मानसरोवर भाग 1

14 – बूढ़ी -काकी

– लेखक – मुंशी प्रेमचंद

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बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है । बूढ़ी काकी में जिह्वा स्वाद के सिवा
और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त
कोई दूसरा सहारा ही । समस्त इन्द्रियाँ, नेत्र,हाथ और पैर जवाब दे चुके थे ! पृथ्वी
पर पड़ी रहती और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का समय टल
जाता या उसका परिणाम पूर्ण न होता , अथवा बाजार से कोई वस्तु आती और न मिलती तो ये
रोने लगती थीं । उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़ कर रोती थीं।
उनके पतिदेव को स्वर्ग सिधारे कालांतर हो चुका था । बेटे तरुण हो-हो कर
चल बसे थे । अब एक भतीजे के सिवाय और कोई न था । उसी भतीजे के नाम उन्होंने
अपनी सारी सम्पत्ति लिख दी । भतीजे ने सारी सम्पत्ति लिखाते समय खूब लम्बे-चौड़े
वादे किये, किंतु वे सब वादे केवल कुली डिपो के दलालों के दिखाये हुए सब्जबाग थे
यद्यपि उस सम्पत्ति कि वार्षिक आय डेढ़ दो सौ रुपये से कम न थी तथापि बूढ़ी काकी को
पेट भर भोजन भी कठिनाई से मिलता था । इसमें उनके भतीजे पंडित बुद्धिराम का अपराध था
अथवा उनकी अर्द्धांगिनी श्रीमती रूपा का, इसका निर्णय करना सहज नहीं । बुद्धिराम
स्वभाव के सज्जन थे , किंतु उसी समय तक जब तक कि उनके कोष पर कोई आँच न
आये । रूपा स्वभाव से तीव्र थी सही, पर ईश्वर से डरती थी । अतएव बूढ़ी काकी को
उसकी तीव्रता उतनी न खलती थी जितनी बुद्धिराम की भलमन साहत ।
बुद्धिराम को कभी-कभी अपने अत्याचार का खेद होता था । विचारते कि इसी सम्पत्ति
के कारण मैं इस समय भलामानुष बना बैठा हूँ । यदि मौखिक आश्वासन और सूखी सहानुभूति
से स्थिति में सुधार हो सकता हो उन्हें कदाचित् कोई आपत्ति न होती, परंतु विशेष
व्यय का भय उनकी सचेष्टा को दबाये रखता था । यहाँ तक कि यदि द्वार पर कोई भला आदमी
बैठा होता और बूढ़ी काकी उस समय अपना राग अलापने लगती तो वह आग हो जाते और घर में आ
कर उन्हें जोर से डाँटते ।
लड़कों को बुड्ढों से स्वाभाविक विद्वेष होता ही है और फिर जब माता-पिता का यह रंग
देखते तो वे बूढ़ी काकी को और सताया करते । कोई चुटकी काट कर भागता, कोई उन
पर पानी की कुल्ली कर देता काकी चीख मार कर रोती, परंतु यह बात प्रसिद्ध थी कि वह
केवल खाने के लिए रोती हैं, अतएव उनके संताप और आर्तनाद पर कोई ध्यान नहीं देता था
। हाँ, काकी क्रोधातुर हो कर बच्चों को गालियाँ देने लगतीं तो रूपा घटनास्थल पर आ
पहुँचती । इस भय से काकी अपनी जिह्वा कृपाण का कदाचित ही प्रयोग करती थीं ,
यद्यपि उपद्रव -शांति का यह उपाय रोने से कहीं अधिक उपयुक्त था ।
सम्पूर्ण परिवार में यदि काकी से किसी को अनुराग था, तो वह बुद्धिराम की छोटी लड़की
लाड़ली थी । लाड़ली अपने दोनों भाइयों के भय से अपने हिस्से की मिठाई-चबैना बूढ़ी
