह लोग अभी बोले भी न पाये थे कि बाज बहादुर
ने कहा – क्यों मित्रों, तुम लोग मदरसे क्यों नहीं आते ? तीन दिन से गैरहाजिरी हो
रही है ।
जगत – मदरसे क्या जायँ, जान भारी पड़ी है ? मुंशीजी एक हड्डी भी न छोड़ेंगे ।
बाजबहादुर – क्यों, वलीमुहम्मद, दुर्गा, सभी तो जाते हैं, मुंशी जी ने किसी से भी
कुछ कहा ?
जयराम – तुमने उनको छोड़ दिया होगा, लेकिन हमें भला तुम क्यों छोड़ने लगे । तुमने
एक-एक की तीन-तीन जड़ी होगी ।
बाज0 – आज मदरसे चल कर इसकी परीक्षा ही कर लो । जगत यह झाँसे रहने दीजिए । हमें
पिटवाने की चाल है ।
बाज0 – तो मैं कहीं भागा तो नहीं जाता ? उस दिन सच्चाई की सजा दी थी, आज झूठ का
इनाम दे देना ।
जयराम – सच कहते हो तुमने शिकायत नहीं की ।
बाज0 – शिकायत की कौन बात थी । तुमने मुझे पीटा, मैंने तुम्हें मारा । अगर तुम्हारा
घूँसा न पड़ता तो में तुम लोगों को रणक्षेत्र से भगा कर दम लेता । आपस में झगड़ों
की शिकायत करने की मेरी आदत नहीं है ।
जगत – चलूँ तो यार लेकिन विश्वास नहीं आता ! तुम हमें झाँसे दे रहे हो, वहाँ कचूमर
निकलवा लोगे ।
बाज0 – तुम जानते हो झूठ बोलने की मेरी बान नहीं है !
यह शब्द बाजबहादुर ने ऐसी विश्वासोत्पादक रीति से कहे कि उन लोगों का भ्रम दूर हो
गया । बाज बहादुर के चले आने के पश्चात् तीनों देर तक उसकी बातों की विवेचना करते
रहे ! अंत में यही निश्चय हुआ कि आज चलना चाहिए !
ठीक दस बजे तीनों मित्र मदरसे पहुँच गये, किंतु चित्त में आशंकित थे । चेहरे का रंग
उड़ा हुआ था ।
मुंशीजी कमरे में आये । लड़कों ने खड़े हो कर उनका स्वागत किया, उन्होंने तीनों
मित्रों की ओर तीव्र दृष्टि से देखकर केवल इतना कहा – तुम लोग तीन दिन से गैरहाजिर
हो । देखो दरजे में जो इम्तहानी सवाल हुए हैं उन्हें नकल कर लो ।
फिर पढ़ाने में मग्न हो गये !

(6)

जब पानी पीने के लिए लड़कों को आध घंटे का अवकाश मिला तो तीनों मित्र और उनके सह
योगी जमा होकर बातें करने लगे ।
जयराम – हम तो जान पर खेल कर मदरसे आते थे, मगर बाजबहादुर है बात का धनी ।
वली मुम्मद – मुझे तो ऐसा मालूम होता है वह आदमी नहीं देवता है ।
यह आँखों देखी बात न होती तो मुझे कभी इस पर विश्वास न आता ।
जगत – भलमनसी इसी को कहते हैं । हमसे बड़ी भूल हुई कि उसके साथ ऐसा अन्याय किया ।
दुर्गा – चलो उससे क्षमा माँगें ।
जयराम – हाँ, यह तुम्हें खूब सूझी । आज ही ।
जब मदरसा बंद हुआ तो दरजे के सब लड़के मिलकर बाजबहादुर के पास गये । जगतसिंह उनका
नेता बन कर बोला, भाई साहेब ! हम सब -के-सब तुम्हारे अपराधी हैं । तुम्हारे साथ हम
लोगों ने जो अत्याचार किया है उस पर हम हृदय से लज्जित हैं । हमारा अपराध क्षमा करो
। तुम सज्जनता की मूर्ति हो, हम लोग उजड्ड, गँवार और मूर्ख हैं; हमें अब क्षमा
प्रदान करो ।
बाजबहादुर की आँखों में आँसू भर आये – बोला, मैं पहले भी तुम लोगों को अपना भाई
समझता था और अब भी वही समझता हूँ । भाइयों के झगड़े में क्षमा कैसी ?
सब-के-सब उससे गले मिले । इसकी चर्चा सारे मदरसे में फैल गयी । सारा मदरसा
बाजबहादुर की पूजा करने लगा । वह अपने मदरसे का मुखिया, नेता और शिरमौर
बन गया । पहले उसे सचाई का दंड मिला, अबकी
सचाई का उपहार मिला ।

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