काकी के पास बैठ कर खाया करती थी । यही उसका रक्षागार था और यद्यपि काकी की
शरण उनकी लोलुपता के कारण बहुत महँगी पड़ती थी, तथापि भाइयों के अन्याय से कहीं
सुलभ थी । इसी स्वार्थानुकूलता ने उन दोनों में सहानुभूति का आरोपण कर दिया था ।

(2)

रात का समय था । बुद्धिराम के द्वार पर शहनाई बज रही थी और गाँव के बच्चों का झुंड
विस्मयपूर्ण नेत्रों से गाने का रसास्वादन कर रहा था । चारपाइयों पर मेहमान विश्राम
करते हुए नाइयों से मुक्कियाँ लगवा रहे थे । समीप ही खड़ा हुआ भाट विरदावली सुना
रहा था । और कुछ भावज्ञ मेहमानों की `वाह, वाह” पर ऐसा खुश हो रहा था मानो इस
वाह-वाह का यथार्थ में वही अधिकारी है । दो-एक अँग्रेजी पढ़े हुए नवयुवक इन
व्यवहारों से उदासीन थे । वे इस गँवार मंडली में बोलना अथवा सम्मिलित होना अपनी
प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे ।
आज बुद्धिराम के बड़े लड़के मुखराम का तिलक आया है । यह उसी का उत्सव है । घर के
भीतर स्त्रियाँ गा रही थीं और रूपा मेहमानों के लिए भोजन के प्रबन्ध में व्यस्त थी।
भट्टियों पर कड़ाह चढ़ रहे थे । एक में पूड़िया-कचौड़िया निकल रही थीं, दूसरे में
अन्य पकवान बनते थे । एक बड़े हण्डे में मसालेदार तरकारी पक रही थी । घी और मसाले
की क्षुधावर्धक सुगंधि चारों ओर फैली हुई थी !
बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में शोकमय विचार की भाँति बैठी हुई थीं । स्वाद मिश्रित
सुगंधि उन्हें बेचैन कर रही थी । वे मन ही मन विचार कर रही थीं, सम्भवतः मुझे
पूड़ियाँ न मिलेंगी । इतनी देर हो गयी, कोई भोजन लेकर नहीं आया । मालूम होता है,
सब लोग भोजन कर चुके हैं । मेरे लिए कुछ न बचा । यह सोच कर उन्हें रोना आया;
परन्तु अपशकुन के भय से वह रो न सकी ।
“आहा ! कैसी सुगंधि है ? अब मुझे कौन पूछता है ? जब रोटियों ही के लाले पड़े हैं तब
ऐसे भाग्य कहाँ कि भर पेट पुड़ियाँ मिलें ?” यह विचार कर उन्हें रोना आया, कलेजे
में हूक-सी उठने लगी । परंतु रूपा के भय से उन्होंने फिर मौन धारण कर लिया ।
बूढ़ी काकी देर तक इन्हीं दुःखदायक विचारों में डूबी रहीं ! घी और मसालों की सुगंधि
रह-रहकर मन को आपे से बाहर किये देती थी । मुँह में पानी भर-भर आता था ।
पूड़ियों का स्वाद स्मरण करके हृदय में गुदगुदी होने लगती थी । किसे पुकारूँ; आज
लाड़ली बेटी भी नहीं आयी । दोनों छोकड़े सदा दिक किया करते हैं । आज उनका भी कहीं
पता नहीं । कुछ मालूम तो होता कि क्या बन रहा है ।
बूढ़ी काकी की कल्पना में पूड़ियों की तस्वीर नाचने लगी । खूब लाल-लाल , फूली-फूली
नरम-नरम होंगी । रूपा ने भली-भाँति भोजन दिया होगा । कचौड़ियों में अजवाइन और
इलायची की महँक आ रही होगी । एक पूड़ी मिलती तो जरा हाथ में ले कर देखती । क्यों
न चल कर कड़ाह के सामने ही बैठूँ । पूड़ियाँ छन-छन कर तैयार होंगी । कड़ाह से गरम-
गरम निकालकर थाली में रखी जाती होंगी । फूल हम घर में भी सूँघ सकते हैं; परंतु
बाटिका में और बात है । इस प्रकार निर्णय करके बूढ़ी काकी उकड़ूँ बैठ कर हाथों के
बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई में चौखट से उतरी और धीरे-धीरे रेंगती हुई कड़ाह के पास आ
बैठी । यहाँ आने पर उन्हें उतना ही धैर्य हुआ जितना भूखे कुत्ते को खाने वाले के
सम्मुख बैठने में होता है ।
रूपा उस समय कार्य भार से उद्विग्न हो रही थी । कभी इस कोठे में जाती, कभी उस कोठे
में, कभी कड़ाह के पास आती, कभी भंडार में जाती । किसी ने बाहर से आकर कहा-
महाराज ठंडाई माँग रहे हैं ।” ठंडाई देने लगी । इतने में फिर किसी ने आ कर कहा –
“भाट आया है, उसे कुछ दे दो ।” भाट के लिए सीधा निकाल रही थी कि एक तीसरे आदमी ने
आ कर पूछा -अभी भोजन तैयार होने में कितना विलम्ब है ? जरा ढोल मजीरा उतार दो ”
बेचारी अकेली स्त्री दौड़ते-दौड़ते व्याकुल हो रही थी, झुँझलाती थी, कुढ़ती थी,
किंतु क्रोध प्रकट करने का अवसर न पाती थी । भय होता, कहीं पड़ोसिनें यह कहने
लगे कि इतने में उबल पड़ीं । प्यास से स्वयं कंठ सूख रहा था । गर्मी के मारे फूँकी
जाती थी, परन्तु इतना अवकाश भी नहीं था कि जरा पानी पी ले अथवा पंखा ले कर झले । वह
भी खटका था कि जरा आँख हटी और चीजों की लूट मची । इस अवस्था में उसने बूढ़ी
काकी को कड़ाह के पास बैठी देखा तो जल गयी । क्रोध न रुक सका । इसका भी ध्यान न
रहा कि पड़ोसिनें बैठी तुम्हें मन में क्या कहेंगी, पुरुषों में लोग सुनेंगे तो
क्या कहेंगे । जिस प्रकार मेंढ़क केंचुएँ पर झपटता है, उसी प्रकार वह बूढ़ी काकी पर
झपटी और उन्हें दोनों हाथों से झटककर बोली- ऐसे पेट में आग लगे, पेट है या भाड़ ?
कोठरी में बैठते हुए क्या दम घुटता था ? अभी मेहमानो ने नहीं खाया, भगवान को भोग
नहीं लगा, तब तक धैर्य न हो सका ? आकर छाती पर सवार हो गयी । जल जाय ऐसी
जीभ । दिन भर खाती न होती तो न जाने किसकी हाँड़ी में मुँह डालती ? गाँव देखेगा तो
कहेगा कि बुढ़िया भर पेट खाने को नहीं पाती तभी तो इस तरह मुँह बाये फिरती है ।
डायन न मरे न माँचा छोड़े । नाम बेचने पर लगी है । नाक कटवा कर दम लेगी ।
इतना ठूँसती है, न जाने कहाँ भस्म हो जाता है । लो, भला चाहती हो तो जाकर कोठरी में
बैठो, जब घर के लोग खाने लगेंगे तब तुम्हें भी मिलेगा । तुम कोई देवी नहीं हो कि
चाहे किसी के मुँह में पानी न जाय, परंतु तुम्हारी पूजा पहले ही हो जाय ।
बूढ़ी काकी ने सिर न उठाया; न रोई न बोलीं । चुपचाप रेंगती हुई अपनी कोठरी में
चली गयीं । आवाज ऐसी कठोर थी कि हृदय और मस्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियाँ, सम्पूर्ण
विचार और सम्पूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गये थे ।
नदी में जब करार का कोई वृहद खंड कट कर गिरता है तो आस-पास का जल-समूह
चारों ओर उसी स्थान को पूरा करने के लिए दौड़ता है !

(3)

भोजन तैयार हो गया। आँगन में पत्तलें पड़ गयीं, मेहमान खाने में स्त्रियों ने
जेवनार गीत गाना आरम्भ कर दिया । मेहमानों के नाई और सेवक गण भी उसी मंडली
के साथ किंतु कुछ हट कर भोजन करने बैठे थे, परंतु सभ्यतानुसार जब तक सब के सब
खा न चुके कोई उठ नहीं सकता था । दो एक मेहमान जो कुछ पढ़े लिखे थे, सेवकों के
दीर्घाहार पर झुँझला रहे थे । वे इस बंधन को व्यर्थ और बे-सिर-पैर की बात समझते थे।
बूढ़ी काकी अपनी कोठरी में जा कर पश्चाताप कर रही थीं कि मैं कहाँ से कहाँ गयी ।
उन्हें रूपा पर क्रोध नहीं था । अपनी जल्दीबाजी पर दुःख था सच ही तो है जब तक
मेहमान लोग भोजन कर न चुकेंगे, घरवाले कैसे खायेंगे । मुझसे इतनी देर भी नहीं रहा
गया । सबके सामने पानी उतर गया । अब जब तक कोई बुलाने न आयेगा, न जाऊँगी ।
मन ही मन इसी प्रकार का विचार कर वह बुलावे की प्रतीक्षा करने लगी
परन्तु घी की रुचिकर सुबास बड़ी धैर्य-परीक्षक प्रतीत हो रही थी । उन्हे एक एक पल
एक एक युग के समान मालूम होता था । अब पत्तल बिछ गयी होगी अब मेहमान आ गये होंगे ।
। लोग हाथ-पैर धो रहे हैं, नाशई पानी दे रहा है । मालूम होता है लोग खाने बैठ
गये । जेवनार गाया जा रहा है, यह विचार कर वह मन को बहलाने के लिए लेट गयीं । धीरे
धीरे एक गीत गुनगुनाने लगी । उन्हें मालूम हुआ कि मुझे गाते देर हो गयी । क्या इतनी
देर तक लोग भोजन कर ही रहे होंगे । किसी की आवाज नहीं सुनायी देती । अवश्य ही लोग
खा-पीकर चले गये । मुझे कोई बुलाने नहीं आया । रूपा चिढ़ गयी, क्या जाने न बुलाये
सोचती हो कि आप ही आवेंगी, वह कोई मेहमान तो नहीं जो उन्हें बुलाऊँ । बूढ़ी काकी
चलने के लिए तैयार हुई । यह विश्वास कि एक मिनट में पूड़ियाँ और मसालेदार तरकारियाँ
सामने आयेंगी, उनकी स्वादेन्द्रियों को गुद-गुदाने लगा । उन्होंने मन में तरह तरह
के मन्सूबे बाँधे – पहले तरकारी से पूड़ियाँ खाऊँगी, फिर दही और शक्कर से, कचौरियाँ
रायते के साथ मजेदार मालूम होंगी । चाहे कोई बुरा माने चाहे भला, मैं तो माँग-माँग
कर खाऊँगी ।
यही न लोग कहेंगे कि इन्हें विचार नहीं ? कहा करें, इतने दिन के बाद
पूड़ियाँ मिल रही हैं तो मुँह झूठा करके थोड़े ही उठ जाऊँगी ।
वह उकड़ू बैठ कर हाथों के बल सरकती हुई आँगन में आयीं । परंतु हाय दुर्भाग्य !
अभिलाषा ने अपने पुराने स्वभाव के अनुसार समय की मिथ्या कल्पना की थी । मेहमान-
मंडली अभी बैठी हुई थी । कोई खा कर उँगलियाँ चाटता था, कोई तिरछे नेत्रों से देखता
था कि और लोग अभी खा रहे हैं या नहीं । कोई इस चिंता में था कि पत्तल पर पूड़ियाँ
छूटी जाती हैं किसी तरह इन्हें भीतर रख लेता । कोई दही खा कर जीभ चटकारता था,
परंतु दूसरा दोना माँगते संकोच करता था इतने में बूढ़ी काकी रेंगती हुई उनके बीच
में जा पहुँची । कई आदमी चौंक कर उठ खड़े हुए । पुकारने लगे – अरे यह बुढ़िया कौन
है । यह कहाँ से आ गयी ? देखो किसी को छू न दे ।
पंडित बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिला गये । पूड़ियों का थाल लिये
खड़े थे । थाल को जमीन पर पटक दिया और जिस प्रकार निर्दयी महाजन अपने किसी
बेईमान और भगोड़े कर्जदार को देखते ही झपटकर उसका टेंटुआ पकड़ लेता है उसी तरह
लपक कर उन्होंने काकी के दोनों हाथ पकड़े और घसीटते हुए लाकर उन्हें अँधेरी कोठरी
में धम से पटक दिया । आशा रूपी वाटिका लू के एक झोंके में नष्ट-विनष्ट हो गयी ।
मेहमानों ने भोजन किया । बाजेवाले, धोबी, चमार भी भोजन कर चुके, परंतु बूढ़ी काकी
को किसी ने न पूछा । बुद्धिराम और रूपा दोनों ही बूढ़ी काकी को उनकी निर्लज्जता के
लिए दंड देने का निश्चय कर चुके थे । उनके बुढ़ापे पर , हतज्ञान पर किसी को करुणा
न आयी थी । अकेली लाड़ली उनके लिए कुढ़ रही थी ।
लाड़ली की काकी से अत्यंत प्रेम था । बेचारी भोली लड़की थी । बाल विनोद और चंचलता
की उसमें गंध तक न थी । दोनों बार जब उसके माता-पिता ने काकी को निर्दयता से घसीटा
तो लाड़ली का हृदय ऐंठ कर रह गया । वह झुँझला रही थी कि यह लोग काकी को क्यों
बहुत-सी पूड़ीयाँ नहीं दे देते ? क्या मेहमान सब की सब खा जायेंगे ? और यदि काकी ने
मेहमानों के पहले खा लिया तो क्या बिगड़ जायगा ? वह काकी के पास जा कर उन्हें धैर्य
देना चाहती थी, परंतु माता के भय से न जाती थी । उसने अपने हिस्से कि पूड़ियाँ बिल
कुल न खायी थीं । अपनी गुड़ियों की पिटारी में बंद कर रखी थीं । वह उन पूड़ियों को
काकी के पास ले जाना चाहती थी । उसका हृदय अधीर हो रहा था । बूढ़ी काकी मेरी
बात सुनते ही उठ बैठेंगी, पूड़ियाँ देखकर कैसी प्रसन्न होंगी! मुझे खूब प्यार
करेंगी !

(4)

रात के ग्यारह बज गये थे । रूपा आँगन में पड़ी सो रही थी । लाड़ली की आँखों में
नींद न आती थी । काकी को पूड़ियाँ खिलाने की खुशी उसे सोने न देती थी । उसने
गुड़ियों की पिटारी सामने ही रखी थी । जब विश्वास हो गया कि अम्माँ सो रही हैं; तो
वह चुपके से उठी और विचारने लगी, कैसे चलूँ चारों ओर अँधेरा था । केवल चूल्हों में
आग चमक रही थी, और चूल्हों के पास एक कुत्ता लेटा हुआ था । लाड़ली की दृष्टि द्वार
के सामने वाले नीम की ओर गयी । उसे मालूम हुआ कि उस पर हनुमान जी बैठे हुए हैं ।
उनकी पूँछ उनकी गदा, सब स्पष्ट दिखलाई दे रही है । मारे भय के उसने आँखें बंद कर
ली । इतने में कुत्ता उठ बैठा, लाड़ली को ढाढ़स हुआ । कई सोये हुए मनुष्यों के बदले
एक भागता हुआ कुत्ता उसके लिए अधिक धैर्य का कारण हुआ । उसने पिटारी उठायी और
बूढ़ी काकी की कोठरी की ओर चली ।

(5)

बूढ़ी काकी को केवल इतना स्मरण था कि किसी ने मेरे हाथ पकड़ कर घसीटे, फिर ऐसा
मालूम हुआ जैसे कोई पहाड़ पर उड़ाये लिये जाता है । उनके पैर बार बार पत्थरों से
टकराये तब किसी ने उन्हें पहाड़ पर से पटका वे मूर्छित हो गयीं ।
जब वे सचेत हुई तो किसी की जरा भी आहट न मिलती थी । समझी कि सब लोग खा-पीकर
सो गयी । रात कैसे कटेगी ? राम ! क्या खाऊँ ? पेटे काटने से धन जुड़ जायगा ? इन
लोगों को इतनी भी दया नहीं आती कि न जाने बुढ़िया कब मर जाय ? उसका जी क्यों
दुखावें ?
मैं पेट की रोटियाँ ही खाती हूँ कि और कुछ ? इस पर यह हाल । मैं अंधी अपाहिज ठहरी
, न कुछ सुनूँ न बूझूँ । यदि आँगन में चली गयी तो क्या बुद्धिराम से इतना कहते न
बनता था कि काकी अभी लोग खा रहे हैं, फिर आना । मुझे घसीटा, पटका । उन्हीं पूड़ियों
के लिए रूपा ने सबके सामने गालियाँ दी । उन्हीं पूड़ियों के लिए इतनी दुर्गति करने
पर भी उनका पत्थर का कलेजा न पसीजा । सबको खिलाया, मेरी बात तक न पूछी । जब तब
ही न दीं, तब अब क्या देंगे ?
यह विचार कर काकी निराशामय संतोष के साथ लेट गयीं । ग्लानि से गला भर-भर आता था,
परंतु मेहमानों के भय से रोती न थीं ।
सहसा उनके कानों में आवाज आयी – “काकी उठो; मैं पूड़ियाँ लायी हूँ” काकी ने लाड़ली
की बोली पहचानी । चटपट उठ बैठीं । दोनों हाथों से लाड़ली को टटोला और उसे गोद में
बैठा लिया । लाड़ली ने पूड़ियाँ निकाल कर दीं । काकी ने पूछा – क्या तुम्हारी अम्मा
ने दी हैं ?
लाड़ली ने कहा – नहीं, यह मेरे हिस्से की हैं ।
काकी पूड़ियों पर टूट पड़ीं । पाँच मिनट में पिटारी खाली हो गयी । लाड़ली ने पूछा-
काकी पेट भर गया ।
जैसे थोड़ी-सी वर्षा ठंडक के स्थान पर और भी गर्मी पैदा कर देती है उसी भाँति इन
थोड़ी पूड़ियों ने काकी की क्षुधा और इच्छा को और उत्तेजित कर दिया था । बोली-
नहीं बेटी, जा कर अम्माँ से और माँग लाओ ।
लाड़ली ने कहा – अम्माँ सोती हैं, जगाऊँगी तो मारेंगी।
काकी ने पिटारी को फिर टटोला । उसमें कुछ खुर्चन गिरे थे । उन्हें निकाल कर वे खा
गयीं । बार-बार होंठ चाटतीं थीं चटखारें भरती थीं ।
हृदय मसोस रहा था कि और पूड़ियाँ कैसे पाऊँ । संतोष-सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा
का बहाव अपरिमित हो जाता है । मतवालों को मद का स्मरण करना उन्हें मदांध बनाता है ।
काकी का अधीर मन इच्छा के प्रबल प्रवाह में बह गया । उचित और अनुचित का विचार
जाता रहा । वे कुछ देर तक उस इच्छा को रोकती रहीं । सहसा लाड़ली से बोलीं – मेरा
हाथ पकड़ कर वहाँ ले चलो जहाँ मेहमानों ने बैठ कर भोजन किया है ।
लाड़ली उनका अभिप्राय समझ न सकी । उसने काकी का हाथ पकड़ा और ले जाकर झूठे पत्तलों
के पास बैठा दिया । दीन, क्षुधातुर हत-ज्ञान बुढ़िया पत्तलों से पूड़ियों के टुकड़े
चुन-चुन कर भक्षण करने लगी । ओह दही कितना स्वादिष्ट था, कचौड़ियाँ कितनी सलोनी,
खस्ता कितने सुकोमल । काकी बुद्धि हीन होते हुए भी इतना जानती थीं कि मैं वह काम
कर रही हूँ, जो मुझे कदापि न करना चाहिए । मैं दूसरों की झूठी पत्तल चाट रही हूँ ।
परंतु बुढ़ापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छाएँ एक ही केंद्र पर आ
लगती हैं । बूढ़ी काकी में यह केंद्र उनकी स्वादेन्द्रिय थी ।
ठीक उसी समय रूपा की आँखें खुलीं । उसे मालूम हुआ कि लाड़ली मेरे पास नहीं है।
वह चौंकी, चारपाई के इधर-उधर ताकने लगी कि कहीं नीचे तो नहीं गिर पड़ी । उसे
वहाँ न पाकर वह उठी तो क्या देखती है कि लाड़ली जूठे पत्तलों के पास चुपचाप खड़ी है
और बूढ़ी काकी पत्तलों पर से पूड़ियों के टुकड़े उठा-उठा कर खा रही है । रूपा का
हृदय सन्न हो गया । किसी गाय की गर्दन पर छुरी चलते देख कर जो अवस्था उसकी होती,
वही उस समय हुई । एक ब्राह्मणी दूसरों की झूठी पत्तल टटोले, इससे अधिक शोकमय दृश्य
असम्भव था । पूड़ियोंके कुछ ग्रासों के लिए उसकी चचेरी सास ऐसी पतित और निकृष्ट
कर्म कर रही है ! यह वह दृश्य था जिसे देखकर देखनेवालों के हृदय काँप उठते हैं ।
ऐसा प्रतीत होता मानों जमीन रुक गयी, आसमान चक्कर खा रहा है । संसार पर कोई
विपत्ति आनेवाली है । रूपा को क्रोध न आया । शोक के सम्मुख क्रोध कहाँ ? करुणा और
भय से उसकी आँखें भर आयीं । इस अधर्म के पाप का भागी कौन है ? उसने सच्चे हृदय
से गगन-मंडल की ओर हाथ उठाकर कहा- परमात्मा, मेरे बच्चों पर दया करो । इस अधर्म का
दंड मुझे मत दो, नहीं तो मेरा सत्यानाश हो जायगा ।
रूपा को अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी नहीं देख पड़े
थे । वह सोचने लगी – हाय ! कितनी निर्दय हूँ । जिसकी सम्पत्ति से मुझे दो सौ रुपया
वार्षिक आय हो रही है, उसकी यह दुर्गति ! और मेरे कारण ! हे दयामय भगवान् ! मुझसे
बड़ी भारी चूक हुई है, मुझे क्षमा करो । आज मेरे बेटे का तिलक था ।सैकड़ों मनुष्यों
ने भोजन पाया । मैं उनके इशारों की दासी बनी रही ।
अपने नाम के लिए सैकड़ों रुपये व्यय कर दिये , परंतु जिसकी बदौलत हजारों रुपये खाये
उसे इस उत्सव में भी भर पेट भोजन न दे सकी । केवल इसी कारण तो, वह वृद्धा
असहाय है ।
रूपा ने दिया जलाया, अपने भंडार का द्वार खोला और एक थाली में सम्पूर्ण सामग्रियाँ
सजा कर लिए हुए बूढ़ी काकी की ओर चली ।
आधी रात जा चुकी थी, आकाश पर तारों के थाल सजे हुए थे और उन पर बैठे हुए देवगण
स्वर्गीय पदार्थ सजा रहे थे, परंतु उनमें किसी को वह परमानन्द प्राप्त न हो सकता था
जो बूढ़ी काकी को अपने सम्मुख थाल देख कर प्राप्त हुआ । रूपा ने कंठावरुद्ध स्वर
में कहा – काकी उठो, भोजन कर लो । मुझसे आज बड़ी भूल हुई, उसका बुरा न मानना ।
परमात्मा से प्रार्थना कर दो वह मेरा अपराध क्षमा कर दें ।
भोले-भाले बच्चों की भाँति, जो मिठाइयाँ पा कर मार और तिरस्कार सब भूल जाता है,
बूढ़ी काकी वैसे ही सब भूला कर बैठी हुई खाना खा रही थी । उसके एक एक रोएँ से
सच्ची सदिच्छाएँ निकल रही थीं और रूपा बैठी इस स्वर्गीय दृश्य का आनन्द लेने में
निमग्न थी ।

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